खबर लहरिया Blog मिट्टी का आशियाना, बारिश से है बचाना

मिट्टी का आशियाना, बारिश से है बचाना

पिपराही के राम खिलावन कहते हैं कि एक समय था जब खपरैल के घर गांव की मुख्य पहचान बने हुए थे। पहले मिट्टी के घरों की छत का निर्माण खपरैल से होता था। गांव के कारीगर इस खपरैल को तैयार करते थे लेकिन बदलते दौर में गांव के लोगों की रुचि खपरैल की जगह शहरों में बन रहे है मकानों के ढांचे ने ली है।

रिपोर्ट – गीता देवी

ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर कच्चे मकान होते हैं जो मिट्टी, खपरैल के बने होते हैं। बहुत-सी जगह तो गांव में मिट्टी की दीवारों पर रंग-बिरंगे रंगों से चित्रकारी भी की जाती है। घरों की दीवारों पर फूल, मोर न जाने कितने तरह के चित्र देखने को मिलते हैं जो देखने में बड़े सुंदर लगते हैं। अपने घर को सजाने का भला किसका मन नहीं करता और घर का अस्तित्व हमेशा बना रहे इसका भी ध्यान रखना पड़ता है। घर को बारिश, धूल, धूप से बचाए रखना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में मानसून शरू होते ही लोग अपने घरों की मरम्मत करनी शुरू कर देते हैं। ऐसा ही नजारा उत्तर प्रदेश के बांदा, बुंदेलखंड में देखने को मिला जो घरों की मरम्मत कर रहे थे। मिट्टी के घरों की छत को बांस-बल्ली और खपरैल से ढकते हैं ताकि बारिश का पानी अंदर न आ सके।

बारिश से बचाने का करते हैं प्रयास

गांव देहात में लोग अपने घरों के खपरैल उतार कर नए ढंग से सजाने का प्रयास करते हैं। चिलचिलाती धूप में भी वो अपने घरों की छत पर बांस-बल्ली बांधते हैं। घरों की मरम्मत करने के लिए बाहर से मजदूर नहीं बुलवाते बल्कि खुद समय निकालकर घरों की मरम्मत करते हैं और इसमें परिवार के सब लोग हाथ बटाते हैं।

पिपराही के राम खिलावन कहते हैं कि एक समय था जब खपरैल के घर गांव की मुख्य पहचान बने हुए थे। पहले मिट्टी के घरों की छत का निर्माण खपरैल से होता था। गांव के कारीगर इस खपरैल को तैयार करते थे लेकिन बदलते दौर में गांव के लोगों की रुचि खपरैल की जगह शहरों में बन रहे है मकानों के ढांचे ने ली है। अगर यही स्थिति रही तो गांव में अभी जो कुछ घर खपरैल के बचे हैं वह इतिहास के पन्नों पर कैद होकर रह जाएंगे और खपरैल का नामो-निशान नहीं होगा।

किसान भी बनाते थे खपरैल

माया का कहना है कि एक समय था जब  किसान खेती भी करते थे और फुर्सत मिलने पर खपरा भी बनाते थे। किसानों को चिंता होती थी कि बरसात आने वाली है और घरों की मरम्मत करनी है। खपरा तैयार होते ही किसान मजदूर बुलाकर घरों की मरम्मत करना शुरू करवा देते थे। कुछ किसान तो खुद मरम्मत का काम कर लेते थे जिससे गांव में मजदूरों को काफी अच्छी मजदूरी भी मिलती थी।

मैंने इन 15 सालों में बहुत सारे गांव घूमे और रिपोर्टिंग भी की और बहुत ज्यादा कच्चे घर देखे लेकिन समय के साथ बदलाव होता गया। अभी भी अगर आप फतेहगंज क्षेत्र के गोबरी गोडरामपुर जाएं तो आप की पुरानी यादें ताजा हो जाएगी। ठेठ गांव दिखेगा क्योंकि वहां पर आज भी हर किसी का घर कच्चा और खपरा का छाया हुआ है। वहां पर एक भी पक्का घर नहीं है जिससे लोग शहर की तुलना कर सके। खपरैल के घर देखने में सुन्दर भी लगते हैं और शांत भी लगते हैं वहां व्यक्ति को सुकून मिलता है इसलिए तो आपने शहरों में भी कुछ फेंसी रेस्टोरेंट और बड़े होटलों में खपरैल से कुछ हिस्से सजे हुए देखें होंगें और ये बहुत महंगे भी बिकते हैं।

 

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