नोएडा में अब किसी भी सफाई कर्मी को सीवर या नाले में उतारने से पहले उसकी स्वास्थ्य जांच अनिवार्य कर दी गई है। यह फैसला हाल की समीक्षा बैठकों और सफाई कर्मियों से जुड़े हादसों को देखते हुए लिया गया है।
देश में स्वच्छता की तस्वीर जिन हाथों से बनती है वही हाथ सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। बड़े-बड़े दावों और अभियानों के बीच सफाई कर्मियों की ज़िंदगी आज भी जोखिम के साए में गुजर रही है। सफाई कर्मचारी नालों और गंदगी से भरे गड्ढों में उतरकर काम करना उनके लिए रोज़मर्रा की मजबूरी है जहां ज़हरीली गैस, संक्रमण और मौत का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में नोएडा में सफाई कर्मियों की सुरक्षा को लेकर लिया गया नया फैसला एक अहम कदम माना जा रहा है लेकिन यह फैसला सिर्फ सुरक्षा तक सीमित है या इसके पीछे कई अनदेखे सवाल भी छिपे हैं यह समझना भी उतना ही जरूरी है।
नोएडा में अब किसी भी सफाई कर्मी को सीवर या नाले में उतारने से पहले उसकी स्वास्थ्य जांच अनिवार्य कर दी गई है। यह फैसला हाल की समीक्षा बैठकों और सफाई कर्मियों से जुड़े हादसों को देखते हुए लिया गया है। इसका मकसद साफ है कि जोखिम भरे काम के दौरान किसी भी तरह की अनहोनी को रोका जाए और कर्मचारियों की जान को खतरे में न डाला जाए।
समीक्षा बैठक से निकला फैसला
दरअसल बीते दिनों लखनऊ में सफाई व्यवस्था और सफाई कर्मियों की स्थिति को लेकर एक अहम समीक्षा बैठक हुई थी। इस बैठक में आयोग और मंत्रालय के सचिव ने साफ शब्दों में कहा था कि बिना मेडिकल जांच के सफाई कर्मियों को सीवर या नालों में उतारना बेहद खतरनाक है। उन्होंने यह भी कहा है कि सफाई के नाम पर किसी इंसान की जान को जोखिम में डालना किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
इसी बैठक के बाद अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि सफाई कर्मियों की सेहत को प्राथमिकता में रखते हुए मज़बूत और व्यावहारित व्यवस्था लागू की जाए। इसके तहत नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना क्षेत्र और दादरी-जेवर नगर पालिका में काम करने वाले सफाई कर्मियों के लिए स्वास्थ्य जांच को अनिवार्य किया गया है।
राष्ट्रीय सफाई कर्मी आयोग की भूमिका
बता दें इस फैसले के पीछे राष्ट्रीय सफाई कर्मी आयोग की सिफारिशों का भी अहम योगदान रहा है। आयोग लंबे समय से यह मुद्दा उठाता रहा है कि सफाई कर्मियों को बिना किसी सुरक्षा और जांच के बेहद खतरनाक कामों में झोंक दिया जाता है। खबरों के अनुसार आयोग का कहना है कि यह सिर्फ नियमों और कागज़ी आदेशों का मामला नहीं है बल्कि सीधे तौर पर सफाई कर्मियों की जिंदगी और सम्मान से जुड़ा सवाल है। इन्हीं सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों ने यह भी साफ कर दिया है कि अब किसी भी हाल में हाथ से सीवर या नालों की सफाई नहीं कराई जाएगी। सफाई का काम मशीनों और आधुनिक उपकरणों से ही कराया जाएगा ताकि कर्मचारियों को जहरीली गैस और गंदगी के सीधे संपर्क में आने से बचाया जा सके।
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कौन-कौन सी जांच होगी अनिवार्य?
जागरण के खबर अनुसार डिप्टी सीएमओ डॉ. संजीव सारस्वत ने बताया है कि सीवर और नालों की सफाई के दौरान कर्मचारियों को कई तरह के गंभीर खतरे झेलने पड़ते हैं। जहरीली गैस, संक्रमण, सांस की बीमारी और दिल से जुड़ी समस्याएं आम हैं। कई मामलों में पहले से बीमार कर्मचारी इस काम के दौरान अचानक गंभीर हालत में पहुंच जाते हैं। इसी को देखते हुए अब तय किया गया है कि हर सफाई कर्मी की मेडिकल जांच की जाएगी। इसमें ब्लड प्रेशर, अस्थमा, टीबी, ईसीजी जैसी जरूरी जांच शामिल होंगी। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय होगा कि कर्मचारी को जोखिम वाला काम सौंपा जाएगा या नहीं।
सीएमओ डॉ. नरेंद्र कुमार के मुताबिक सफाई कर्मी जिला अस्पताल, सीएचसी या नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जांच करा सकते हैं। जांच की रिपोर्ट कार्यालय में जमा करनी होगी। इन नियमों का उल्लंघन करने पर एजेंसी और कर्मचारियों दोनों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
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सुरक्षा जरूरी लेकिन सुविधाएं कहां हैं?
