“मोबाइल लड़कियों के हाथ में देने से लड़कियां बिगड़ जाएंगी। लड़कियां मोबाइल देख कर हंसती हैं तो घर वाले देखने लगते हैं कि क्यों हंस रही हो। इंस्टाग्राम चलाने नहीं देते अगर कभी चलाने दे भी दिए तो इंस्टाग्राम डिलीट कर दिया जाता है, पूछताछ की जाती है। इंस्टाग्राम न चलाने के लिए धमकी दी जाती है। एक दिन मैं मोबाइल चला रही थी तभी मेरे भाई ने डांट कर मेरा मोबाइल तोड़ दिया।”
ये शब्द कोई बनावटी शब्द नहीं है ये शब्द किसी की कहानी और सच्चाई है। अक्सर कहते हुए सुना जाता है कि अब समय बदल गया लड़कियां और महिलाएं आज़ादी की उड़ान भर रही हैं। ये कुछ हद तक सही भी लेकिन ये पूरी सच्चाई नहीं है। आज के दौर में मोबाइल फोन और इंटरनेट का इतना ज़्यादा चलन है कि लगता है मानों इसकी पहुंच देश के सभी लोग तक है। या फिर कहें कि इसकी जरुरत ही इतनी बना दी गई है कि हर एक व्यक्ति को इस मोबाइल फोन की जरुरत पड़ ही जाती है। क्या कभी ये सोचा है कि इस मोबाइल फोन का महिलाओं की दिनचर्या में कितना भूमिका निभाती है या मोबाइल फोन और इंटरनेट महिलाओं तक पहुंच कितनी है।
आज भी देश के कई हिस्सों में ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के पास अपना मोबाइल फोन या इंटरनेट तक का सीधी पहुंच है ही नहीं। इसी के साथ दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है। महिलाओं के पास अगर मोबाइल है भी तो इंटरनेट के लिए उसका रिचार्ज इतना ज़्यादा महंगा पड़ जाता है कि उसका असर स्कूल की पढ़ाई और उनके आम जीवन पर गहरा प्रभाव देता है। पढ़ाई, नौकरी, बैंक, अस्पताल और सरकारी योजनाएं सब कुछ मोबाइल से जुड़ चुका है। आज दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत नौकरियों में किसी न किसी रूप में डिजिटल कौशल की जरुरत होती है लेकिन ये मौके उन्हें को मिल पाते हैं जो डिजिटल रूप से सक्षम हैं और इसमें महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से बेहद कम हैं।
यूएनआईसीईएफ 2023 के आँकडें बताते हैं कि विकासशील देशों में केवल 41 प्रतिशत महिलाओं को ही इंटरनेट की सुविधा मिल पाती है जबकि पुरुषों में यह संख्या 53 प्रतिशत है। आँकडें के अनुसार महिलाओं के पास स्मार्टफोन होने की संभावना 20 प्रतिशत कम होती है। आँकडें में बताया गया है कि कई ऐसे महिलाएं हैं जिनके पास स्वयं का स्मार्टफोन भी नहीं है। वे महिलाएं घर के पुरुष या फिर घर के किसी और सदस्य से उधार लेकर या फिर जरुरत आने पर मांग इस्तेमाल करती हैं। लड़कियों की तुलना में लड़कों के पास मोबाइल होने की संभावना 1.5 गुना ज़्यादा है और स्मार्टफोन होने की संभावना 1.8 गुना ज़्यादा।
इस मामले पर क्या कहती हैं लड़कियां
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के नरैनी क्षेत्र के जमवारा गांव के कुछ लड़कियों से बातचीत की गई। उनका कहना है कि आज के दौर में इंटरनेट जरुरत बन चुका है लेकिन इसकी कीमत अब भी कई महिलाओं और लड़कियों के लिए बड़ी समस्या है। इस बात में करीब 8 मुस्लिम लड़कियां शामिल थीं जिनमें से एक 11वीं कक्षा में पढ़ाई करती हैं। इंटरनेट महंगा होने की वजह से उनकी पढ़ाई, नौकरी और रोज़मर्रा के काम सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं। ग्रामीण इलाक़ों में स्थिति और भी कठिन है क्योंकि ज़्यादातर परिवारों की आमदनी कम होती है। कई लड़कियां सिर्फ इसलिए ऑनलाइन पढ़ाई या कोचिंग नहीं कर पातीं क्योंकि उनके पास मोबाइल फोन नहीं है या फिर हर महीने रिचार्ज कराने के पैसे। जो महिलाएं स्वास्थ्य सखी जैसी जिम्मेदारियां निभाती हैं उनका काम भी इंटरनेट न चलने की वजह से कई बार रुक जाता है।
