मेरे पीछे चिता जल रही है… धुआं उठ रहा है… और ठीक इसी धुएं के बीच लोग रंग खेल रहे हैं। ये काशी है यहां मौत मातम नहीं, मुक्ति मानी जाती है। इसलिए यहां श्मशान में भी होली खेली जाती है मसान की होली। यहां रंग सिर्फ गुलाल का नहीं है… यहां भस्म भी है। जिस राख को दुनिया अंत मानती है। काशी उसे आस्था का रंग बना देती है। सवाल ये है क्या ये सिर्फ परंपरा है या सच में जीवन और मृत्यु के फर्क को मिटाने की कोशिश? दुनिया में शायद ही कोई जगह होगी जहां जलती चिताओं के बीच होली खेली जाती हो लेकिन काशी का मिज़ाज ही अलग है। यहां जिंदगी भी त्योहार है… और मौत भी।
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