मध्य प्रदेश के छतरपुर के ज़िला अस्पताल के वार्डों की हालत बेहद खराब स्थिति में है। बिस्तरों से लेकर दीवारों तक कॉकरोच (तिलचट्टा) नजर आते हैं।कॉकरोच शरीर पर चढ़ते हैं, बच्चों के बिस्तरों में घूमते हैं, यहां तक कि कानों में घुस जाने तक की शिकायतें सामने आई हैं।
रिपोर्टिंग – अलीमा, लेखन – रचना
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिला का जिला अस्पताल कागजों और बाहर से देखने में भले ही बड़ा और व्यवस्थित लगे लेकिन अंदर की सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है। यह वही अस्पताल है जहां पूरे जिले के लोग उम्मीद लेकर इलाज कराने पहुंचते हैं लेकिन यहां पहुंचकर उन्हें राहत नहीं बल्कि उल्टा नई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
अस्पताल के वार्डों की हालत बेहद खराब स्थिति में है। जहां मरीजों को आराम और साफ माहौल मिलना चाहिए वहां कॉकरोचों का आतंक फैला हुआ है। बिस्तरों से लेकर दीवारों तक कॉकरोच (तिलचट्टा) नजर आते हैं। अस्पताल में भर्ती मरीज बताते हैं कि रात में सोना तक मुश्किल हो जाता है। कॉकरोच शरीर पर चढ़ते हैं, बच्चों के बिस्तरों में घूमते हैं, यहां तक कि कानों में घुस जाने तक की शिकायतें सामने आई हैं।
यह कोई एक-दो दिन की समस्या नहीं है। पिछले करीब तीन महीनों से यही हाल बना हुआ है। बीच-बीच में दवा का छिड़काव किया जाता है जिससे कुछ समय के लिए हालात सुधरते हैं लेकिन फिर वही गंदगी और कॉकरोच लौट आते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अस्पताल जो इलाज की सबसे सुरक्षित जगह मानी जाती है वहीं अस्वच्छ हो जाए तो मरीज कहां जाएं? लोग यहां बीमारी से राहत पाने आते है लेकिन गंदगी और लापरवाही के कारण उनका स्वास्थ्य और ज्यादा खतरे में पड़ रहा है। यह स्थिति सिर्फ एक अस्पताल की नहीं ये उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है जहां बुनियादी साफ-सफाई जैसी जरूरी चीजें भी सुनिश्चित नहीं हो पा रही हैं।
बता दें कि अस्पताल में साफ-सफाई की बदहाल स्थिति की यह कोई पहली तस्वीर नहीं है। इससे पहले भी कई बार इस तरह की शिकायतें सामने आ चुकी हैं जहां मरीजों और उनके परिजनों ने गंदगी और लापरवाही को लेकर सवाल उठाए हैं।
छतरपुर जिला अस्पताल : सफाई के दावे फेल, गंदगी और बदबू से परेशान ग्रामीण
डिलीवरी वार्ड में कॉकरोचों का आतंक
छतरपुर जिला के इस जिला अस्पताल का यह दृश्य उस वार्ड का है जहां महिलाओं की डिलीवरी होती है। यहां प्रसव के बाद महिलाओं को उनके नवजात बच्चों के साथ बेड पर रखा जाता है लेकिन जिस माहौल में उन्हें रहना पड़ रहा है वह बेहद चिंताजनक है। वार्ड में मौजूद महिलाओं ने बताया कि यहां कॉकरोचों की संख्या इतनी ज्यादा है कि छोटे-छोटे बच्चों तक के लिए खतरा बन गई है। कुछ महिलाओं ने आरोप लगाया कि कॉकरोच बच्चों के कानों तक में घुस जाते हैं। हालात ऐसे हैं कि डर के चलते महिलाएं रात में सोते वक्त अपने कानों में रुमाल या दुपट्टा बांधने को मजबूर हैं।
समीकरण मोहल्ले से आई रुबीना खातून बताती हैं कि उनकी डिलीवरी 30 मार्च को हुई थी। बच्चे की तबीयत ठीक न होने की वजह से उसे मशीन में रखा गया है जबकि उन्हें वार्ड में ही रहना पड़ रहा है। उनका कहना है कि जब से वे यहां भर्ती हैं तब से ठीक से सो नहीं पाई हैं। कभी सिर पर तो कभी हाथ-पैरों पर कॉकरोच चढ़ जाते हैं जिससे उन्हें लगातार डर बना रहता है।