भारत में पुरुषों के मुक़ाबले लगभग एक तिहाई से महिलाएं इंटरनेट का इस्तेमाल करती हैं। इसके पीछे मोबाइल की कमी, महंगा डेटा और यह सोच भी है कि लड़कियों को इंटरनेट की जरुरत नहीं होती। इन लड़कियों में से एक स्वास्थ्य सखी हैं लेकिन मोबाइल और डेटा न होने के कारण कई बार उनका काम छूट जाता है। एक दूसरी लड़की 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई नहीं कर पाई। वह मेहंदी, कढ़ाई और नई – नई रेसिपी सीख कर कुछ करना चाहती है लेकिन इंटरनेट न होने की वजह से न तो वह कुछ सिख पाती है और न ही दुनिया की खबरें जान पाती है।
अतिफा, सिफा, तहमीना, अरबिया, साइबा और सफिहा जैसी लड़कियों की बातें यह साफ दिखाती है कि मोबाइल और इंटरनेट अब सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है अब उनके सपनों शिक्षा और रोजगार से जुड़ी एक बुनियादी जरुरत बन गई।
मोबाइल फोन मिल भी जाए तो रिचार्ज पड़ता है महंगा
लड़कियों का कहना है कि इंटरनेट सस्ता या मुफ़्त मिल भी जाए तो उनकी ज़िंदगी में बड़ा बदलाव आ सकता है। वे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकती हैं। ऑनलाइन छोटा-मोटा रोजगार की शुरुआत कर सकती हैं। इंटरनेट की ज़रिए उन्हें सरकारी योजनाओं, सेहत से जुड़ी जानकारी और नौकरी के अवसरों के बारे में भी आसानी से पता चल सकता है। डिजिटल सुविधाएं बढ़ने से महिलाएं आत्मनिर्भर बढ सकती हैं और उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। इसलिए जरुरी है कि सरकार और कंपनिया मिलकर सस्ता इंटरेंट उपलब्ध करवायें, महिलाओं के लिए डिजिटल सेंटर खोलें ताकि हर महिला डिजिटल भारत का हिस्सा बन सके।
इस समूह की लड़की बताती है कि “हमारे घर में सिर्फ एक ही मोबाइल हैं जिसे सब लोग इस्तेमाल करते हैं। एक मोबाइल पांच लोगों में चलता है लेकिन ज़्यादातर भाई ही इस्तेमाल करता है। हमें कहा जाता है क्या करोगी मोबाइल लेकर, क्या चलाओगी।” वह बताती है कि उन्हें धमकी दी जाती है कि मोबाइल में इंस्टाग्राम नहीं चलाना है और कई बार यह भी बताना पड़ता है कि वे क्या देख रही हैं। “कभी सिलाई से जुड़ा कोई वीडियो देखा लिया या पढ़ाई से संबंधित कुछ देख लिया और डेटा खतम हो जाता है तो पूछा जाता है कि क्या ऐसा देख लिया कि डेटा खतम हो गया?” उनका कहना है “एक तो हमें ज़्यादा मोबाइल नहीं दिया जाता और देते भी हैं तो डर लगता है कि डेटा खतम होने पर डाँट पड़ेगी। हर बार तुरंत रिचार्ज भी नहीं कर सकते क्योंकि रिचार्ज बहुत महंगा होता है।”
महिलाएं डिजिटल इंडिया में भी पीछे
वी आर सोशल (We Are Social) की रिपोर्ट डिजिटल इन 2017 भारत की डिजिटल स्थिति की एक साफ तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार जहां उस समय दुनिया की लगभग आधी आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही थी लेकिन भारत में इंटरनेट की पहुंच मात्र क़रीब 35 प्रतिशत तक ही सीमित थी। इस अंतर के पीछे एक बड़ा कारण तकनीकी साधन की कमी और डिजिटल कौशल का अभाव माना गया है लेकिन रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि यह खाई केवल आर्थिक नहीं है। इसमें लैंगिक भेदभाव की भूमिका भी गहराई से जुड़ी हुई है। सोशल मीडिया के उपयोग में हर आयु वर्ग में पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक पाई गई। उदाहरण से देखें तो भारत में फ़ेसबुक के लगभग 191 मिलियन उपयोगकर्ताओं में से सिर्फ 24 प्रतिशत महिलाएं थी।
ये आँकडें दिखाते हैं कि डिजिटल खाई तो कम करने के लिए केवल सस्ता इंटरनेट या उपकरण उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। जरुरत इस बात की भी है कि उन सामाजिक और सांस्कृतिक रुकावटों को भी तोड़ा जाए जो महिलाओं को इंटरनेट के आज़ादी से इस्तेमाल को रोकती है।
