खबर लहरिया Blog Prayagraj News: गेहूं का सीला (बालियां) बीनने का मौसम शुरू, लोगों के जीवन से जुड़े किस्से

Prayagraj News: गेहूं का सीला (बालियां) बीनने का मौसम शुरू, लोगों के जीवन से जुड़े किस्से

गेहूं की फसल पकने का इंतजार जहां किसानों को होता है उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें गेहूं के सीला बीनने का इंतजार रहता है। गेहूं का सीला यानी जब खेत में फसल काटते समय गेहूं की कुछ बालियां खेत में ही गिर जाती है। इस गिरे हुए बालियों को बाद में बच्चे और महिलाऐं बीनते हैं।

खेत से बीन (चुन) कर बोरे में रखी गई सुनहरी गेहूं की बालियां (फोटो साभार: सुनीता)

रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – सुचित्रा 

ग्रामीण क्षेत्रों में गेहूं की फसल पक के तैयार हो चुकी है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के इलाकों में गेहूं की फसल होती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार गेहूं का सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाला राज्य उत्तर प्रदेश है। उत्तर प्रदेश (पश्चिमी भाग) में अप्रैल की शुरुआत में कटाई इन क्षेत्रों में तापमान ज्यादा होने से फसल जल्दी पकती है। बिहार जैसे राज्यों में यह फसल अप्रैल के अंत तक पक के तैयार होती है।

अप्रैल में गेहूं का सीला बीनना जोरों पर

उत्तर प्रदेश के जिला प्रयागराज में इस समय हर क्षेत्र में गेहूं की कटाई के बाद सीला बिनने का काम जोरों पर चल रहा है। ग्रामीण इलाकों में इसे आम तौर पर “बिनिया” कहा जाता है। गांवों में बच्चे और महिलाएं खेतों में जाकर पहली और दूसरी बार बची हुई बालियों को मेहनत से बिन रहे हैं। यह काम इन दिनों बड़े स्तर पर किया जा रहा है और इसमें ग्रामीण परिवार बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
गढ़ा कटरा के लालू का कहना है कि यह गेहूं की “बिनिया” बिनने के लिए इस लोग सुबह ही खेतों की ओर निकल जाते हैं और दोपहर तक बिनाई करते हैं। फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद दूसरी बार (दूसरी मीटिंग) भी खेतों में जाकर बिनिया बिनते हैं। उन्होंने बताया कि एक दिन में करीब 5 से 10 किलो गेहूं इकट्ठा हो जाता है। यह गेहूं मुख्य रूप से घर के खाने के लिए ही होता है।
काम नहीं तो सीला सहारा

लालू के अनुसार, जब दिनभर मजदूरी या कटाई नहीं मिल पाती, तब सीला बीनना सबसे अच्छा सहारा होता है। हालांकि यह काम आसान नहीं है, क्योंकि पूरे दिन झुककर (निहुर-निहुर कर) बिनाई करनी पड़ती है। फिर भी, लगातार मेहनत से लोग एक महीने में करीब 40–50 किलो गेहूं इकट्ठा कर लेते हैं, जो उनके परिवार के लिए बड़ी मदद साबित होता है।

गेहूं का सीला बीनने के बाद बोर में समेटते हुए (फोटो साभार: सुनीता)

राममनी का कहना है कि उनके पास खुद की खेती नहीं है, इसलिए वे दूसरे लोगों के खेतों में जाकर गेहूं की बालिया बिनते हैं। जब वे खेत में बिनाई के लिए जाते हैं, तो उनके बच्चे भी साथ चले जाते हैं और पास के खेतों में बिनिया बिनने लगते हैं। उन्होंने बताया कि इस समय ज्यादातर खेतों में गेहूं की बिनिया मिलती है, खासकर उन खेतों में जहाँ फसल मशीन से काटी जाती है, क्योंकि वहां काफी दाने गिर जाते हैं। बच्चे भी स्कूल से लौटने के बाद बोरी उठाकर बिनिया बिनने निकल जाते हैं, जिससे घर के लिए कुछ अनाज इकट्ठा हो सके।

