खबर लहरिया Blog चेहरे के पहचान में फ़ंसा हक, ICDS योजना से आधी महिलाएं बाहर

चेहरे के पहचान में फ़ंसा हक, ICDS योजना से आधी महिलाएं बाहर

                  

भारत की करीब 50 साल पुरानी कल्याणकारी योजना आईसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवा), जो गर्भवती महिलाओं, नवमाताओं और छोटे बच्चों को पोषण देती है उसमें अब राशन पाने के लिए एआई आधारित फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) जरूरी कर दिया गया है। यानी आंगनवाड़ी केंद्रों पर अब राशन लेने से पहले महिलाओं को अपने चेहरे का स्कैन कराना पड़ता है। 

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार: डाउन टू अर्थ)

सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 4.73 करोड़ लाभार्थियों में से लगभग 91 प्रतिशत लोगों ने रजिस्ट्रेशन तो करा लिया लेकिन दिसंबर 2025 तक सिर्फ करीब 2.79 करोड़ यानी 53 प्रतिशत लोग ही राशन ले सके। यानी लगभग आधे लोग इस प्रक्रिया में बाहर रह गए। 

जुलाई 2025 से लागू इस व्यवस्था का मकसद तो सिस्टम को डिजिटल और पारदर्शी बनाना है लेकिन जमीनी स्तर पर इससे कई लोगों को परेशानी हो रही है। कई महिलाओं के मोबाइल नंबर अपडेट नहीं हैं या फोन उनके पास नहीं होता जिससे ओटीपी नहीं मिल पाता। इसके अलावा कई बार मशीन चेहरा पहचान नहीं पाती। खासकर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर के साथ साथ चेहरे में भी बदलाव होते हैं जैसे सूजन हो जाना, दाने निकल आना। इसी वजह से बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं और छोटे बच्चे जरूरी राशन से वंचित रह गए हैं। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में सिर्फ करीब 72 प्रतिशत और झारखंड में 59 प्रतिशत लोग ही इसका फायदा ले पाए हैं। जुलाई 2025 से इस एआई आधारित सिस्टम को लागू किया गया है लेकिन जांच में सामने आया है कि पुरानी फोटो से मिलान न हो पाने के कारण कई गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं और छोटे बच्चे जरूरी राशन से वंचित हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि देश को तेजी से डिजिटल बनाने की कोशिश में क्या सभी जरूरतमंद लोगों तक योजनाओं का फायदा सही तरीके से पहुंच पा रहा है या नहीं?

पोषण ट्रैकर ऐप में गूगल तकनीक का इस्तेमाल, लेकिन कई सवाल बाकी

पोषण ट्रैकर ऐप में चेहरे की पहचान के लिए गूगल की एआई तकनीक इस्तेमाल हो रही है यह बात एक तकनीकी जांच के बाद सामने आई है। बुम लाइव के रिपोर्ट के अनुसार फिनलैंड के आल्टो विश्वविद्यालय के शोधकर्ता अनूप ने ऐप की फाइल का विश्लेषण कर बताया कि इसमें गूगल के “एमएल किट” का इस्तेमाल किया गया है। यह टूल मोबाइल में चेहरों को पहचानने (डिटेक्ट करने) के लिए होता है लेकिन यह किसी व्यक्ति की सही पहचान (आईडेंटिटी) करने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है। यानी यह सिर्फ चेहरा देख सकता है लेकिन यह तय नहीं कर सकता कि वह कौन व्यक्ति है।

सरकार ने कभी खुलकर नहीं बताया कि इस सिस्टम में गूगल की तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। गूगल ने भी साफ किया है कि उसकी तकनीक पहचान करने के लिए नहीं सिर्फ चेहरा पकड़ने के लिए है और इसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है इसकी जिम्मेदारी ऐप बनाने वालों की होती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर सिस्टम सही से काम नहीं कर रहा और लोगों को राशन नहीं मिल पा रहा तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है। अभी तक यह भी साफ नहीं है कि इस तकनीक को किसने बनाया इसकी जांच कितनी सही तरीके से हुई और अगर सिस्टम फेल हो जाए तो क्या विकल्प है। 

आरटीआई के मुताबिक, पोषण ट्रैकर ऐप पर करीब 53.79 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं लेकिन इसमें से चेहरे की पहचान सिस्टम पर कितना खर्च हुआ, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।

फेशियल रिकग्निशन सिस्टम पर सवाल, कई जरूरतमंद रह गए बाहर

इसमें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का कहना है कि आईसीडीएस जैसी पुरानी योजना में फेशियल रिकग्निशन सिस्टम इसलिए लागू किया गया ताकि दोहराव और गड़बड़ियों को रोका जा सके। यह योजना गर्भवती महिलाओं नई माताओं और छोटे बच्चों को पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और प्री-स्कूल शिक्षा देती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बता रही है। बिहार, झारखंड और कर्नाटक के कई आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से बात करने और दस्तावेजों की जांच में सामने आया है कि इस सिस्टम से धोखाधड़ी रुकने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जबकि कई असली लाभार्थी इसका फायदा नहीं ले पा रहे हैं।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 4.73 करोड़ लोगों में से 91 प्रतिशत ने जरूरी कागजी प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन दिसंबर 2025 तक सिर्फ करीब 2.79 करोड़ यानी करीब 53 प्रतिशत लोग ही फेशियल रिकग्निशन के जरिए राशन ले पाए। यानी लगभग आधे लोग बाहर रह गए। राज्यों की बात करें तो बिहार में करीब 71.5 प्रतिशत और झारखंड में सिर्फ 58.5 प्रतिशत लोगों को ही इसका लाभ मिला। वहीं मंत्रालय ने अब तक यह साफ नहीं किया है कि बाकी लोग कहां हैं कितनों का नाम सूची से हटाया गया और क्या सच में इस सिस्टम से धोखाधड़ी कम हुई है या नहीं।

कुल मिलाकर यह साफ दिखता है कि तकनीक को तेजी से लागू करने की कोशिश में सबसे कमजोर वर्ग गर्भवती महिलाएं, नई माताएं और छोटे बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। एक ऐसी योजना जिसका मकसद पोषण और देखभाल देना है वही अब कई लोगों के लिए रुकावट बनती जा रही है। जब मशीन किसी महिला का चेहरा नहीं पहचान पाती,तो सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं बल्कि उसके हक का भी होता है।

यह स्थिति कई बड़े सवाल खड़े करती है क्या डिजिटल सिस्टम लागू करने से पहले जमीनी हकीकत को समझा गया? क्या उन महिलाओं के लिए कोई विकल्प है जो तकनीक की वजह से बाहर रह जा रही हैं? और सबसे जरूरी क्या सरकार यह सुनिश्चित कर पा रही है कि कोई भी महिला और बच्चा सिर्फ एक “तकनीकी गलती” की वजह से पोषण से वंचित न रह जाए?

अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिले तो यह खतरा बना रहेगा कि सुविधा के नाम पर बनाई गई तकनीक ही सबसे जरूरतमंद लोगों के लिए सबसे बड़ी बाधा बन जाएगी।

अगर ऐसी स्थिति बनी रही तो गरीब परिवारों की गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चे कुपोषण का शिकार हो सकते हैं,जिससे उनके स्वास्थ्य पर लंबे समय तक बुरा असर पड़ सकता है। यह न सिर्फ एक तकनीकी समस्या है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक सवाल भी है कि क्या योजनाएं सच में जरूरतमंदों तक पहुंच पा रही हैं या नहीं।

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