उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘चाणक्य’ माने जाने वाले और बुंदेलखंड के सबसे कद्दावर मुस्लिम चेहरों में शुमार नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने एक बार फिर सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। 15 फरवरी 2026 को सिद्दीकी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अपना इस्तीफा सौंपकर समाजवादी पार्टी (सपा) की सदस्यता ग्रहण कर ली।
लेखन – गीता देवी, मीरा देवी
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे और मायावती के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार रहे सिद्दीकी का यह कदम 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश के जातीय और धार्मिक समीकरणों को बदलने वाला माना जा रहा है।
सिद्दीकी ने स्पष्ट किया कि जिस विजन और उद्देश्य के साथ वह कांग्रेस में शामिल हुए थे, वहां वह लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा था। उनके इस फैसले ने न केवल कांग्रेस को झटका दिया है, बल्कि पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में सपा के लिए नई संभावनाएं खोल दी हैं।
प्रारंभिक जीवन: स्योढ़ा गांव से सत्ता के गलियारों तक
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 4 जून 1959 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के स्योढ़ा गांव (महुआ ब्लॉक) में हुआ था। एक साधारण परिवार में जन्मे सिद्दीकी की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा बांदा में ही हुई। राजनीति में आने से पहले वह एक खिलाड़ी के रूप में पहचाने जाते थे; वह राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं।
खेल के मैदान से निकलकर उन्होंने अपनी जीविका के लिए रेलवे में ठेकेदारी का कार्य भी किया। बांदा शहर में उनका आवास आज भी उनकी जमीनी राजनीति का केंद्र माना जाता है। वह वर्तमान में अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रहते हैं, जो स्वयं भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं।
राजनीतिक सफर का आगाज: हार से मिली जीत की सीख
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के राजनीतिक करियर की शुरुआत बहुत आसान नहीं थी।
* 1988: उन्होंने पहली बार बांदा नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
* बसपा में प्रवेश: हार के बावजूद उनके तेवरों ने कांशीराम और मायावती का ध्यान खींचा और वह बसपा में शामिल हो गए।
* 1991 की ऐतिहासिक जीत: बसपा के टिकट पर उन्होंने बांदा सदर सीट से विधानसभा चुनाव जीता। यह बांदा के इतिहास में पहली बार था जब कोई मुस्लिम नेता विधायक के रूप में चुनकर विधानसभा पहुंचा था।
बसपा शासन और सत्ता का शिखर
मायावती के शासनकाल में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कद इतना बड़ा था कि उन्हें ‘सुपर सीएम’ तक कहा जाने लगा था। उनके पास एक समय में दर्जन भर से ज्यादा महत्वपूर्ण विभाग हुआ करते थे।
* 1995: मायावती की पहली सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।
* 1997: दूसरी बार कैबिनेट का हिस्सा रहे (21 मार्च से 21 सितंबर)।
* 2002-2003: तीसरी बार मायावती सरकार में कबीना मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली।
* 2007-2012: यह उनके करियर का स्वर्ण काल था। बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार में वह लोक निर्माण विभाग (PWD), आबकारी और ऊर्जा जैसे भारी-भरकम विभागों के मंत्री रहे।
उन्होंने न केवल यूपी बल्कि उत्तराखंड और दिल्ली में भी बसपा के प्रभारी के रूप में संगठन को खड़ा किया। उनकी पत्नी हुस्ना सिद्दीकी पांच वर्षों तक एमएलसी रहीं और उनके बेटे अफजल सिद्दीकी ने 2014 में फतेहपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा।
बुंदेलखंड के ‘विकास का मसीहा’ वाली छवि
नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बांदा और आसपास के क्षेत्रों में विकास पुरुष के रूप में देखा जाता है। उनके प्रयासों से ही बांदा जैसे पिछड़े इलाके में निम्नलिखित बड़े बदलाव आए:
* राजकीय मेडिकल कॉलेज: बांदा में मेडिकल कॉलेज की स्थापना को उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
* कृषि विश्वविद्यालय: किसानों के हित के लिए उन्होंने कृषि विश्वविद्यालय की नींव रखवाई।
* बुनियादी ढांचा: बिजली, पानी और सड़कों का जाल बिछाकर उन्होंने बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने की कोशिश की।
बसपा से निष्कासन और कांग्रेस का सफर
2012 के चुनाव में बसपा की हार के बाद सिद्दीकी और मायावती के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद यह मतभेद चरम पर पहुंच गए और मायावती ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया।
* गंभीर आरोप: निष्कासन के बाद सिद्दीकी ने मायावती पर धन उगाही और तानाशाही के गंभीर आरोप लगाकर ऑडियो क्लिप्स जारी कीं, जिसने यूपी की राजनीति में भूचाल ला दिया था।
* 2018 (कांग्रेस प्रवेश): इसके बाद वह दिल्ली में राहुल गांधी और गुलाम नबी आजाद की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल हुए। कांग्रेस ने उन्हें पश्चिमी यूपी का प्रांतीय अध्यक्ष बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दी, लेकिन पुराने दौर जैसा राजनीतिक प्रभाव दोबारा स्थापित करने में उन्हें संघर्ष करना पड़ा।
सपा में शामिल होने के मायने: क्या बदलेगा समीकरण?
2026 में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में जाना महज एक दल-बदल नहीं है, बल्कि एक सधी हुई रणनीति का हिस्सा है:
* मुस्लिम वोट बैंक: सपा को उम्मीद है कि सिद्दीकी के आने से पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड का मुस्लिम मतदाता पूरी तरह सपा की ओर झुक जाएगा।
* अनुभव का लाभ: अखिलेश यादव को सिद्दीकी के उस अनुभव की जरूरत है, जिससे उन्होंने कभी बसपा का कैडर खड़ा किया था।
* दलित-मुस्लिम गठजोड़: सिद्दीकी आज भी दलित समुदायों के बीच अपनी पैठ रखते हैं। सपा इसका फायदा उठाकर ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और मजबूत करना चाहती है।
दलबदलू की फेहरिस्त में नया नाम?
बुंदेलखंड की राजनीति में अब तक बीजेपी पार्टी के नेता आर.के. पटेल जैसे नेताओं को दल बदलने के लिए चर्चा में रखा जाता था लेकिन अब इस सूची में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम भी जुड़ गया है। आलोचक भले ही उन्हें ‘दलबदलू’ कहें लेकिन समर्थक इसे ‘समय की मांग’ और ‘जनहित का फैसला’ बता रहे हैं।
2027 के चुनाव की दहलीज पर खड़े उत्तर प्रदेश के लिए सिद्दीकी का सपा में जाना एक नई इबारत लिख सकता है। क्या वह सपा को बुंदेलखंड में खोई हुई जमीन वापस दिला पाएंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल उन्होंने सूबे की सियासी गर्मी को चरम पर पहुंचा दिया है।
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