रवीना का कहना है कि “बिनिया बिनते समय हाथ-पैर में कांटे और खूंटियां लग जाती हैं, जिससे चोट भी लगती है। लेकिन अपने पास खेत न होने के कारण वे दूसरे लोगों के खेतों में जाकर बिनिया बिनते हैं। अगर इस समय ज्यादा बिनिया इकट्ठा हो जाए और घर में शादी-विवाह या रिश्तेदारी का कोई कार्यक्रम हो, तो उसी से कपड़े आदि खरीद लिए जाते हैं। कटाई के बाद इस सीजन में अक्सर शादी-विवाह में जाना भी होता है।

बच्चों के लिए खेल भी मनोरंजन भी

गेहूं का सीला बीनने का समय बच्चों के लिए भी खास होता है। बच्चे सीला बीनने के लिए ग्रुप बनाकर खेत की और दौड़ पड़ते हैं और सीला कहां गिरा हुआ है बारीकी से देखते हैं। गेहूं मिलते ही बच्चों की खुशी दुगनी हो जाती है।

गेहूं के खेत में से सीला बीनने के लिए बोरी हाथ में लिए हुए बच्चे (फोटो साभार: सुनीता)

बच्चों के लिए ये किसी खेल से कम नहीं है। पहले खेत तक सबसे पहले कौन पहुचंता है इसकी दौड़, फिर किसने कितने गेहूं बीने और कौन जीता? इन सब में उनका दिन चला जाता है। बच्चे स्कूल के बाद यही काम में लग जाते हैं। उन्हें मोबाइल में रील देखने से अच्छा और गेम खेलने से बेहतर यही अच्छा लगता है। इससे उनकी सेहत पर भी अच्छा असर पड़ता है।
रविता आठवीं कक्षा में पढ़ रही है। स्कूल से लौटने के बाद वह गेहूं की “बिनिया” बिनने के लिए खेतों में चली जाती है। वह बताती है कि बिनिया से जो अनाज या पैसा मिलता है, उसे वह बचाकर रखती है ताकि स्कूल खुलने पर पेन-कॉपी जैसी जरूरत की चीजें खरीद सके। इससे माता-पिता पर खर्च का बोझ भी कम हो जाता है। बिनिया बिनने के दौरान बच्चे आपस में खेलते-कूदते हैं और समय अच्छा बीतता है। यह सीजन उनके लिए काम के साथ-साथ थोड़ा आनंद लेने का भी समय होता है।

चालाकी भी शरारत भी

किसी काम को आसान कैसे बनाए जाए ये बच्चों को खूब पता है। रविता ने बताया कि जब वे खेत से गेहूं (सीला/बिनिया) इकट्ठा करके लाते हैं, तो घर के बाहर खड़े ट्रैक्टर के पहिए के नीचे बोरी रख देते हैं, जिससे गेहूं आसानी से निकल जाता है। इससे कूटने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके बाद वे उस गेहूं को दुकान पर बेच भी लेते हैं।

सीला बीनने के बाद गेहूं निकालने की प्रकिया

गेहूं का सीला खेतों से बीनकर लाने के बाद इसको डंडे से पीटा जाता है ताकि गेहूं के दाने बालियों से अलग हो जाएं। लेकिन बच्चे ऐसा नहीं करते हैं और गेहूं निकालने के लिए अलग ही तरकीब अपनाते हैं जैसा कि आप ने ऊपर पढ़ा। गेहूं निकलने के बाद ही यह दुकानों पर बेचने लायक या फिर मील में पीसने लायक हो पाते हैं।

गेहूं के सीलों (बालियों) को बोरे में भरकर डंडे से पीटते हुए (फोटो साभार: सुनीता)

बच्चे गेहूं का सीला बीनकर दुकान में 20रुपए किलों में बेच देते हैं और अपनी पसंदीदा चीज खरीद लेते हैं।

दुकान में बेचने के लिए गेहूं (फोटो साभार: सुनीता)

आरती बताती हैं कि पहले के समय में लोग बिनिया को तुरंत घर लाकर कूटते थे और चक्की या जाता (हाथ से चलने वाली चक्की) में पीसकर आटा बनाते थे। उसी आटे से दोपहर का खाना तैयार किया जाता था।

अब समय बदल गया है। आजकल लोग बिनिया को तुरंत उपयोग में लाने के बजाय पहले इकट्ठा कर लेते हैं और फिर बाद में एक साथ कूटते या इस्तेमाल करते हैं। इस तरह पहले के मुकाबले अब इस काम के तरीके में काफी बदलाव आ गया है।

 

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