टीम से एक लड़की कहती है कि ये सच नहीं है कि हर हाथ में मोबाइल है बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास मोबाइल नहीं है। हमारे आसपास बहुतों के पास मोबाइल है ही नहीं और अगर है तो बगैर इंटरनेट का कौन कितना पैसा देगा हर महीना। रिचार्ज कही ज़्यादा महंगा हो गया है।” उनका मानना है कि मोबाइल और इंटरनेट दोनों अपनी मर्ज़ी से मिले तो उनकी ज़िंदगी काफी बदल सकती है।
एक दूसरी लड़की बताती है कि “वर्तमान में महिलाओं का जीवन डर के साथ चल रहा है। हर रोज बलात्कार जैसे घटनाएं सुनने को मिलती है। ऐसे में अगर किसी लड़की या महिला के साथ कुछ गलत हो रहा हो तो मोबाइल से वो कहीं से भी शिकायत कर सकती है।ऐसे एप होते हैं जिनके लोकेशन भेज कर तुरंत मदद मांगी जा सकती है। हमारे पास मोबाइल एर इंटरनेट की सस्ती सुविधा को हो हमारे लिए ये सबसे बड़ी मदद होगी।”
Indian Inequality 2022 की रिपोर्ट भी यही बात दिखाती है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति सबसे खराब मानी गई है जहां पुरुष और महिलाओं के बीच डिजिटल पहुंच का अंतर 40.4 प्रतिशत पहुंच गया। यह बताता है कि तकनीक की दुनिया में लैंगिक असमानता बढ़ती जा रही है। भारत में डिजिटल सुविधा का फ़ायदा सभी को बराबर नहीं मिल पा रहा है। इसमें महिलाओं की हालत और भी कमजोर है क्योंकि मोबाइल और इंटरनेट की पहुंच पुरुषों के मुक़ाबले बहुत कम है।
महंगा रिचार्ज और उसका पढ़ाई पर असर
लड़कियां कहती हैं अगर ऑनलाइन क्लास है और उनके पास डेटा यानी इंटरनेट नहीं है तो फिर उस दिन की पढ़ाई छूट जाती है। ऑनलाइन होता है तो बाद में कोई समझाने वाला भी नहीं होता। फिर वही सवाल परीक्षा में आ जाता है और हम बना नहीं पाते और फेल हो जाते हैं और फिरफेल होने के कारण पढ़ाई छुड़वा दी जाती है। उसी समूह से एक दूसरी लड़की बताती है कि रिचार्ज इतना महंगा हो गया है कि वे जरुरत पड़ने पर ही तीन चार महीने में सिर्फ एक बार रिचार्ज करा पाते हैं। उनके परिवार मेहनत मज़दूरी पर निर्भर है जहां आमदनी पहले ही कम होती है। इसका असर सबसे ज़्यादा पढ़ाई पर पड़ता है।
The Economic Times के खबर के अनुसार भारत में दूरसंचार (किसी भी टाइप का फ़ोन) कंपनियां जून 2026 से मोबाइल टैरिफ (रिचार्ज और डेटा प्लान) की क़ीमतों में लगभग 15 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी हो सकती है। यह क़रीब दो साल बाद सबसे बड़ा इज़ाफ़ा माना जा रहा है। इस बढ़ोत्तरी से टेलीकॉम सेक्टर की कमाई बढ़ेगी और FY27 तक कुल राजस्व वृद्धि लगभग 16 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में Reliance Jio के आईपीओ से पूरे सेक्टर का मूल्यांकन ऊपर जाएगा जिससे कंपनियों को टैरिफ बढ़ाने का हौसला मिलेगा और उनका ARPU (प्रति उपभोक्ता औसत कमाई) बढ़ेगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि Jio अपने टैरिफ में 10-20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर सकता है ताकि उसका मूल्यांकन Bharti Airtel के क़रीब लाया जा सके। वहीं कर्ज में डूबी Vodafone Idea जैसी कंपनियों के लिए टैरिफ बढ़ाना मजबूरी बनता जा रहा है ताकि वे अपना बकाया चुकता कर सके। लेकिन टैरिफ बढ़ने का सीधा असर सीधा आम लोगों पर पड़ेगा। जिस सस्ते सिम का कभी खूब प्रचार हुआ और जिसे लोग खूब फ्री इंटरनेट के लिए लिए थे उसका रिचार्ज अब तीन से चार सौ तक पहुंच गया है। डिजिटल दुनिया में जुड़ने की कोशिश कर रहीं लड़की और महिलाओं पर इसका प्रभाव ज़्यादा पड़ सकता है।
