खबर लहरिया Blog महादेवी वर्मा की छायावादी काव्य में ‘ढूंढ़ रहीं हूँ विमुखता में पीड़ा’!

महादेवी वर्मा की छायावादी काव्य में ‘ढूंढ़ रहीं हूँ विमुखता में पीड़ा’!

महादेवी वर्मा के काव्य में दुःखवाद, पीड़ावाद, निराशावाद की अभिव्यक्ति दिखाई देती है जिसे कई आलोचकों ने भी रेखांकित किया है। साथ ही शब्दों में मुक्ति की आकांशा भी प्रतिबिंबित होती है।

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                                                प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा की तस्वीर ( फोटो – सोशल मीडिया)

पर शेष नहीं रहेगी यह मेरे प्राणों की कीड़ा,

तुमको पीड़ा में ढूंढ़ा, तुम में ढूंढूंगी पीड़ा!

हिंदी की प्रसिद्ध कवयित्री ‘महादेवी वर्मा’ द्वारा लिखी ये पंक्तियां जिन्हें उन्होंने ‘उत्तर’ शीर्षक के अनुरूप लिखा है, यह हर एक व्यक्ति के जीवन की गाथा है। आज उनकी जन्मतिथि पर शब्दों की छाया हटाकर उन्हें पढ़ती हूँ तो एहसास होता है विमुखता का, अर्थात जहां सबने मुंह फेरा हुआ है। जहां कोताहल करती साँसों के संग दो आँखे, जिन्होंने देह का दामन पकड़ा हुआ है, निकली हुई हैं किसी की तलाश में। 

वो तलाश जो जीवन की वेदना है कि ‘मिल जाए या पा लूं’।

जीवन में शेष रह जाने से पहले, यहां पहुंचने से पहले हर कोई ढूंढ लेना चाहता है ‘एक एहसास’। वो एहसास जिसमें बसती है पीड़ा, दुःख,संताप व संतृप्ति। पीड़ा समझती हूँ तो बस यह समझ पाती हूँ कि इसके करीब आने से ही छूते हैं देह को कई भाव कि जब तक पीड़ा न पा लूं, फिरती हूँ ही यूंही भावविहीन होकर। 

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जीवन की बेला को लिए यह शरीर न जाने कहां थमेगा, ‘तुमको’ (पीड़ा) मिल पाउंगी या रह जाउंगी फिर विमुख। 

‘उत्तर’ मैं आपने बांधी हैं कई धाराएं, जहां मेरे रास्ते सवालों में बंद है। क्या भेद खोलूं मैं आपकी पंक्तियों का कि इस बसर को मिल जाए सार, वो पीड़ा जिसकी तलाश में हूँ, जिसकी तलाश में तलाश होना चाहती हूँ, शायद हर कोई!

आपने लिखा, 

इस एक बूँद आँसू में

चाहे साम्राज्य बहा दो,

वरदानों की वर्षा से

यह सूनापन बिखरा दो;

 

इच्छा‌ओं की कम्पन से

सोता एकान्त जगा दो,

आशा की मुस्काहट पर

मेरा नैराश्य लुटा दो ।

चाहे जर्जर तारों में

अपना मानस उलझा दो,

इन पलकों के प्यालो में

सुख का आसव छलका दो;

मेरे बिखरे प्राणों में

सारी करुणा ढुलका दो,

मेरी छोटी सीमा में

अपना अस्तित्व मिटा दो!

 

पर शेष नहीं होगी यह

मेरे प्राणों की क्रीड़ा,

तुमको पीड़ा में ढूँढा

तुम में ढूँढूँगी पीड़ा!

 

मैं यहां न पा पाई कुछ भी, लेकिन थामा है तुम्हारे (महादेवी वर्मा) बिखरेपन का घेरा कि “तुमको” (पीड़ा) आलिंगन में भर विमुखता में तलाश लूंगी अपनी पीड़ा। संताप में उलझूंगी तुम्हारे और फेर लूंगी सांसो की माला। वेदना में गाउंगी दुःख के स्वर और छुऊंगी भावों की बेला। 

फिर पढूंगी ये पंक्तियां और करूंगी इंतज़ार फिर ‘मिल जाने का, ‘तुमको’ पाने का।

 

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