जिला प्रयागराज के जसरा ब्लॉक के कंजासा गांव की पहचान आज सब्जी की खेती जिसमें खासकर परवल की खेती से बन चुकी है। यहां करीब 75 प्रतिशत किसान यमुना नदी के किनारे यानी ‘तरी’ की जमीन पर सब्जियां उगाकर अपना जीवन चलाते हैं। इस इलाके में खेती ही सबसे बड़ा सहारा है। न कोई बड़ा व्यवसाय, न नौकरी के ज्यादा मौके। किसानों के लिए खेती ही कमाई का जरिया है जिससे वे घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह और दवा-इलाज तक सब कुछ संभालते हैं।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – मीरा देवी
गांव के किसान बाबूलाल बताते हैं कि परवल की खेती की तैयारी सितंबर महीने से ही शुरू हो जाती है। जिनके पास अपनी जमीन नहीं होती वे यमुना किनारे की जमीन किराये पर लेते हैं जिसका खर्च भी कम नहीं होता। इसके बाद दो-दो फुट के गड्ढे खोदकर उसमें गोबर और यूरिया डाली जाती है और फिर परवल के बीज (बौड़ा) लगाए जाते हैं। बीज भी सस्ता नहीं मिलता। बिहार या कानपुर से लाकर करीब पांच हजार रुपये में एक गठ्ठा खरीदा जाता है। करीब 15 दिन से एक महीने में पौधे निकलने लगते हैं फिर उनकी निराई-गुड़ाई का काम शुरू होता है।
गुन्ना देवी कहती हैं कि यह खेती जितनी फायदेमंद दिखती है उतनी ही मेहनत वाली भी है। पूरा सीजन परिवार के लोग यमुना किनारे डेरा डालकर रहते हैं। दिन-रात खेत में मेहनत करनी पड़ती है। निराई, गुड़ाई और देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़नी होती लेकिन जोखिम भी बहुत है। अगर बारिश ज्यादा हो जाए या बाढ़ आ जाए तो पूरी फसल खराब हो जाती है फिर भी यहां की मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि किसान हर साल इसी खेती को चुनते हैं क्योंकि चार महीने का राशन इसी से निकल आता है।
खेती का रोज का रूटीन भी काफी कठिन होता है। शाम को करीब छह बजे पूरा परिवार मिलकर परवल तोड़ता है और फिर उसे बोरी में भरकर तैयार किया जाता है। सुबह जल्दी मंडी पहुंचाकर उसे बेच दिया जाता है। इस समय मंडी में परवल करीब 50 रुपये किलो बिक रहा है। शुरुआत में कम पैदावार होता है लेकिन बाद में तीन बोरी तक निकलने लगता है जिससे हर तीसरे दिन करीब दस हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। इसी पैसे से घर का सारा खर्च चलता है आटा, चावल, दाल, बच्चों की पढ़ाई और दवा तक।
अमृतलाल बताते हैं कि यमुना किनारे की जमीन परवल की खेती के लिए बेहद उपजाऊ होती है। बाढ़ आने के बाद मिट्टी और भी उपजाऊ हो जाती है जिससे पैदावार बढ़ती है। यही कारण है कि यह इलाका सब्जी उत्पादन के लिए मशहूर हो गया है। यहां टमाटर, करेला, कद्दू जैसी कई सब्जियां भी उगाई जाती हैं लेकिन परवल सबसे ज्यादा लाभ देने वाली फसल मानी जाती है। गेहूं जैसी फसल सिर्फ खाने भर के लिए उगाई जाती है क्योंकि असली कमाई तो सब्जी से ही होती है। मेहनत भले ज्यादा हो लेकिन यही खेती यहां के किसानों की जिंदगी की रीढ़ बनी हुई है।
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