उसी समूह की लड़कियों का कहना है कि उन्हें कैफे जैसे जगहों की बहुत जरुरत है जिसके मदद से वे आसानी से इंटरनेट का काम कर सके। या फिर रिचार्ज सस्ता होना चाहिए। उनका मानना है कि मोबाइल का असली फ़ायदा और काम इंटरनेट से है। खासकर वहां जहां स्कूल और कोचिंग जैसी सुविधाएं कम हैं। बच्चे यूट्यूब देख कर ऑनलाइन सामग्री से अपनी पढ़ाई का पूरा करते हैं। आज कई महिलाएं मोबाइल के ज़रिए घर बैठे कुछ छोटा काम या किसी चीज का बिक्री कर रही हैं लेकिन इसके लिए इंटरनेट की भी उतनी ही जरुरत है। अब जब रिचार्ज महंगा हो रहा है तो इन कामकाजी महिलाओं के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। ऐसा लगने लगा है कि बढ़ते क़ीमतों के साथ वापस उसी दौर में बढ़ रहे हैं जब महिलाओं को घर के चार दिवारी में कैद कर जीवन बिताना पड़ता था।
महिलाएं मोबाइल फ़ोन के लिए दूसरों पर निर्भर
इसी संदर्भ में सेंटर फ़ॉर इकोनोमिक डेटा एंड एनलिसिस (CEDA) और अशोका विश्वविद्यालय (2025) के शोध से पता चलता है कि बड़ी संख्या में महिलाएं और लड़कियां इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए अपने निजी फ़ोन पर निर्भर नहीं है यानी उनके पास स्वयं का मोबाइल फ़ोन नहीं है। वे अक्सर घर के किसी सदस्य के फ़ोन या सार्वजनिक फ़ोन का इस्तेमाल करती हैं। कई मामलों में उनके पास खुद का फ़ोन नहीं होता और अगर होता भी है तो उसे अपनी मर्ज़ी से चलाने की आज़ादी नहीं होती।
समूह की लड़कियों में से एक लड़की बताती है कि उसके पास अपना मोबाइल फ़ोन नहीं है और वह अपनी पढ़ाई या किसी जरुरी काम के लिए घर में जो सार्वजनिक फ़ोन है उसका इस्तेमाल करती है। वे कहती हैं “ऑनलाइन क्लास के दौरान अगर डेटा खतम हो जाए तो किसी और से वाइफ़ाई या इंटरनेट लेना पड़ता है। फिर इस पर घर वाले सवाल करते हैं कि “ऐसा क्या देख लिया कि डेटा खतम हो गया?” मतलब लड़कियाँ कुछ गलत ही कर या देख सकती हैं।”
लड़कियां बताती हैं कि वे जब चाहे तब मोबाइल इस्तेमाल नहीं कर सकती हैं। पहले उन्हें घर वालों से इजाज़त लेनी पड़ती हैं। सार्वजनिक फ़ोन होने से उनकी निजता भी नहीं रहती। न वे खुल कर बात कर पाती हैं और न ही किसी भी तरह की फैसले खुद से ले पाती हैं। इससे उनकी निर्भरता घर के पुरुषों या दूसरे सदस्यों पर और बढ़ जाती है जो यह तय करते हैं कि वे कब और कैसे तकनीक का इस्तेमाल करेगी। इस समूह में दो – तीन ऐसी लड़कियाँ भी हैं जिन्हें परिवार ने आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं दी। लेकिन उनका मानना है कि अगर उन्हें फ़ोन और इंटरनेट स्वतंत्र रूप से मिलता तो वे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकती थीं।
भारत में पुरुषों और महिलाओं के बीच डिजिटल पहुंच में अंतर
अब अगर पुरुषों और महिलाओं के बीच डिजिटल पहुंच के फर्क़ को ध्यान से देखा जाए तो ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के के इलाक़ों में यह अंतर साफ नजर आता है। मोबाइल और भरपूर इंटरनेट ज़्यादातर पुरुषों के पास होता है। कई घरों में लड़कों के लिए फ़ोन जरुरत माना जाता है लेकिन लड़कियों के लिए अब भी इसे कम जरुरी समझा जाता है। समूह में से एक लड़की बताती हैं कि घर में मोबाइल को लेकर लड़कों और लड़कियों के लिए अलग – अलग नियम है। लड़कियों को कम फ़ोन मिलता है और कई बार इजाज़त भी नहीं मिलता जबकि लड़कों को ऐसी कोई रोक टोक नहीं है। “मैं मोबाइल चलाऊँ तो तरह – तरह के सवाल और भाई लोग मोबाइल चलाएँ तो कोई पाबंदी नहीं होट।”
