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भूमि अधिकारों तक महिलाओं की पहुंच मजबूत कैसे हो?

महिलाओं के भूमि अधिकारों से जुड़े हस्तक्षेप कार्यक्रमों की कमी इशारा है कि समुदाय-आधारित संगठनों को सशक्त बनाया जाना चाहिए।

                        लैंगिक दृष्टिकोण को अपनाने से पर्यावरणीय समाधानों का निर्माण संभव हो सकता है। | चित्र साभार: यूएन वीमेन एशिया एंड द पैसिफिक /सीसी बीवाय

लिंजी सरकार, शिवानी गुप्ता

भूमि तक महिलाओं की पहुंच, स्वामित्व और नियंत्रण उन्हें वित्तीय सुरक्षा, आश्रय, आय और आजीविका के अवसर प्रदान कर सकता है। इसके बावजूद, भारत में इससे जुड़े प्रयासों के लिए आर्थिक मदद और महिलाओं के भूमि अधिकारों (वीमेन्स लैंड राइट्स – डब्ल्यूएलआर) से संबंधित हस्तक्षेप कार्यक्रमों की कमी बनी हुई है।

इस क्षेत्र में वुमैनिटी फाउंडेशन के काम के दौरान, हमने पाया कि ग्रामीण भारत में महिलाएं, कई मुद्दों जैसे घरेलू हिंसा, सरकारी योजनाओं तक पहुंच, कौशल निर्माण एवं विकास जैसे सहयोगों के लिए अक्सर अपने समुदाय से जुड़े संगठनों से संपर्क करती हैं। कहने का मतलब है कि जब महिलाएं के सामने भूमि अधिकारों की बात आती है तो ये समुदाय-आधारित संगठन ही उनके संपर्क का पहला केंद्र बन जाते हैं। दुर्भाग्यवश, इनमें से कई संगठन हस्तक्षेप करने और पर्याप्त सहायता प्रदान करने में असमर्थ होते हैं।

  • उनके पास अपेक्षित तकनीकी कौशल और भूमि कानूनों और दावा प्रक्रियाओं की समझ की कमी के साथ-साथ हस्तक्षेप के लिए प्रमाणित रणनीतियों का अभाव भी होता है।
  • भूमि से संबंधित कानून और प्रक्रियाएं लगातार विकसित हो रही हैं। उदाहरण के लिए, डिजिटलीकरण की दिशा में सरकार का अभियान कई ऐसे समुदाय-आधारित संगठनों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है जिनके पास ऐसी ऑनलाइन प्रक्रियाओं से जुड़ने के लिए ज्ञान, आत्मविश्वास और कनेक्टिविटी की कमी है।
  • भूमि अधिकारों पर काम करते समय, संगठनों को समुदायों के भीतर सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों जैसे जाति, वर्ग, लिंग और राजनीतिक मित्रता के जटिल, बहुस्तरीय कारकों का भी समाधान करने की आवश्यकता होती है, जिससे यह पूरी प्रक्रिया लंबी हो जाती है।

इसके समानांतर, डब्लूएलआर पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त आंकड़ों; व्यापक, कार्य-आधारित शोध, ओपन-सोर्स असेट्स; और सहयोग मंचों की जरूरत होती है जो चिकित्सकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, भूमि और लैंगिक मामलों के विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों समेत विभिन्न हितधारकों को एक साथ लाते हैं।

यह साफ है कि इस तंत्र के विभिन्न पहलुओं को परिपक्व बनाने की आवश्यकता है। वुमैनिटी फाउंडेशन में, हम जमीनी स्तर पर भूमि अधिकार कार्यक्रमों को लागू करने के लिए विभिन्न समाजसेवी भागीदार संगठनों को फंड मुहैया करवाते हैं। हालांकि, हम इस व्यवस्था के भीतर समाजसेवी संस्थाओं और अन्य संगठनों के एक बड़े समूह के लिए जागरूकता और तकनीकी क्षमता के निर्माण की आवश्यकता और महत्व को भी पहचानते हैं। इस लक्ष्य की दिशा में, हमारी पहलों में से एक डब्ल्यूएलआर कोर्स से क्षमता निर्माण है जो सभी समाजसेवी संस्थाओं के लिए उपलब्ध है। नीचे, हम कोर्स को संचालित करने के अपने अनुभव को रेखांकित कर रहे हैं और बता रहे हैं कि कैसे हमारी सीख हमारे काम को समृद्ध कर रही है।

