देश भर में मकर संक्रांति का त्योहार अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है और हर जगह के अपने खान-पान की भी अलग परंपरा है। यह हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति को अलग अलग नामों से जाना जाता है कहीं इसे पोंगल तो कहीं उत्तरायण, भोगाली बिहू या माघी कहते हैं। हर क्षेत्र में इस त्यौहार को मनाने का खास तरीका है। इसे दही चुरा, खिचड़ी, उंधियू और जलेबी खाकर इसे खास बनाया जाता है। इस दिन आसमान में रंग बिरंगी पतंगें भी उड़ती दिखाई देती है।
खिचड़ी पर्व
उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को आमतौर पर “खिचड़ी पर्व” कहा जाता है। कुछ जगहों पर इसे मकर संक्रांति भी कहा जाता है, लेकिन खिचड़ी पर्व नाम सबसे ज़्यादा प्रचलित है। इस दिन घरों में चावल और दाल की खिचड़ी बनाई जाती है और बहुत से घरों में मूंग दाल के मुंगौड़े बनाए जाते हैं।
खिचड़ी के साथ इसे घी, दही, पापड़ और अचार के साथ खाया जाता है इसलिए इसे खिचड़ी पर्व कहा जाता है। यह पर्व नई फसल के स्वागत का भी प्रतीक है। किसान अपनी मेहनत का उत्सव मनाते हैं रिश्तेदारों को खिचड़ी पर बुलाया जाता है। बड़े लोग बच्चों को आशीर्वाद देते हैं।
मेले का आयोजन
यूपी के बांदा के भूरागढ़ किले में हर साल मकर संक्रांति के दिन मेला लगता है। यह किला केन नदी किनारे है जो सच्चे प्यार की साझा शहादत का अदभुत किस्सा संजोए हुए है। यह मेला कई वर्ष पुराना है इसे प्रेम प्रसंग का मेला कहा जाता हैl खास बात यह है कि यहां प्रेमी घूमने के अलावा अपना प्रेम अमर करने के लिए अपना दीवारों में नाम भी लिख कर जाते हैंl आप नीचे दिए गए लिंक में खबर लहरिया की रिपोर्ट में मेले की भीड़, इतिहास और दीवारों पर प्रेमियों के नाम को देख सकते हैं।
इस दिन गीत गाए जाते हैं। साथ ही त्योहार से एक-दो दिन पहले लोग अपने मामा के यहां गढ़िया गुल्ला लेने के लिए जाते हैं। अन्य रिश्तेदार भी इस दिन एक-दूसरे के घर त्योहार की खुशियाँ बांटने जाते हैं। मकर संक्रांति पर शक्कर से बनने वाली पारंपरिक मिठाई भी बनाई जाती है जो त्योहार के करीब आते ही बिकना भी शुरू हो जाती है। मिठाईयों का आकार रंग-बिरंगे हाथी- घोड़े और कलश समेत विभिन्न आकार के होते हैं। यह मीठे-मीठे खिलौने बनाने में कारीगर काफ़ी मेहनत करते हैं और बनने के बाद मिठाईयां स्वाद के साथ-साथ देखने में भी सुंदर लगती हैं।
मकर संक्रांति – सकरात
बिहार में अधिकतर जगह इसे “सकरात” भी कहा जाता है। बिहार में इस दिन दही चुरा, तिलकुट नहाकर खाया जाता है। इसी दिन घर के सभी सदस्यों को यही खाने को मिलता है। शाम को खिचड़ी खाई जाती है।
लोगों का मानना है कि धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन धान की कटाई के बाद नया चावल आता है और उसके चावल से बना दही-चूड़ा खाया जाता है।
माघ बिहू / भोगाली बिहू
असम में मकर संक्राति को माघ बिहू / भोगाली बिहू कहा जाता है। इस दिन सामूहिक भोज, चावल से बने पकवान खाए जाते हैं और खेती से जुड़े उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।
उत्तरायण
गुजरात में मकर संक्राति को उत्तरायण कहा जाता है। गुजरात में यह पतंग उड़ाने का सबसे बड़ा पर्व होता है। इस दिन हर घर-घर में उंधियू और जलेबी खाई जाती है।
आसमान में उड़ते पक्षियों की जगह सिर्फ पतंगे दिखाई देती हैं। लोग इस ख़ुशी को पतंग उड़ाकर मनाते हैं।
मकर सक्रांति त्योहार का नाम भले अलग अलग हो लेकिन इसे मनाने के तरीके में ज्यादा अंतर नहीं है। वही ख़ुशी वही अपनापन और जुड़ाव दिखाई देता है जो एक दूसरे के रिश्ते को और मजबूत कर देता है।
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