कुछ आँकड़ो से भी ये बात स्पष्ट हो जाती है जैसे CSMA की मोबाइल जेंडर गेप रिपोर्ट 2024 – 2025 से पता चलता है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 3.7 अरब से ज़्यादा लोग मोबाइल से इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे थे और कुल ब्रॉडबैंड कनेक्शन का 84 प्रतिशत हिस्सा मोबाइल पर ही था फिर भी बराबरी नहीं। जहां 83 महिलाओं के पास कोई न कोई मोबाइल तो है लेकिन स्मार्ट फ़ोन रखने वाली महिलाएं सिर्फ 60 प्रतिशत है और मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली 66 प्रतिशत। रिपोर्ट बताती है कि 2017 में मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल में महिला पुरुष का अंतर 25 प्रतिशत था जो 2020 में घटकर 15 हुआ लेकिन अब ये सुधार रुक सा गया है। इसका मतलब तकनीक तो बढ़ रही है लेकिम इसमें महिलाओं की हिस्सेदारी उतनी तेजी से नहीं बढ़ पा रही।
भारत सरकार का सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MOSPI) की Comprehensive Modular Survey, Telecom (2025) रिपोर्ट बताती है कि भारत में डिजिटल सुविधाएं बढ़ी है। लेकिन देखा जाए तो बराबरी अभी भी सुर है। सर्वे के अनुसार क़रीब 85.5 प्रतिशत घरों में कम से कम एक स्मार्ट फ़ोन है और लगभग उतने ही घरों में इंटरनेट की सुविधा मौजूद है। 15 से 29 वर्ष के युवाओं में मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल ज़्यादा है और इसमें लड़कियों की डिजिटल हिस्सेदारी पुरुषों से पीछे बनी हुई है। खास कर गांवों में जहां जहां बहुत सी महिलाओं के पास मोबाइल फ़ोन ही नहीं होता या बेहद सीमित पहुंच होती है। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि ग्रामीण महिलाओं में ऑनलाइन बैंकिंग और इंटरनेट उपयोग बढ़ा है लेकिन पुरुषों के मुक़ाबले अब भी बना हुआ है। यानी डिजिटल दुनिया में शामिल होना अब पहले से आसान जरुर हुआ है मगर लिंग और स्थान (शहर – गांव) के आधार पर फर्क़ लोगों के रोज़मर्रा के जीवन और जीवन और उनके अवसरों को आज भी तय कर रहा है।
यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को सामने लाती है। एक तरफ देश की लड़कियां विज्ञान और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं पुरुषों से कदम से कदम मिला रही है दूसरी तरफ कुछ महिलाओं को मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल करने लायक भरोसेमंद नहीं माना जा रहा है। जो तकनीक उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखा सकती है वही उनके लिए खतरा बताई जाती hai। समस्या सिर्फ मोबाइल और इंटरनेट तक सीमित पहुंच नहीं है इसमें एक ऐसा सोच है जो लड़कियों की आज़ादी से डरती है। लड़के फ़ोन चलाए तो उसे सीखना कहा जाता है और लड़कियां फ़ोन चलाए तो उसे बिगड़ना मान लिया जाता है।
इंटरनेट महंगा होने का सीधा असर भी पढ़ती हुई लड़कियों और आगे कुछ करने का सपना देखने वाली महिलाओं पर पड़ रहा है। कई लड़कियों की पढ़ाई सिर्फ इस लिए छूट जाती है क्योंकि वे हर महीने रिचार्ज नहीं कर पाती। जो लड़कियां इंटरनेट या सोशल मीडिया के ज़रिए कुछ सीखना या कुछ करना चाहती हैं उनके सामने सबसे बड़ी रुकावट यही बन जाती है कि रिचार्ज का खर्च कैसे उठाया जाए। सक्षम परिवारों में यह खर्च निकल भी आता है लेकिन जिन घरों का जीवन मेहनत मज़दूरी पर चलती है उनके लिए हर महीने 400 -500 रुपए का रिचार्ज कराना आसान नहीं होता। कई बार यह रकम पूरे दिन के कमाई के बराबर होती है। इसका नतीजा यह होता है कि तकनीक जो बराबरी का रास्ता खोल सकती है वही असमानता को और बढ़ाने लगती है। लड़कियों की पढ़ाई रोजगार के मौके और आत्मनिर्भर बनने की कोशिशें बीच रास्ते में ही अटक जाती है।
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