कंचन बताती हैं कि तीसरी मंज़िल पर पानी की सुविधा न होने से उनकी 65 वर्षीय सास को रोज़ कई बार नीचे उतरना पड़ता है। उन्होंने कहा “मेरी डिलीवरी हुई है, मैं ऊपर से नीचे नहीं जा सकती। मेरी बूढ़ी सास ही मेरे साथ हैं। उन्हें सीढ़ियों से नीचे जाकर पानी लाना पड़ता है, जबकि दो बोतल पानी दिनभर नहीं चलता। अगर तीसरी मंज़िल पर भी वाटर कूलर या टंकी की व्यवस्था हो जाए तो हम लोगों को बहुत राहत मिले।”
रिपोर्ट – अलीमा तरन्नुम, लेखन – सुचित्रा
अस्पताल जहां लोग अपने बेहतर स्वास्थ्य के लिए अस्पताल जाते हैं लेकिन जब अस्पताल में ही वो सुविधा न हो तो इंसान किससे उम्मीद करे? मध्य प्रदेश, छतरपुर के जिला अस्पताल की सच्चाई भी कुछ ऐसी ही है जहां मरीजों की शिकायत है कि पीने के पानी जैसी सबसे बुनियादी सुविधा तीसरी और चौथी मंज़िल पर नहीं है। खबर लहरिया की रिपोर्टिंग में यह सामने आया कि मरीज किस तरह मज़बूरी में यहां रहते हैं और इलाज के लिए आते हैं।
रिपोर्ट में पाया गया कि पानी न होने की वजह से यहां रोज़ाना सैकड़ों मरीज और उनके परिजन भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। हालात यह हैं कि डिलीवरी, ऑपरेशन और एक्सीडेंट वाले गंभीर मरीजों के परिजन भी चार मंज़िल नीचे उतरकर बोतलों में पानी भरने को मजबूर हैं। पिछले आठ महीनों से यह समस्या लगातार बनी हुई है।
अस्पताल में रोज़ 200–250 मरीज भर्ती होते हैं जिनमें 20–25 डिलीवरी और कई एक्सीडेंट केस शामिल होते हैं। पानी की सुविधा केवल नीचे है यानी ग्राउंड फ्लोर पर है जबकि तीसरी और चौथी मंज़िल पर न तो टंकी है और न ही वाटर कूलर। पहले ऊपरी मंज़िलों पर पानी की टंकी लगी थी लेकिन उसके फूट जाने के बाद से स्थिति बदतर हो गई है।
मरीजों और परिजनों की परेशानी
डिलीवरी, ऑपरेशन और एक्सीडेंट वाले मरीजों के साथ अक्सर केवल एक ही परिजन रहता है। ऐसे में पानी की जरूरत पड़ने पर उन्हें मरीज को अकेला छोड़कर नीचे तक उतरना पड़ता है जो कई बार जोखिम भरा और बेहद तकलीफ़देह साबित होता है।
कंचन बताती हैं कि तीसरी मंज़िल पर पानी की सुविधा न होने से उनकी 65 वर्षीय सास को रोज़ कई बार नीचे उतरना पड़ता है। उन्होंने कहा “मेरी डिलीवरी हुई है, मैं ऊपर से नीचे नहीं जा सकती। मेरी बूढ़ी सास ही मेरे साथ हैं। उन्हें सीढ़ियों से नीचे जाकर पानी लाना पड़ता है, जबकि दो बोतल पानी दिनभर नहीं चलता। अगर तीसरी मंज़िल पर भी वाटर कूलर या टंकी की व्यवस्था हो जाए तो हम लोगों को बहुत राहत मिले।”
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वहां आई महिला सुमन ने बताया कि उनकी बेटी की डिलीवरी के बाद उसे चौथी मंज़िल पर शिफ्ट किया गया। वे कहती हैं कि “घर वाले खाना और पानी लाते हैं, लेकिन पानी खत्म होने पर नीचे जाना पड़ता है। ऊपर किसी भी वार्ड में पीने का पानी नहीं है। हमने कई बार कहा, लेकिन जवाब मिलता है -‘पानी नीचे से लो’। अब बताओ मरीज को छोड़कर कैसे जाएँ?”
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मोनू बताते हैं कि उनका पैर काटने का ऑपरेशन होना है और उनके साथ केवल पत्नी है। वे उन्होंने कहा “अगर वो (उनकी पत्नी) पानी लेने नीचे जाती हैं और मुझे वॉशरूम जाना पड़ जाए तो मैं कैसे जाऊँ? चार मंज़िल नीचे उतरकर पानी लाना बहुत मुश्किल है। इतना बड़ा अस्पताल है लेकिन किसी भी वार्ड में पीने का पानी नहीं! खाना देने कर्मचारी आ जाते हैं पर पानी मांगो तो कहते हैं‘नीचे से लो’। हम चाहते हैं कि ऊपर पानी की तुरंत व्यवस्था हो।”
“हम प्रयास कर रहे हैं कि ऊपर फिर से टंकी लगाई जाए।” – सिविल सर्जन डॉ. शरद चौरसिया
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. शरद चौरसिया ने बताया कि अस्पताल निर्माण के समय हर वार्ड में नल लगाए गए थे जिनका कनेक्शन नीचे से था लेकिन कई परिजनों द्वारा बार-बार नल तोड़ देने से यह व्यवस्था बंद करनी पड़ी।
डॉ. चौरसिया ने कहा “हम प्रयास कर रहे हैं कि ऊपर फिर से टंकी लगाई जाए या वाटर कूलर स्थापित किया जाए। जल्द ही पीने के पानी की सुविधा हर वार्ड में उपलब्ध कराने की कोशिश है। पहले भी नल लगे थे, लेकिन लोगों ने ही तोड़ दिए। अब ऐसी व्यवस्था करेंगे जो टिकाऊ हो।”
सरकार एक तरफ स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता अभियान चलाती है और सरकारी सुविधाओं की वाहवाही करती हैं लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और है। सरकारी अस्पतालों की लचर व्यवस्था की वजह से ही लोग प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करना ज्यादा बेहतर समझते हैं लेकिन जिनके पास पैसे नहीं है वो क्या कर सकते। उन्हें ये सब परेशानियों को सामना करते हुए सरकारी अस्पताल में आना पड़ता है जबकि उन्हें पता है यहां की व्यवस्था में सुधार नहीं होने वाला है।
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