वहीं रुबीना कहती हैं कि अगर उनका बच्चा भी उनके साथ बेड पर होता तो उसके लिए और ज्यादा खतरा होता। कॉकरोचों के कारण इंफेक्शन फैलने का डर बना रहता है। उनका कहना है कि अस्पताल में बाकी सुविधाएं तो हैं लेकिन कॉकरोचों से निपटने के लिए दवा का सही तरीके से छिड़काव नहीं किया जाता जिसकी वजह से यह समस्या लगातार बनी हुई है।
कॉकरोच के बीच खाना खाने को मजबूर मरीज
यह अस्पताल के चौथे फ्लोर की तस्वीर है जहां एक्सीडेंट के मरीज भर्ती हैं। दूर-दराज से आए मरीज यहां इलाज के लिए तो पहुंचते हैं लेकिन उन्हें जिन हालातों में रहना पड़ रहा है वो बेहद परेशान करने वाले हैं।
43 साल के रमेश पटेल जो बड़ा मलहरा के नगवा गांव से आए हैं वो पिछले 10 दिनों से यहां भर्ती हैं। 15 मार्च से वे अकेले ही अस्पताल में हैं। उनका कहना है कि खाना तो अस्पताल से मिल जाता है लेकिन उसे सुरक्षित रखना मुश्किल है। जैसे ही खाना थोड़ी देर के लिए रखा जाता है उस पर कॉकरोच चढ़ जाते हैं। इसलिए उन्हें मजबूरी में खाना तुरंत खाना पड़ता है।
रमेश बताते हैं कि यहां कोई भी चीज खुली नहीं रख सकते हर जगह कॉकरोच घूमते रहते हैं। इससे बीमारी बढ़ने का डर बना रहता है। उनका कहना है “हम पहले से बीमार हैं ऊपर से अगर कॉकरोच वाला खाना खाएं तो हालत और खराब हो जाएगी लेकिन हम इतने सक्षम नहीं हैं कि हर बार खाना फेंक दें मजबूरी में वही खाना पड़ता है।”
कॉकरोच के बीच नवजात का दूध पिलाने को मजबूर परिवार
नौगांव ब्लॉक के शीला गांव से आए 33 वर्षीय राहुल रजक पिछले एक महीने से ज्यादा समय से जिला अस्पताल में रह रहे हैं। उनकी पत्नी की 27 फरवरी को ऑपरेशन से डिलीवरी हुई थी और बच्चे की हालत नाजुक होने के कारण उन्हें यहीं रुकना पड़ा। राहुल बताते हैं कि उनका गांव अस्पताल से करीब 70 किलोमीटर दूर है इसलिए बार-बार आना-जाना संभव नहीं है। वे अस्पताल में ही रहकर पत्नी और बच्चे का ख्याल रख रहे हैं। खाना और बच्चे का दूध अस्पताल से मिल जाता है लेकिन उसे सुरक्षित रखना एक बड़ी समस्या बन गया है।
उनका कहना है कि दूध को वे बाहर चाय की दुकानों से गरम करवाकर रखते हैं लेकिन जैसे ही उसे वार्ड में रखते हैं कॉकरोच उसमें गिर जाते हैं। मजबूरी में वे कॉकरोच निकालकर वही दूध फिर इस्तेमाल करते हैं।
वे आगे बताते हैं कि अस्पताल में बाकी सुविधाएं जैसे समय पर इंजेक्शन मिलना ठीक है लेकिन कॉकरोच की समस्या बेहद गंभीर है जिससे संक्रमण का खतरा बना रहता है। उनका आरोप है कि अगर समय पर दवाई का छिड़काव किया जाता तो यह स्थिति नहीं बनती।
राहुल यह भी कहते हैं कि वे लोग शिकायत करने से डरते हैं। “डर लगता है कि अगर कुछ कहेंगे तो डॉक्टर या स्टाफ नाराज हो जाएंगे और कहेंगे कि फ्री में इतना मिल रहा है और क्या चाहिए।” यह बयान सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है उन कई परिवारों की हकीकत को दिखाता है जो इलाज के लिए अस्पताल में रहते हुए भी डर और मजबूरी के बीच जी रहे हैं।
सफाई सिर्फ दिखावे की, कॉकरोचों से परेशान बुजुर्ग मरीज
जिला अस्पताल में भर्ती 60 वर्षीय भवानी बाई अपने पति के साथ बीते कई दिनों से परेशान हैं। उनके पति को पेट दर्द की शिकायत के चलते 29 मार्च से यहां भर्ती कराया गया है। उम्र के इस पड़ाव पर जहां उन्हें आराम और देखभाल की जरूरत है वहीं अस्पताल की हालत उनकी मुश्किलें और बढ़ा रही है।
