खबर लहरिया National दलित नेता मायावती और चंद्रशेकर ने किया UGC नियमो का समर्थन, डाटा क्या दिखता है?

दलित नेता मायावती और चंद्रशेकर ने किया UGC नियमो का समर्थन, डाटा क्या दिखता है?

देश में जहाँ सवर्णो के द्वारा UGC जमकर विरोध हो रहा है वही दलित नेता मायावती और चंद्रशेखर आज़ाद इसके समर्थन में उतरे हैं। डाटा से जानिए क्यों है इन नियमो के ज़रुरत।   

दलित नेता मायावती और चंद्रशेकर ने किया UGC नियमो का समर्थन

 

 

देश की उच्च शिक्षा से जुड़े UGC के नए नियमो का देशभर में विरोध चल रहा है। 14 जनवरी को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026 लागू किए हैं जिस पर सवर्ण समाज के द्वारा जमकर विरोध प्रदर्शन चल रहा है। जहाँ कहीं लोग अपना जानेवू उखाड़ फेंकने की बात कर रहे हैं वहीँ मेरठ के सलावा गांव के राजपूतो ने शपत ली है की जबतक भाजपा UGC के नए नियम वापस नहीं ले लेती तब तक वो भाजपा को वोट नहीं देंगे। ऐसा लग रहा है मानो पूरा सवर्ण समाज भाजपा के विरोध में उतर आया है। 

 

 

मगर वहीँ दलित नेता इन नियमो के समर्थन में उतरें हैं। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री बहन मायावती भी नए नियमो के समर्थन में उतरी हैं। मायावती ने X पर ट्वीट करते हुए कहा, “देश की उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव के निराकरण/समाधान हेतु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी, द्वारा सरकारी कॉलेज एवं निजी यूनिवर्सिटियों में भी ’इक्विटी कमेटी’ (समता समिति) बनाने के नये नियम के कुछ प्रावधानों को सामान्य वर्ग के केवल जातिवादी मानसिकता के ही लोगों द्वारा इसे अपने विरुद्ध भेदभाव व षडयंत्रकारी मानकर इसका जो विरोध किया जा रहा है, तो यह कतई भी उचित नहीं है।”

 

उन्होंने आगे ये भी लिखा, “पार्टी का यह भी मानना है कि इस प्रकार के नियमों को लागू करने के पहले अगर सभी को विश्वास में ले लिया जाता तो यह बेहतर होता और देश में फिर सामाजिक तनाव का कारण भी नहीं बनता। इस ओर भी सरकारों व सभी संस्थानों को ज़रूर ध्यान देना चाहिये। साथ ही, ऐसे मामलों में दलितों व पिछड़ों को भी, इन वर्गों के स्वार्थी व बिकाऊ नेताओं के भड़काऊ बयानों के बहकावे में भी क़तई नहीं आना चाहिये, जिनकी आड़ में ये लोग आएदिन घिनौनी राजनीति करते रहते हैं अर्थात् इन वर्गों के लोग ज़रूर सावधान रहें, यह भी अपील।”

 

 

मायावती के अलावा आज़ाद समाज के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद ने भी इन नियमो पर अपना समर्थन जताते हुए X पर लिखा है, “उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से लाए गए UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का विरोध-अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के छात्रों के अधिकारों के संदर्भ में-किया जाना सामाजिक न्याय के विरुद्ध एक भ्रामक एवं संगठित प्रयास है, जो अत्यंत चिंताजनक है।”

आज़ाद आगे लिखा, “जबकि UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान अथवा दिव्यांगता के आधार पर-विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तथा दिव्यांगजनों-या इनमें से किसी भी वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव का उन्मूलन करना तथा सभी हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को सुनिश्चित करना है।

भीम आर्मी के अध्यक्ष ने होना पूरा समर्थन देते हुए कहा, “उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन करने के उद्देश्य लाए गए UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 का भीम आर्मी – आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) पूर्ण समर्थन करती है।”

इस नियम के चलते हमे कुछ आंकड़ों में ध्यान देने की ज़रुरत है जो ये समझने में मदद देंगे की इन नियमो की ज़रुरत क्यों है। 

 

Caste discrimination in Indian universities : विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव में 118% की वृद्धि – UGC की रिपोर्ट

 

UGC की खुदकी रिपोर्ट में पाया गया है की 2018 से 2023 तक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में पिछले पांच सालों में 118% की बढ़त हुई है। 

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2021 के बीच, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और IIT, NIT, IIM, IISER जैसे देश के प्रमुख संस्थानों में दलित, बहुजन और आदिवासी समुदायों के 98 छात्रों ने आत्महत्या की। 

एक और सरकारी आंकड़े के अनुसार, 2014 से 2021 के बीच शीर्ष संस्थानों और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हुई 122 छात्र आत्महत्याओं में से 68 छात्र (यानी 55%) पिछड़े समुदायों से थे। इनमें 24 छात्र अनुसूचित जाति से, 3 छात्र अनुसूचित जनजाति से, और 41 छात्र अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से थे।

द प्रिंट की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से केवल एक-एक वाइस-चांसलर SC और ST समुदाय से आता है, और सिर्फ 7 वाइस-चांसलर OBC वर्ग से हैं।