सर्दियों के मौसम में खजुर के पेड़ से निकलने वाला मीठा रस और उससे बना गुड़ बुंदेलखंड के ग्रामीण जीवन की एक अनमोल विरासत है। यह न केवल स्वाद में खास होता है, बल्कि सेहत के लिए भी फायदेमंद होता है। इसको पका कर परमपरिक रुप से गुड तैयार किया जाता है जो चीनी का एक प्राकृतिक और पोषक विकल्प माना जाता है।
रिपोर्ट – श्यामकली, लेखन – गीता
खजुर के रस को पारंपरिक तरीकों से उबालकर तैयार किया गया गुड़ आयरन, कैल्शियम और ऊर्जा से भरपूर होता है, जो ठंड के मौसम में शरीर को गर्मी और ताकत देता है। इस बदलते दौड में भी रस और गुड़ किसानों की आजीविका का अहम साधन है, जहां पीढ़ियों से लोग इस पारंपरिक ज्ञान को सहेजते आ रहे हैं
सर्दियों में गर्महाट घोलता खजुर का रस और गुड़
बदलते वक्त और आधुनिक रोजगार के बीच महोबा जिले के मंगरौल गांव में आज भी खजूर के पेड़ों से रस निकालने और गुड़ बनाने की पारंपरिक जीवित है। यह सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा ऐसा हुनर है, जो मेहनत, जोखिम और अनुभव पर टिका है। लगभग 20 फुट ऊंचे खजूर के पेड़ों पर चढ़कर बूंद-बूंद रस इकट्ठा करना आसान नहीं होता, लेकिन गांव के कारीगर इसे पूरी सावधानी से करते हैं। वह न सिर्फ अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं, बल्कि इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि पेड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे। साल में 2-3 महीनों तक किया जाने वाला यह काम ग्रामीणों के लिए आत्मनिर्भरता का सहारा है और यह दिखाता है कि अगर पारंपरिक ज्ञान को संजोया जाए, तो जीवन जीने का का रास्ता बन सकता है।
150 से ज्यादा कारीगर,पीढ़ियों की विरासत
गांव के कारीगर जितेंद्र बताते हैं कि मंगरौल गांव में लगभग 150 परिवार इस काम से जुड़े हैं। पहले उनके बाप-दादा खजूर का गुड़ बनाते थे, आज वह भी वही काम कर रहे हैं, क्योंकि यह उनकी रोज़ी-रोटी है। वह कहते हैं कि सेहत के लिए खजूर का रस और गुड दोनों बहुत ही फायदेमंद होता है। खजूर का ताज़ा रस पीना स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। खजूर के पेड़ों से रस निकालने और गुड़ बनाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। रस निकालने का काम देखने में जितना आसान लगता है, हकीकत में यह काम उतना ही मेहनत और जोख़िम भरा है। हमारी रिपोर्टर श्यामकली ने जब ज़मीनी स्तर पर जाकर इसे देखा, तब एहसास हुआ कि खजूर से रस निकालना और उसका गुड बनना कोई साधारण काम नहीं है।
वहीं ग्रामीण लोगों के अनुसार जिनकी सांस फूलती है, उनके लिए यह रस बहुत लाभकारी होता है। सुबह 6 बजे से ही लोग ताज़ा रस पीने के लिए पहुंच जाते हैं। ठंड के मौसम में यह रस न सिर्फ स्वादिष्ट होता है, बल्कि शरीर को गर्मी भी देता है।
खजूर के रस में है नारियल पानी का स्वाद
हमारी रिपोर्टर श्यामकली बताती हैं कि रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें पहली बार पता चला कि खजूर से सिर्फ झाड़ू ही नहीं, बल्कि रस और गुड़ भी बनता है। क्योंकि पहले खजूर का रस उन्होंने भी कभी नहीं देखा और पिया था। जब उन्होंने खुद ताज़ा रस पिया तो उसका स्वाद नारियल पानी जैसा लगा और खेतों के बीच जाकर बिल्कुल ठंडा रस पीने का अनुभव भी उनके लिए एक यादगार पल रहा।
कैसे निकाला जाता है खजूर का रस
कारीगर रामचरण बताते हैं कि रस निकालने की प्रक्रिया सितंबर-अक्टूबर में शुरू होती है। किसानों से अनुमति लेकर खजूर के पेड़ों की सफाई की जाती हैं। फिर सूखे कांटे हटाकर हरे पत्तों के पास हल्का सा कट लगाया जाता है।
शाम करीब 4 बजे मिट्टी के घड़े या प्लास्टिक के डिब्बे पेड़ पर बांध दिए जाते हैं। रात भर रस बूंद-बूंद टपकता रहता है। सुबह फिर से पेड़ पर चढ़कर घड़े उतारे जाते हैं। घड़ों को रस्सी से पेड़ से बांधा जाता है ताकि रस सुरक्षित इकट्ठा हो सके।
रस निकालने से पेड़ों पर क्या असर पड़ता है
जितेंद्र बताते हैं कि रस निकालने से पेड़ को कोई नुकसान नहीं होता। वह पेड़ को काटते नहीं हैं। सिर्फ एक महीने तक ही रस निकालते हैं। एक पेड़ से रोज़ 2 से 4 लीटर रस मिलता है। इसी रस से गुड़ बनाया जाता है, जो बाजार में 150 रुपये किलो तक बिकता है।
20 फुट ऊंचे पेड़ पर चढ़ना जोखिम भरा काम
जितेन्द्र कहते हैं करीब 20 फुट ऊंचे खजूर के पेड़ों पर चढ़ना आसान नहीं है। लेकिन ये परंपरा गत काम है हमेशा से करते आ रहे हैं इस लिए अनुभव हो गया है। वह कारीगर है कमर में रस्सी और छल्ला बांधकर पेड़ पर चढ़ते हैं। पर घड़ा हाथ से नहीं उतार सकते, टूटने का डर रहता है। चाहे कितनी भी ठंड हो, खजूर का रस पीने के बाद ठंड कम लगती है।
बचपन की सीखी कला
कारीगरों का कहना है कि यह हुनर उन्होंने बचपन से अपने पिता, चाचा और बुजुर्गों को देखकर सीखा है। बाहरी व्यक्ति ऐसे पेड़ो पर नहीं सकता।
विभागों से कोई डर नहीं
कारीगरों ने बताया कि उन्हें आबकारी और वन विभाग का किसी तरह का डर नहीं है। पिछले साल जांच भी हुई थी,पर वह कोई गलत काम नहीं करते। खजूर का रस गर्म तासीर का होता है, ठंड में फायदेमंद है। सीजनल काम है पूरी ईमानदारी से 2-3 महीने करते हैं। फागुन के बाद काम बंद हो जाता है।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या आने वाली पीढ़ी इस मेहनत भरे हुनर को अपनाएगी। अगर ऐसी परंपराओं को समय रहते संरक्षित और प्रोत्साहित नहीं किया गया, तो शायद यह मिठास सिर्फ यादों तक सिमट कर रह जाए।
मंगरौल गांव की यह कहानी बताती है कि गांव की परंपराएं आज भी ज़िंदा हैं। खजूर के रस और गुड़ की यह मिठास सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि मेहनत, ईमानदारी और आत्मनिर्भर भारत की मिसाल है।
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