खबर लहरिया Blog Magh Mela: माघ मेले में संगम की ओर बढ़ते कदम, सफर में ही बसता उत्सव 

Magh Mela: माघ मेले में संगम की ओर बढ़ते कदम, सफर में ही बसता उत्सव 

इस साल माघ मेले की शुरुआत उम्मीद के हिसाब से शांत रही है। पिछले साल महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में जो भारी भीड़ जाम और अव्यवस्था देखने को मिली थी उसकी यादें अभी लोगों के मन में ताजा हैं।

 रिपोर्टिंग – सुनीता देवी, लेखन – रचना  

मेले में पहुंचने से पहले रास्ते का सफर (फोटो साभार: सुनीता देवी)                          

सर्दियों की ठिठुरन के बीच प्रयागराज की धरती एक बार फिर आस्था, विश्वास और उत्सव के रंगों में रंगी हुई है। संगम तट पर लगने वाला माघ मेला सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है यह लोगों के लिए घूमने, मिलने-जुलने और रोज़मर्रा की भागदौड़ से कुछ दिन दूर जीने का मौका भी है। माघ मेला 2026 इस बार 3 जनवरी से शुरू होकर 15 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलेगा। यह मेला कुल 44 दिनों तक चलने वाले इस मेले को मिनी कुंभ कहा जाता है जिसमें पौष पूर्णिमा, मकर संक्रांति और माघी पूर्णिमा जैसे बड़े स्नान पर्व शामिल हैं।

इस साल माघ मेले की शुरुआत उम्मीद के हिसाब से शांत रही है। पिछले साल महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में जो भारी भीड़ जाम और अव्यवस्था देखने को मिली थी उसकी यादें अभी लोगों के मन में ताजा हैं। महीनों तक सड़कें जाम रहीं लोग भूखे-प्यासे फंसे रहे और कई दुखद घटनाओं की खबरें भी सामने आईं थीं। शायद इसी वजह से इस बार लोग थोड़ी सावधानी के साथ छोटे-छोटे समूहों में और सोच-समझकर माघ मेले की यात्रा पर निकल रहे हैं।

दोस्तों का कारवां, रास्ते में ही बसता मेला

इस मेले में पहुंचे कौशांबी जिले के पिंटू बताते हैं कि वे दस लोगों की टीम के साथ माघ मेले के लिए निकले हैं। उनका कहना है कि हम लोग हर साल माघ मेले का इंतज़ार करते हैं। इस बार भी संगम घाट में स्नान करेंगे, मेला घूमेंगे और खूब एन्जॉय करेंगे। हमारा पंद्रह दिन का टूर है। दिन में एक बार कहीं भी रुक जाते हैं और वहीं खाना बना लेते हैं।     

यात्रा के दौरान जंगल के बीच खाने की तैयारी (फोटो साभार: सुनीता देवी)              

इसी समूह से पिंटू आगे कहते हैं कि उनका खाना भी हर दिन अलग होता है कभी पूड़ी-सब्जी, कभी भर्ता-रोटी, कभी बाटी-चोखा। वे मुस्कुराते हुए कहते हैं “जंगल या पेड़ के नीचे बैठकर अपने हाथ से बना खाना बहुत स्वादिष्ट लगता है। शहर में ऐसा मजा कहां मिलता है?” उनके लिए माघ मेला सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि साल में एक बार खुद के लिए वक्त निकालने का मौका है।                         

यात्रा के दौरान खाना बनाने की तैयारी (फोटो साभार: सुनीता देवी)

चंदे से चलता सफर, साथ से बनती यादें 

कौशांबी के ही लालओम का कहना हैं कि उनका समूह मिलकर चंदा इकट्ठा करता है। रास्ते का खर्च, गाड़ी का किराया ये सब कुछ मिल-बांट कर निकाल लेते हैं। इस साल प्रयागराज के साथ-साथ अयोध्या और खजुराहो भी जाने का प्लान है। लालओम के लिए घूमना सिर्फ जगहें देखने तक सीमित नहीं है। जब जंगल में रुककर अपने हाथ से खाना बनाते हैं दोस्तों के साथ गाते-बतियाते हैं तो मन बहुत हल्का हो जाता है। पंद्रह दिन कब निकल जाते हैं पता ही नहीं चलता।

पहली बार संगम, पहली बार खुली रसोई

इस माघ मेले में लोग दूर-दूर से आते हैं जिसका उदाहरण है महाराष्ट्र से आईं 25 वर्षीय सुजीता जिन्होंने बताया कि ये उनके लिए कितना खास यात्रा है। वे कहती हैं हम पहली बार प्रयागराज आ रहे हैं और हमने पहली बार पेड़ के नीचे खाना बनाया है। हम कई दिनों का सफर करके आए हैं इसलिए रास्ते में रुकना पड़ा। “हम शहर से पहली बार इतनी दूर निकले हैं। पूरा परिवार साथ है एक बस में सफर कर रहे हैं। खाने का मजा अलग ही था क्योंकि सब कुछ अपने हाथ से बनाया गया था।”                           

जंगल में रसोई (फोटो साभार: सुनीता देवी)

मकर संक्रांति पर बढ़ेगी रौनक

हालांकि रिपोर्टिंग के अनुसार अभी भीड़ कम नजर आ रही है लेकिन 15 जनवरी को मकर संक्रांति के स्नान पर्व के दौरान संगम तट पर भारी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। प्रशासन भी इसी दिन को लेकर सबसे ज्यादा सतर्क है। माघ मेले में स्नान, दान और कल्पवास की परंपरा के साथ-साथ घूमने और मनोरंजन का माहौल भी रहता है। यही वजह है कि यहां सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं बल्कि दोस्त, परिवार और युवा समूह भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

माघ मेला, सिर्फ स्नान नहीं जीने का तरीका

माघ मेला सिर्फ संगम में डुबकी लगाने का आयोजन नहीं है। यह लोगों के लिए साथ बैठने, खुली हवा में सांस लेने, रोजमर्रा की परेशानियों से दूर कुछ दिन जीने का मौका है। यहां रास्ते, जंगल, पेड़ के नीचे बनी रसोई और दोस्तों की हंसी सब मिलकर एक ऐसा अनुभव बनाते हैं जिसे लोग हर साल दोबारा जीना चाहते हैं।

जब लोग घर लौटते हैं तो मन करता है कि यह सफर यहीं न खत्म हो लेकिन जिम्मेदारियां और खर्च याद दिला देते हैं कि जिंदगी फिर उसी रफ्तार में लौटनी है। शायद इसी वजह से माघ मेला हर साल लोगों को अपनी ओर खींच लाता है क्योंकि यहां सिर्फ आस्था नहीं अपनापन और आज़ादी भी मिलती है।

 

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