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प्रशिक्षण के माध्यम से डब्ल्यूएलआर तंत्र को मजबूत करना

हमें बहुत पहले ही इस बात का एहसास हो गया था कि हमें समाजसेवी संस्थाओं के एक बड़े समूह को सक्रिय रूप से क्षमता-निर्माण सहायता प्रदान करके पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर किए जा रहे कार्यों को तेज करने और व्यापक बनाने की आवश्यकता है। इससे विशेष रूप से उन लोगों को लाभ होगा जो अनौपचारिक तरीके से भूमि अधिकार के मुद्दों से जुड़े हैं और जिनमें इससे अधिक गहराई से जुड़ने की क्षमता या आत्मविश्वास की कमी है।

ऐसा करने के लिए, हमने महिलाओं और भूमि स्वामित्व के लिए कार्य समूह (डब्ल्यूजीडब्ल्यूएलओ) के साथ साझेदारी में भारत में डब्ल्यूएलआर पर एक औपचारिक पाठ्यक्रम बनाया – 45 संगठनों का एक नेटवर्क जो 2002 से महिलाओं की भूमि तक पहुंच और स्वामित्व पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य डब्लूएलआर पर पूरी जानकारी देने वाला डिजाइन तैयार करना और डब्लूजीडब्ल्यूएलओ के सदस्य संगठनों की सीख को हितधारकों के एक बड़े समूह तक पहुंचाना था। इससे तैयार हुए 90-घंटों के इस पाठ्यक्रम को 2022 में 50 ऐसे समाजसेवी प्रैक्टिशनर द्वारा स्वीकार किया गया जो अपनी समझ को बढ़ाने और अपने प्रोग्रामिंग में डब्ल्यूएलआर को शामिल करने की इच्छा रखते थे।

अधिकांश प्रतिभागी ऐसे संगठनों से संबंधित थे जिन्होंने भूमि अधिकारों से जुड़ा कुछ काम किया था और वे डब्ल्यूएलआर पर काम करने के तरीकों पर विचार-विमर्श करना चाहते थे। प्रतिभागियों में मिडिल मैनेजर, प्रोग्राम मैनेजर, फ़ील्ड अधिकारी, शोधकर्ता और शिक्षाविद शामिल थे। समुदायों के साथ डब्ल्यूएलआर के बारे में बात करने और मुद्दे से संबंधित कानूनों और प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए सबसे कारगर रणनीतियों की खोज के अलावा, इस पाठ्यक्रम में एक व्यावहारिक तत्व भी शामिल है। प्रतिभागियों को उनके कामकाजी क्षेत्र के भीतर एक डब्लूएलआर परियोजना डिजाइन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसके अलावा, डब्लूजीडब्ल्यूएलओ ने, आठ सप्ताह की अवधि में अपनी परियोजनाओं को विकसित करने और निष्पादित करने के लिए उनका मार्गदर्शन भी किया।

पाठ्यक्रम को अच्छी भागीदारी और प्रतिक्रिया मिली, और यह कुछ ऐसा है जिसका समर्थन हम साल 2023 में करना जारी रखेंगे। बहरहाल, हमने महसूस किया कि यह अकेले सभी हितधारकों तक नहीं पहुंच सकता है और न ही आवश्यक प्रभाव डाल सकता है; इसे क्षमता-निर्माण प्रयासों के अन्य तरीकों की मदद से पूरा किए जाने की जरूरत है।