भवानी बाई बताती हैं कि वार्ड में कॉकरोचों की भरमार है। ये कभी कानों में घुस जाते हैं तो कभी खाने को खराब कर देते हैं। वे कहती हैं “गद्दे उठाकर देखो तो नीचे इतने कॉकरोच होते हैं कि खाना खाने का मन ही नहीं करता।” उनका कहना है कि जब उन्होंने इस बारे में नर्स से शिकायत की तो जवाब मिला “हम क्या करें?” इस जवाब से उनकी बेबसी और बढ़ जाती है।
भवानी बाई का कहना है कि अस्पताल जितना बड़ा होता जा रहा है उतनी ही गंदगी और कॉकरोच बढ़ते जा रहे हैं। वे बताती हैं
“इंसान यहां ठीक होने आता है लेकिन इन हालातों में और बीमार पड़ने का डर रहता है।” वो यह भी कहती हैं कि शिकायत करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि सुनवाई ही नहीं होती। “जब कोई अधिकारी आता है तब थोड़ी बहुत सफाई हो जाती है लेकिन उसके बाद फिर वही हाल हो जाता है।” उनका मानना है कि अगर ठीक से और नियमित सफाई हो।
अस्पताल प्रशासन का दावा, साफ-सफाई की जाती है
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. शरद चौरसिया से इस मामले पर बात की गई जिसमें उनका कहना है कि अस्पताल में नियमित रूप से साफ-सफाई करवाई जाती है। उनके मुताबिक सफाई कर्मचारी दिन में दो बार वार्डों की सफाई करते हैं और समय-समय पर कॉकरोच खत्म करने के लिए दवाई का छिड़काव भी किया जाता है।
उन्होंने बताया कि कभी-कभी एक-दो कॉकरोच रह जाते हैं जो अंडे देकर तेजी से बढ़ जाते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अब तक किसी मरीज ने यह शिकायत नहीं की थी कि बेडों में बड़ी संख्या में कॉकरोच हैं।
उन्होंने माना कि अब जब यह मामला सामने आया है तो इसकी दोबारा जांच करवाई जाएगी। उन्होंने कहा “अगर कहीं ज्यादा संख्या में कॉकरोच पाए जाते हैं तो वहां तुरंत दवाई का छिड़काव कराया जाएगा।” सिविल सर्जन के मुताबिक अस्पताल में हर 15 दिन में नियमित रूप से दवाई का छिड़काव किया जाता है ताकि साफ-सफाई बनी रहे।
अस्पताल की यह तस्वीर सिर्फ एक जगह की समस्या नहीं बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को सामने लाती है। जहां एक तरफ अस्पतालों को बेहतर बनाने के दावे किए जाते हैं वहीं दूसरी तरफ मरीज बुनियादी साफ-सफाई जैसी जरूरतों के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं।
यह पहली बार नहीं है जब अस्पतालों की ऐसी बदहाल स्थिति सामने आई हो। इससे पहले भी मध्य प्रदेश से ही एक खबर आई थी जहां अस्पताल में मरीज के बिस्तर पर चूहे घूमते नजर आए थे। चूहे के काटने से दो नवजात की जान भी चली गई थी। ऐसे मामले यह दिखाते हैं कि समस्या सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं है यह एक बड़ी और लगातार बनी हुई लापरवाही का हिस्सा है।
उन्होंने बताया “वैसे तो हम लोग हर 15 दिन में साफ-सफाई का ध्यान रखते हुए दवाई का छिड़काव करते हैं।
15 जनवरी 2026 को जिला चिकित्सालय में दवाई का छिड़काव हुआ था क्योंकि 17 जनवरी को हमारे जिला चिकित्सालय में दिल्ली की टीम को निरीक्षा करने आना था उससे मैं 15 जनवरी को पूरे जिला अस्पताल की साफ सफाई करवाई थी और दवाई का छिड़काव किया था।”
उन्होंने बताया कॉकरोच अगर खाने में चढ़ते हैं उससे कई तरह की बीमारियां होती है पेट दर्द होता है इनके संपर्क में आने से फूड प्वाइजनिंग, दस्त, उल्टी, एलर्जीसे जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। इन्होंने यह भी कहा कि “मैं कल से ही उसमें दवाई छिड़कवाने का काम करवाता हुं।”
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