मध्य प्रदेश के भोपाल के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के दिन के भोजन की लागत 33 रुपए है। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक चिंता वाली बात यह है कि इसके मुकाबले सरकारी गौशालों और जेल के कैदियों के खाने पर खर्च होने वाले रुपए ज्यादा है। यह घटना तब सामने आई जब शुक्रवार 19 दिसंबर को उज्जैन के माधव नगर सरकारी अस्पताल में भर्ती कुछ मरीजों ने उन्हें परोसे जा रहे घटिया भोजन का वीडियो बनाया और बाद में यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। खबर लहरिया के अनुसार एमपी के सरकारी अस्पताल में भोजन ही नहीं बल्कि बुनियादी जरूरतें भी मौजूद नहीं है जिसकी वजह से मरीजों को परेशानी होती है।

भोपाल के जय प्रकाश (जेपी) अस्पताल ((Jay Prakash Hospital) की तस्वीर (फोटो साभार : Bajaj Finserv Health)
मध्य प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों की हकीकत जमीनी स्तर पर जाकर सामने आती है या तो फिर जब कोई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो तब। सरकारी अस्पतालों की ऐसी व्यवस्था चिंता का विषय है। कभी सरकारी अस्पताल में चूहे द्वारा नवजात की उंगली कुतरने की खबर समाने आती है तो कभी कुछ। अब खबर है कि भोपाल के जय प्रकाश (जेपी) अस्पताल ((Jay Prakash Hospital) में एक मरीज पर सिर्फ 33 रुपए प्रतिदिन खर्च होता है।
48 रुपए की जगह 33 रुपए प्रतिदिन भोजन खर्च
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक जय प्रकाश (जेपी) अस्पताल में दोपहर के भोजन में आलू-फूलगोभी की करी, पतली हरी दाल, आधा कटोरी चावल, चार चपातियां और खीरे के दो टुकड़े थाली में परोसे जाते हैं।
जेपी अस्पताल की कैंटीन प्रभारी मुमताज बेगम ने कहा, “हम प्रतिदिन 33 रुपये की लागत से भोजन उपलब्ध करा रहे हैं जिसमें कर्मचारियों का वेतन भी शामिल है।”
जिला अस्पतालों के आधिकारिक आहार चार्ट के अनुसार, नाश्ते में दलिया, पोहा, केला, उपमा और 250 मिलीलीटर दूध शामिल होना चाहिए। दोपहर के भोजन में सलाद, चार चपातियाँ, हरी सब्जियाँ, दाल और चावल होने चाहिए, जबकि रात के खाने में चपातियाँ, सब्जियाँ और दाल शामिल होनी चाहिए। मरीजों को शाम को चाय और बिस्कुट भी दिए जाने चाहिए।
अब मरीजों को सही से खाना नहीं दिया जायेगा तो जल्दी स्वस्थ कैसे होंगे? जब आधिकारिक तौर पर, राज्य सरकार एक मरीज के भोजन के लिए एक दिन में अधिकतम 48 रुपए प्रदान करती है जोकि बहुत कम है लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि अधिकांश अस्पताल 40 रुपए प्रति दिन से कम में भोजन प्रदान कर रहे हैं।
गौशालों और जेल कैदियों पर खर्च से भी कम
चिंता की बात यह भी है कि सरकारी गौशालों में गायों को दिए जाने वाले एक दिन के भोजन पर 40 रुपये से भी कम और राज्य की जेलों में बंद कैदियों के लिए 75 रुपये खर्च किए जाते हैं।
हालांकि, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रसूति वार्डों में भर्ती महिलाओं को भोजन के अतिरिक्त दो केले और दो लड्डू दिए गए, जिस पर सरकार को प्रति मरीज प्रतिदिन 40 रुपये खर्च करने पड़ते हैं ।
