खबर लहरिया Blog Peace Bill 2025: संसद से पारित हो गया शांति बिल, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की एंट्री

Peace Bill 2025: संसद से पारित हो गया शांति बिल, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की एंट्री

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान परमाणु ऊर्जा से जुड़ा ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ यानी शांति विधेयक, 2025 दोनों सदनों से पारित हो गया है। इस बिल के तहत परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों को बिजली उत्पादन के लिए परमाणु रिएक्टर लगाने की अनुमति दी गई है।

फोटो साभार: गूगल                                      

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान परमाणु ऊर्जा से जुड़ा ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ यानी शांति विधेयक, 2025 दोनों सदनों से पारित हो गया है। पहले यह विधेयक लोकसभा से पास हुआ और गुरुवार यानी 18 दिसंबर 2025 को राज्यसभा की मंजूरी के बाद संसद की प्रक्रिया पूरी हो गई। इस बिल के तहत परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों को बिजली उत्पादन के लिए परमाणु रिएक्टर लगाने की अनुमति दी गई है। सरकार का कहना है कि इससे देश में ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा और विकास को गति मिलेगी जबकि विपक्ष ने आशंका जताई है कि इससे निजी कंपनियों को फायदा पहुंचेगा और सुरक्षा व जिम्मेदारी से जुड़े प्रावधान कमजोर होंगे। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि दायित्व से जुड़े नियमों में जरूरत के अनुसार लचीलापन रखा जा सकता है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विधेयक के पारित होने को देश के लिए एक महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी कदम बताया है।

सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि शांति विधेयक, 2025 देश के भविष्य के लिए एक अहम कदम है। सदन में इसे ऐतिहासिक बताते हुए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की वैश्विक भूमिका लगातार बढ़ रही है इसलिए ऊर्जा के क्षेत्र में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के कदम उठाने जरूरी हैं। उन्होंने बताया कि 2047 तक 100 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य को पूरा करने में परमाणु ऊर्जा की बड़ी भूमिका होगी। सरकार के मुताबिक यह बिल बढ़ती बिजली की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूत करेगा।

विरोध की आवाज़


वहीं इस बिल के खिलाफ कई संगठनों ने आपत्ति जताई है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) ने घोषणा की है कि वह 23 दिसंबर को केंद्रीय श्रमिक संगठनों और संयुक्त किसान मोर्चा के साथ मिलकर देशभर में विरोध प्रदर्शन करेगा। संगठन का आरोप है कि इस विधेयक से परमाणु क्षेत्र निजी और विदेशी कंपनियों के लिए खुल जाएगा जिससे परमाणु सुरक्षा और जिम्मेदारी से जुड़े नियम कमजोर पड़ सकते हैं।

बजट में पहले ही मिल गया था संकेत

फरवरी में पेश किए गए बजट भाषण में ही सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव की झलक दे दी थी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने न्यूक्लियर एनर्जी मिशन की घोषणा करते हुए छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR के रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए 20 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। सरकार का कहना है कि इसका मकसद स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देना है और 2033 तक देश में 5 स्वदेशी SMR को चालू करने का लक्ष्य रखा गया है।

बिल है किस क्षेत्र के लिए?

शांति विधेयक का संबंध भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से है। सरकार के अनुसार इस कानून के लागू होने के बाद परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी संभव हो सकेगी और इस सेक्टर पर सरकार का अकेला नियंत्रण खत्म होगा। यानी अब बिजली उत्पादन जैसे कामों में प्राइवेट कंपनियों को भी मौका दिया जाएगा। बिल के पारित होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि यह कदम तकनीक और ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाएगा। उन्होंने बताया कि इससे सुरक्षित तकनीक को बढ़ावा मिलेगा ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग को ताकत मिलेगी और स्वच्छ ऊर्जा पर आधारित भविष्य की दिशा में देश आगे बढ़ेगा।

इस विधेयक के जरिए सरकार का रुख साफ़ तौर पर परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में दिखता है। शांति विधेयक 2025 के तहत अब बिजली उत्पादन के लिए निजी कंपनियों को परमाणु रिएक्टर लगाने की अनुमति दी जाएगी जिससे इस क्षेत्र में सरकार का अब तक का एकाधिकार कमजोर होगा। सरकार इसे ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और विकास से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्ष और कई संगठन इसे परमाणु क्षेत्र के निजीकरण की ओर बढ़ता कदम मान रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में जिंदल जैसी निजी कंपनियों को कोयला खनन, बिजली उत्पादन और ऊर्जा से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट दिए जाने को भी इसी नीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि चाहे कोयला हो या परमाणु ऊर्जा, सरकार धीरे-धीरे अहम ऊर्जा संसाधनों को निजी कंपनियों के लिए खोल रही है। उनका तर्क है कि इससे मुनाफा निजी कंपनियों को होगा, जबकि सुरक्षा, जवाबदेही और स्थानीय लोगों के हितों पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

 

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