खबर लहरिया Blog केन बेतवा परियोजना: बांध और नहरों के बीच फंसे गांव, किसानों की जमीन गई मुआवजा अब भी अधूरा

केन बेतवा परियोजना: बांध और नहरों के बीच फंसे गांव, किसानों की जमीन गई मुआवजा अब भी अधूरा

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले राजनगर ब्लॉक में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बांध और नहरों का निर्माण किया जा रहा है। इसी के साथ-साथ पन्ना जिले के भी 11 गांव शामिल हैं। इसके मुआवज़े के लिए ग्रामीण द्वारा विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है।    

रिपोर्ट- अलीमा सैयद, लेखन – रचना 

ग्रामीणों द्वारा अपने मांगो को लेकर विरोध कर रहे हैं (फोटो साभार: खबर लहरिया)                  

देश के कई राज्यों से विस्थापन की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कहीं बांध बन रहे हैं तो कहीं कोयला खदानें खोली जा रही हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में लोग अपने घर और जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहा जाता है कि उन्हें मुआवजा मिलेगा या दूसरी जगह बसाया जाएगा लेकिन हकीकत अक्सर इससे अलग होती है। कई बार ग्रामीण जमीन देने से इनकार करते हैं तो उनके सामने या तो बुलडोजर खड़ा कर दिया जाता है या फिर पुलिस बल का इस्तेमाल होता है। 

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले राजनगर ब्लॉक में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत लगभग 14 गांव में उन्हें विस्थापित कर बांध और नहरों का निर्माण किया जा रहा है। इसी के साथ-साथ पन्ना जिले के भी 11 गांव शामिल हैं। बुंदेलखंड इलाके में लंबे समय से पानी की कमी एक बड़ी समस्या रही है और इसी को दूर करने के लिए 25 दिसंबर 2024 इस परियोजना की शुरुआत की गई। इसका मकसद केन नदी का पानी बेतवा नदी तक पहुंचाकर सूखा प्रभावित इलाकों को राहत देना है लेकिन इस परियोजना के साथ एक बड़ी समस्या भी सामने आ रही है गांवों का डूब क्षेत्र में आना और लोगों का विस्थापन। छतरपुर जिले के कई गांव जो पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया के पास बसे हैं इस परियोजना के अंदर आ रहे हैं। यहां बांध बनने के बाद नहरों के जरिए पानी बेतवा नदी तक ले जाया जाएगा जिससे इन गांवों के डूबने का खतरा है।  

प्रमुख विस्थापित गांवों में भरकुआं, ढोढन खरियानी, कुपी, मैनारी, पलकोंहा, शाहपुरा, सुकवाहा, पाठापुर, नैगुवां, डुंगरिया, कदवारा, घुघरी, और बसुधा शामिल हैं।                            

खून से लिखा गया पत्र (फोटो साभार: खबर लहरिया)

अब इसमें प्रशासन का कहना है कि प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया जाएगा या फिर उन्हें दूसरे जगह में स्थानीय तरीके से बसाया जाएगा लेकिन वहां के ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें अब तक जमीन के बदले जमीन और स्थायी पुनर्वास को लेकर कोई साफ योजना नहीं बताई गई है। उनका यह भी कहना है कि कई लोगों को अब तक उनकी जमीन का पूरा मुआवजा भी नहीं मिला है।

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इसी के विरोध में ग्रामीण लगातार आंदोलन और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। बीते 23 मार्च 2026 से उन्होंने पदयात्रा शुरू की जो पन्ना से छतरपुर के गांवों तक पहुंची। 28 मार्च को उन्होंने खून से पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी बात बताई। अब 5 अप्रैल को पन्ना के डायमंड चौराहे से एक और यात्रा शुरू होगी जो छतरपुर होते हुए दिल्ली तक जाएगी जहां ग्रामीण अपना विरोध दर्ज कराएंगे।        

खून से पत्र लिखने के लिए ग्रामीण अपना खून दे रहे हैं (फोटो साभार: खबर लहरिया)             

​​केन-बेतवा परियोजना 

केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना है जिसका उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त पानी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी में स्थानांतरित करना है। 44,605 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली यह परियोजना बुंदेलखंड क्षेत्र (MP-UP) में सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के लिए बनाई जा रही है। इसका औपचारिक शिलान्यास 25 दिसंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया।