हमने जो सीखा

1. विविधता को शामिल करना

पाठ्यक्रम ने डब्लूएलआर के लिए एक परिचय के रूप में काम किया, विशेष रूप से यह समूह-1 में, कृषि भूमि और विरासत अधिकारों से संबंधित था। प्रतिभागियों से मिले फीडबैक के आधार पर, समूह-2 में अतिरिक्त घटक शामिल किए गए और कई तरह की भूमि और उन्हें नियंत्रित करने वाले कानूनों (उदाहरण के लिए, वन भूमि/वन अधिकार) को शामिल किया गया। लेकिन भविष्य के संस्करणों में विभिन्न धर्मों, जनजातियों और भौगोलिक क्षेत्रों की महिलाओं को शामिल किए जाने में अभी भी बढ़ोतरी की गुंजाइश है।

डब्लूएलआर पर काम करने वाले फील्ड कैडर – समुदायों के लिए संपर्क के प्राथमिक बिंदु – भी समरूप नहीं हैं। उदाहरण के लिए, समुदायों के साथ काम करने वाली कई महिलाएं बहुत अधिक पढ़ और लिख नहीं सकती हैं। इसलिए, यह पाठ्यक्रम अपने वर्तमान रूप में उनके लिए उपयुक्त नहीं है और इसमें बदलाव की जरूरत है। इसने हमें इस विषय पर अपनी सोच को विस्तृत करने के लिए मजबूर किया कि इन मुद्दों पर काम करने वाले विविध कैडरों को व्यक्तिगत तरीके से प्रशिक्षण कैसे दिया जा सकता है।

2. संदर्भ के महत्व को याद रखना

डब्ल्यूजीडब्ल्यूएलओ पाठ्यक्रम के माध्यम से सीखी गई बुनियादी बातों के अलावा, एक संगठन को उन कानूनों और प्रक्रियाओं के बारे में सीखने से लाभ होगा जो उस क्षेत्र में सबसे अधिक लागू होते हैं जहां वे काम करते हैं और जिन समुदायों के साथ वे काम करते हैं। यह उन्नत पाठ्यक्रमों के डिजाइन और वितरण को प्रभावित करता है, जिसे पर्याप्त रूप से प्रासंगिक बनाने की आवश्यकता होगी।

प्रासंगिक बनाने का अर्थ प्रासंगिक बनाने का अर्थ उनकी पहचान करना भी है जो स्थानीय रोल मॉडल और संसाधन होते हैं और जो इन संगठनों के साथ काम कर सकते हैं तथा स्थानीय भाषा में उनसे संवाद स्थापित करने में सक्षम होते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड के अल्मोडा में भूमि अधिकार मामले से निपटने वाले किसी संगठन के पास सहायता के लिए स्थानीय वकील से संपर्क करने का विकल्प है तो वह अपना काम अधिक कुशलता से करने में सक्षम होगा। इसलिए, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि संगठनों के पास ऐसे स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता हो जो उन्हें अपने कामकाज के क्षेत्रों में डब्ल्यूएलआर कार्य करने में सक्षम बनाते हैं।

3. पाठ्यक्रम को प्रतिभागियों तक लेकर जाना

वास्तविक और प्रभावी जमीनी कार्यान्वयन के लिए, डब्ल्यूएलआर एजेंडा को समाजसेवी संस्थाओं के सभी स्तरों पर लागू करने की आवश्यकता होगी। प्रोग्रामिंग में अधिक व्यापक बदलाव के लिए संगठन और उनके फील्ड कैडरों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है, जिसमें मुख्य रूप से स्थानीय समुदायों की महिलाएं शामिल हैं। महिलाओं के इस कैडर की भाषा, समय की कमी आदि जैसी जरूरतों पर भी विचार करने की आवश्यकता है।