यह फैसला सुनने में बेहद सकारात्मक लगता है लेकिन इसके साथ कुछ बुनियादी सवाल भी खड़े होते हैं। अगर सफाई कर्मियों की स्वास्थ्य जांच अनिवार्य की जा रही है तो काम के दौरान जरूरी सुरक्षा सुविधाएं क्यों नहीं दी जा रहीं?
आज भी कई जगह सफाई कर्मी बिना दस्ताने, बिना मास्क और बिना सेफ्टी सूट के सीवर और नालों में उतरते हैं। जहरीली गैस से बचाने वाले सुविधा ऑक्सीजन मास्क और सही मशीनें ज़्यादातर मामलों में मौजूद ही नहीं होतीं। अगर ये सुविधाएं समय पर और नियमित रूप से दी जाएं तो शायद स्वास्थ्य जांच की जरूरत ही कम पड़ जाए।
शराब पीकर काम करने की मजबूरी
एक कड़वा सच यह भी है कि कई सफाई कर्मी इस तरह का खतरनाक काम करने से पहले शराब पीते हैं। वजह साफ है कि नशे की हालत में गंदगी, बदबू और डर का अहसास कुछ कम हो जाता है। यह उनकी मजबूरी है शौक नहीं।
अब सवाल यह है कि जब स्वास्थ्य जांच होगी और ऐसे कर्मचारी अयोग्य पाए जाएंगे तो उनका क्या होगा? क्या उन्हें काम से हटा दिया जाएगा? अगर ऐसा हुआ तो ये लोग सीधे बेरोजगारी की कतार में खड़े हो जाएंगे। सरकार और प्रशासन के पास इस स्थिति का कोई स्पष्ट जवाब फिलहाल नजर नहीं आता दिख रहा है।
मशीनें बनाम मजदूर
पिछले कुछ सालों में सफाई के काम में मशीनों का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है हलकी कुछ हद तक मशीनों द्वारा काम ठीक मानी जा सकती है लेकिन कई जगह यह मशीनरीकरण मजदूरों की रोज़ी-रोटी पर असर डाल रहा है।
अब सवाल यह नहीं है कि मशीनें हों या न हों सवाल यह है कि क्या मशीनों को मजदूरों की जगह लेने के बजाय उनकी मदद के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता? अगर मशीनें सफाई कर्मियों के साथ मिलकर काम करें तो न सिर्फ काम सुरक्षित होगा बल्कि लोगों का रोज़गार भी बना रहेगा।
सुविधाओं की कमी
देखा जाए तो देश में स्वच्छ भारत अभियान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सफाई कर्मियों के कंधों पर है। शहरों को साफ रखने की कीमत वे अपनी सेहत और कभी-कभी अपनी जान देकर चुकाते हैं। बड़े नालों और सीवरों में उतरकर सफाई के दौरान मजदूरों की मौत की खबरें आए दिन सामने आती रहती हैं।इसके बावजूद उनकी स्थिति आज भी बेहद दयनीय है। सुरक्षा उपकरण, स्थायी नौकरी, बीमा और सम्मानजनक वेतन इन सबकी बात अक्सर सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाती है।
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फैसला सही लेकिन अधूरा
नोएडा में लिया गया यह फैसला सफाई कर्मियों की सुरक्षा की दिशा में एक जरूरी कदम है। इसका विरोध नहीं किया जा रहा है लेकिन यह भी सच है कि सिर्फ मेडिकल जांच से समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है। जब तक सफाई कर्मियों को पूरी सुरक्षा, जरूरी सुविधाएं स्थायी रोजगार और सम्मान नहीं मिलेगा तब तक ऐसे फैसले अधूरे ही रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि सफाई कर्मियों को सिर्फ जोखिम वाला काम करने वाला मजदूर नहीं स्वच्छता की रीढ़ मानकर नीतियां बनाई जाएं। तभी यह कदम सच मायनों में उनको सुरक्षा देगी।
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