“जमीन जाएगी तो हम कहां जाएंगे?” ग्रामीण किसान 

इस मामले में खबर लहरिया टीम ने छतरपुर जिले के गांव पलकुआ के ग्रामीणों से बात की। पलकुआ गांव की रहने वाली भगवती आदिवासी बताती हैं कि उनकी जमीन (किसी किसान की दस एकड़ ज़मीन है किसी की दो तो किसी की पांच और ये सभी ज़मीन जा रही है) भी केन-बेतवा परियोजना में जा रही है लेकिन अब तक उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला है। उनका कहना है कि उन्हें कानून और ग्राम सभा की पूरी जानकारी भी नहीं है। वे कहती हैं कि अमित भटनागर जैसे लोग उनकी मदद कर रहे हैं लेकिन सरकार उनकी बात नहीं सुन रही।

भगवती का आरोप है कि जब वे लोग विरोध करते हैं तो उनके ऊपर पानी डाला जाता (ये एक बार नहीं हुआ है इस तरह की बर्बरता पुलिस द्वारा कई बार किया गया है) है और शिकायत करने जाने पर उन्हें डंडों से भगा दिया जाता है। वे कहती हैं “हम गरीब लोग कहां जाएं? हमारे प्राण चले जाएं लेकिन हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। अगर सरकार को जमीन चाहिए तो पहले हमारे प्राण लेने होंगे।”

बता दें इससे पहले खबर लहरिया ने वहां के ग्रामीणों से बात तब उन्होंने बताया कि विरोध करने पर उन्हें रोका जाता है और लाठीचार्ज जैसी स्थिति भी बन जाती है और आंदोलन खत्म करने के लिए नए नए तरीके भी पुलिस और प्रशासन के द्वारा अपनाया जाता है। 

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वहीं पलकुआ गांव की रहने वाली कमला आदिवासी भी अपनी तकलीफ साझा करती हैं। उनका कहना है कि आदिवासी होने की वजह से उनके साथ भेदभाव किया जाता है। “हम अपना हक मांगते हैं तो हमें जानवरों की तरह बर्ताव किया जाता है। हमें मारा जाता है हमारे ऊपर पानी डाला जाता है।” (इसकी और जानकारी ऊपर दिया हुआ लिंक पर है) 

कमला ने इसका एक किस्सा बताया कि एक बार वे अपनी गर्भवती बहू के साथ बिजावर तहसील में धरने पर बैठी थीं। उस समय उनकी बहू का सातवां महीना चल रहा था लेकिन आधी रात को पुलिस ने आकर उन्हें डंडों से भगा दिया और पानी डालकर वहां से हटाया।

वे सवाल उठाती हैं, “सरकार कहती है कि यह सरकारी जमीन है लेकिन हम तो सदियों से यहां रह रहे हैं। अगर सरकार जमीन ले रही है तो उन्हें हमें उतनी ही जमीन वापस देनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।”

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जमीन जाने से परेशान किसानों के लिए न्याय की मांग

जय किसान संगठन के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में “न्याय अधिकार पदयात्रा” निकाली गई है। यह पदयात्रा उन किसानों को न्याय दिलाने के लिए है जिनकी जमीन केन-बेतवा लिंक परियोजना में जा रही है। अमित भटनागर जो आम आदमी पार्टी से जुड़े हैं और एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं इस मुद्दे को लेकर लगातार आवाज उठा रहे हैं।

वे पदयात्रा के जरिए लोगों की समस्या सामने ला रहे हैं और किसानों के हक के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि जिन किसानों की जमीन इस परियोजना में जा रही है वे आज भी अपने हक के लिए भटक रहे हैं। इसी को लेकर 28 मार्च को उन्होंने खून से पत्र लिखकर मुख्यमंत्री के नाम अपनी मांगें रखने का फैसला किया है।

इससे पहले भी उन्होंने तीन दिवसीय पदयात्रा निकाली थी। इस पदयात्रा का मुख्य संदेश था। “जमीन छीनी अब जनता मत सुनो।” इसके जरिए विस्थापित किसानों और आदिवासी परिवारों के दर्द और उनकी समस्याओं को सामने लाने की कोशिश की जा रही है।   

खून से लिखा हुआ पत्र (फोटो साभार: खबर लहरिया)                           

अमित भटनागर का दावा, “2021 से लड़ रहे हैं लेकिन अब तक नहीं सुनी गई बात”

सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर से भी बात की गई तो वे बताते हैं कि साल 2021 में उन्हें इस परियोजना की जानकारी मिली जब गांवों में नोटिस चिपकाए गए थे। जब वे गांव पहुंचे तो लोगों ने बताया कि उनकी जमीन परियोजना में जा रही है। इसके बाद से ही अमित भटनागर ग्रामीणों के साथ खड़े हो गए और उनकी लड़ाई लड़ने लगे। उनका कहना है कि केन-बेतवा परियोजना से बुंदेलखंड को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो रहा है। “किसी का घर उजड़ रहा है तो किसी के खेत खत्म हो रहे हैं। लोगों का पूरा आशियाना ही छिन रहा है।”    

ग्रामीणों के साथ नीले कुरते में अमित भटनागर (फोटो साभार: खबर लहरिया)                               

अमित भटनागर का आरोप है कि जब भी वे आदिवासियों और किसानों के साथ खड़े होते हैं प्रशासन उन पर दबाव बनाता है। कई बार उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई। उनका कहना है कि जब भी कोई बड़ा नेता जैसे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री इलाके में आते हैं तो उन्हें पहले ही हिरासत में ले लिया जाता है ताकि वे अपनी बात उन तक न पहुंचा सकें।

फरवरी माह 2026 में बिजावर तहसील के पास हुए धरना-प्रदर्शन का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि वहां प्रशासन का रवैया सख्त रहा। “एसडीएम के निर्देश पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और पानी की बौछार की गई। उस समय वहां कई गर्भवती महिलाएं भी मौजूद थीं।” इसके बाद उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से मुलाकात की उनकी स्थिति देखी और उन्हें जागरूक किया। इसी दौरान ग्रामीणों ने मिलकर खून से पत्र लिखा और प्रधानमंत्री के नाम अपनी मांगें भेजीं। अमित ने भी खून से पत्र लिखकर सरकार को चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे दिल्ली जाकर बड़ा धरना-प्रदर्शन करेंगे।

बता दें इससे पहले फरवरी 2026 को अमित भटनागर को आंदोलन के दौरान गिरफ़्तार भी किया गया था और फिर तीन से चार दिन में छोड़ दिया गया। 

दूसरी ओर, खबर लहरिया टीम ने सरकार की तरफ से भी किसी अधिकारी से इस संबंध में जानकारी लेने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई जानकारी देने से इनकार कर दिया।

मुआवजा और पुनर्वास का वादा लेकिन ज़मीन पर क्यों नहीं दिख रहा असर?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नियमों में मुआवजा देने और जमीन के बदले जमीन देने का प्रावधान है तो फिर प्रभावित लोगों को अब तक इसका फायदा क्यों नहीं मिला? आखिर क्यों किसान और आदिवासी परिवार अपने हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं? मध्य प्रदेश के ये ग्रामीण पिछले कई सालों से इसी मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। वे लगातार अपनी मांगें उठा रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि अब तक उनकी बात न तो सही तरीके से सुनी गई है और न ही कोई ठोस समाधान निकला है।

एक और अहम सवाल अगर यह परियोजना लोगों के भले और मदद के लिए बनाई जा रही है लेकिन उसी में रहने वाले ग्रामीण ही अपने घर और जमीन से बेदखल हो जाएंगे तो फिर इसका फायदा किसे मिलेगा? जब प्रभावित लोग ही वहां नहीं रहेंगे तो इस परियोजना की उपयोगिता किसके लिए होगी और आखिर इसे किसके लिए तैयार किया जा रहा है?

सरकार अगर विकास के लिए काम कर रही है जो अच्छी बात है लेकिन इस दौरान लोगों की मूलभूत ज़रूरतों और उनके अधिकारों का ध्यान रखना भी उतना ही ज़रूरी है। विकास जिसमें लोगों का नुकसान न हो और जिन पर असर पड़ रहा है उनकी जरूरतों और पुनर्वास को प्राथमिकता दी जाए।

एक और अहम बात यह है कि इतने बड़े मुद्दे के बावजूद यह मामला न तो मुख्यधारा के अखबारों में जगह बना पा रहा है और न ही अन्य माध्यमों में इसे लेकर ज्यादा चर्चा हो रही है। फिलहाल ग्रामीणों का आंदोलन जारी है और अब वे अपनी आवाज दिल्ली तक ले जाने की तैयारी में हैं, ताकि उनकी मांगें देश के सबसे बड़े मंच तक पहुंच सकें।

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