इसलिए, पाठ्यक्रम को सरल बनाने और उसे ऑनलाइन या इलाके, भाषा, भूमि के प्रकार आदि के लिए स्थानीयकृत बनाकर उन तक ले जाने की जरूरत है। इससे प्रतिभागी पाठ्यक्रम को अपनी गति के अनुसार पूरा कर सकेंगे और स्वतंत्र रूप से उसके विकास की प्रक्रिया पर निगरानी रखने में सक्षम होंगे। इसके अलावा, हम इसे स्थानीय लोगों के लिए ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाने के एक कदम के रूप में देखते हैं, जो डब्ल्यूएलआर के काम को संगठनों से परे ले जाने में सक्षम बनाएगा। इससे हमें यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि समुदायों में महिलाओं की भूमि तक पहुंच हो और डब्ल्यूएलआर का काम जमीन पर हो रहा हो। और यही हमारा अंतिम लक्ष्य भी है। डब्लूएलआर को सक्षम करने के लिए हस्तक्षेप कार्यक्रमों को लागू करने और भूमि अधिकार परिदृश्य के बारे में संगठनों के ज्ञान में सुधार करने के लिए कैडरों की क्षमता को विकसित करने की जरूरत है। इसलिए, हमारा यह मानना है कि क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के अभ्यासकर्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के अन्य तरीकों को एक साथ अपनाया जाना चाहिए।

अन्य हितधारक क्या कर सकते हैं?

फंडिंग या भूमि अधिकारों पर काम करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए, इस मुद्दे से जुड़े संगठन, विकास-आधारित दृष्टिकोण अपना सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रकृति-आधारित आजीविका पर काम करने वाला एक संगठन भूमि-संबंधी मामलों में महिलाओं की भूमिका और निर्णय लेने की स्थिति को समझने के प्रयास से इसकी शुरुआत कर सकता है। इससे उन्हें मौजूदा स्थिति के बारे में जानकारी हासिल करने, समस्या के विस्तार की पहचान करने और जिस काम के लिए वे फंडिंग कर रहे हैं उसका दीर्घकालिक प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए अपने हस्तक्षेप में बदलाव लाने में मदद मिल सकती है।

जब महिला किसानों के पास भूमि पर उनके स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध होते हैं तो उस स्थिति में भी उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिलता है। इसलिए, छोटी जोत वाली महिला किसानों के लाभ के लिए तैयार किए गए कार्यक्रम चलाने वाले संगठनों को निश्चित रूप से महिलाओं के स्वामित्व और उनकी भूमि पर नियंत्रण से जुड़े संकेतक बनाना चाहिए। जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय स्थिरता पर काम करने वाले संगठनों का समर्थन करने वाले फंडरों को उनके द्वारा डिजाइन किए गए समाधानों और शमन में महिलाओं की भूमिका पर विचार करना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि लैंगिक दृष्टिकोण अपनाने से कार्यान्वयन योग्य, टिकाऊ और समुदायों के ज्ञान और वास्तविकताओं पर आधारित पर्यावरणीय समाधानों का निर्माण संभव है।

आखिरकार, हमें सामान्य रूप से भूमि अधिकारों और विशेष रूप से महिलाओं के भूमि अधिकारों के बारे में हो रही चर्चा में परिवर्तन लाना होगा। वर्तमान में, यह क्षेत्र से अपरिचित लोगों के लिए कठिन हो सकता है और इससे इस क्षेत्र में काम करने वाले मुख्य लोगों को मूल कारण तक संसाधनों की पहुंच को संभव बनाने या उसे निर्देशित करने में मुश्किल होती है। नतीजतन, भूमि की पहुंच से जुड़े (और अक्सर आकस्मिक) कारणों का समर्थन करने के लिए उत्सुक हैं लेकिन डब्ल्यूएलआर के लिए प्रत्यक्ष फंडिंग बिखरी हुई है। डब्ल्यूएलआर से जुड़ी चर्चाओं कि दिशा बदलने से जमीनी स्तर पर वास्तविकताओं में होने वाले परिवर्तन की गति में वृद्धि आ सकती है।

 

वुमैनिटी फाउंडेशन द्वारा समर्थित यह लेख पहले आईडीआर पर प्रकाशित किया गया है। 

 

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