भोजन एक चिंता का विषय है वहीं मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गंदगी, पानी की समस्या, समय पर एम्बुलेंस न मिलने की समस्या, गर्भवती महिलाओं के लिए बेड न मिलना ये सभी समस्या अब सरकारी अस्पताल में आम बात हो गई है। खबर लहिरया की रिपोर्टिंग में इन सभी समस्याओं और जरूरतों को उजागर करने का प्रयास किया है।
छतरपुर जिला अस्पताल में पानी नहीं
मध्य प्रदेश, छतरपुर के जिला अस्पताल की सच्चाई भी कुछ ऐसी ही है जहां मरीजों की शिकायत है कि पीने के पानी जैसी सबसे बुनियादी सुविधा तीसरी और चौथी मंज़िल पर नहीं है। रिपोर्ट में पाया गया कि पानी न होने की वजह से यहां रोज़ाना सैकड़ों मरीज और उनके परिजन भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। हालात यह हैं कि डिलीवरी, ऑपरेशन और एक्सीडेंट वाले गंभीर मरीजों के परिजन भी चार मंज़िल नीचे उतरकर बोतलों में पानी भरने को मजबूर हैं। पिछले आठ महीनों से यह समस्या लगातार बनी हुई है।
छतरपुर जिला अस्पताल में गंदगी और बदबू
जिला चिकित्सालय में गुटखा अभियान भी चलाया जा रहा है लेकिन जो लोग गुटखा खाकर अंदर आते हैं उनसे पैसे वसूल किए जाते हैं।
सवाल यह उठता है कि जब पैसे वसूल किए जाते हैं तो इतनी गंदगी कहां से आती है। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि गंदे कपड़े, थूक और कचरा जगह-जगह पड़ा हुआ है। यह वही जगह है, जहाँ मरीज बैठते हैं।
छतरपुर जिला अस्पताल : सफाई के दावे फेल, गंदगी और बदबू से परेशान ग्रामीण
छतरपुर जिला अस्पताल में गर्भवती महिलाओं की हालत
छतरपुर जिला अस्पताल में डिलीवरी वाली महिलाओं के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं नहीं हैं। अस्पताल के गेट के बाहर भीड़ है और बैठने के लिए भी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। सरकार लाखों रुपए खर्च करके अस्पताल बनवाती है लेकिन व्यवस्थाओं को ठीक तरीके से नहीं कर पाती।
मीराबाई ने कहा, “मुझे तीन दिन हो गए हैं लेकिन अभी तक मेरा अल्ट्रासाउंड नहीं हुआ है। मेरी डिलीवरी होने वाली है, आखिरी महीना चल रहा है। डॉक्टर ने लिखा था कि अल्ट्रासाउंड करवा लो, लेकिन अब तक नहीं हुआ। अगर आज नहीं हुआ, तो हमें प्राइवेट में जाकर करवाना पड़ेगा।”
मध्य प्रदेश: छतरपुर जिला अस्पताल की व्यवस्था में कमी, गर्भवती महिलाओं पर इसका असर
सरकारी अस्पताल बालाघाट में गर्भ में बच्चे की मौत
हाल ही में 1 दिसंबर को मध्य प्रदेश के जिला सरकारी अस्पताल बालाघाट में आई एक गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत हो गई। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में सामने आया कि गर्भवती महिला का ऑपेरशन करने से महिला डॉक्टर ने मना कर दिया। गर्भवती महिला के परिजनों ने आरोप लगाया कि डॉक्टर ने कहा कि ड्यूटी का समय खत्म हो गया है।
मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों की ऐसी स्थिति होने के कारण लोग अपना इलाज प्राइवेट में करवाना सही समझते हैं क्योंकि उन्हें अपने स्वास्थ्य की अधिक चिंता होती है लेकिन जिन लोगों के पास पैसा नहीं है उन लोगों को मजबूरन इन हालातों में अपना इलाज करवाने के लिए सरकारी अस्पतालों में जाना पड़ता हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सरकारी अस्पतालों की हालत कब सुधरेगी? कब लोगों को विश्वास होगा कि सरकारी अस्पताल उनके लिए प्राइवेट अस्पताल से ज्यादा बेहतर और सुरक्षित है?
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