उदयपुरा विधानसभा क्षेत्र की पिपलिया पुआरिया पंचायत में भरत राज धाकड़ नाम के युवक का केवल इतना ‘गुनाह’ था कि उन्होंने गांव के ही एक दलित, संतोष परोले के घर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में भोजन कर लिया। पंचायत ने उनका हुक्का-पानी बंद करने के साथ-साथ ‘शुद्धिकरण’ के नाम पर गंगाजल पूजा और पूरे गांव को भोज देने का अजीब आदेश भी सुना दिया।
आज भी भारत जैसे स्वतंत्र और विकसित होते देश में जातिवाद समाज के अंदर गहराई तक पसरा हुआ है। तकनीक, शिक्षा और डिजिटल युग के बावजूद छुआछूत और भेदभाव की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। यह कोई एक-दो जगह की बात नहीं बल्कि कई राज्यों और गांवों में लोग अब भी जातिगत ऊँच–नीच के आधार पर फैसले लेते हैं। समाज के एक हिस्से में यह सोच इतनी मजबूत है कि आधुनिकता और सरकारी जागरूकता अभियान भी इसे पूरी तरह खत्म नहीं कर पाए हैं। इसी वजह से ऐसे मामले बार-बार सामने आते हैं जो दिखाते हैं कि जातिवाद आज भी हमारे समाज की बड़ी और दुखद सच्चाई है।
दरअसल इसी कड़ी में मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से एक और चिंताजनक मामला सामने आया है। उदयपुरा विधानसभा क्षेत्र की पिपलिया पुआरिया पंचायत में भरत राज धाकड़ नाम के युवक का केवल इतना ‘गुनाह’ था कि उन्होंने गांव के ही एक दलित, संतोष परोले के घर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में भोजन कर लिया। जब इसका वीडियो वायरल हुआ तो समाज के कुछ लोगों ने इसे मुद्दा बनाकर पंचायत में भरत राज और उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया।
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पंचायत द्वारा कराया गया शुद्धीकरण की प्रक्रिया
पंचायत ने उनका हुक्का-पानी बंद करने के साथ-साथ ‘शुद्धिकरण’ के नाम पर गंगाजल पूजा और पूरे गांव को भोज देने का अजीब आदेश भी सुना दिया। विडंबना यह है कि इसी क्षेत्र के विधायक और राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल कुछ दिन पहले दलित परिवार के घर भोजन कर समरसता का संदेश दे चुके थे लेकिन पंचायत ने इसकी कोई परवाह नहीं की। यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि बदलाव और आधुनिकता के दावों के बावजूद जातिवाद का असर आज भी समाज में गहराई से मौजूद है।
भरत राज धाकड़ पहुंचे जिला कलेक्ट
पंचायत के इस अनुचित और अजीबोगरीब फैसले के खिलाफ पीड़ित भरत राज धाकड़ सीधे जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भरत राज ने कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा को पूरी घटना विस्तार से बताई। कलेक्टर ने पंचायत के इस फैसले पर नाराज़गी जताते हुए स्पष्ट कहा कि किसी भी तरह की सामाजिक कुरीति या भेदभाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जाएगी।
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उठते सवाल
प्रशासन की कोशिशों के बावजूद यह मामला कई बड़े सवाल खड़ा करता है। लंबे समय की सरकारी योजनाओं, कानूनों और जागरूकता अभियानों के बाद भी समाज का एक हिस्सा अभी तक पुरानी सोच और सामंती रीति-रिवाजों से बाहर नहीं निकल पाया है। आज भी कुछ लोग दूसरों के हाथ का भोजन ऊँच-नीच के आधार पर स्वीकार नहीं करते और छुआछूत जैसी कुप्रथाएं जारी हैं। पहले भी ऐसे मामलों में गिरफ्तारी और कार्रवाई होती रही है फिर भी जातिवाद और भेदभाव की जड़ें समाज में गहराई से बनी हुई हैं। यह स्थिति सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में 21वीं सदी में जी रहे हैं जहां आधुनिकता की बात तो होती है लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी पुरानी मानसिकता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है।
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