चित्रकूट जिले के पहाड़ी कस्बे में ब्लॉक कार्यालय के ठीक बगल में जल जीवन मिशन योजना के तहत बनाई गई पानी की टंकी है जो पिछले ढाई साल से खड़ी है। देखने में यह टंकी विकास का प्रतीक लगती है लेकिन हकीकत में यह सिर्फ एक ढांचा बनकर रह गई है। कस्बे के करीब पंद्रह हजार लोग आज भी पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्षों पुरानी पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है।
रिपोर्टिंग – नाज़नी रिज़वी, लेखन – रचना
देश के कई हिस्सों में पानी आज सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। कहीं सूखे कुएं हैं, कहीं सूखती नदियां, तो कहीं योजनाएं तो हैं लेकिन पानी नहीं। सरकार की जल जीवन मिशन का उद्देश्य हर घर तक नल से पानी पहुंचाना है लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इस दावे से बिल्कुल उलट दिखती है। उत्तर प्रदेश के पहाड़ी कस्बे की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है जहां लाखों रुपये की पानी की टंकी खड़ी है पाइपलाइन बिछ चुकी है, घर-घर नल भी लगे हैं, लेकिन हजारों लोगों की प्यास आज भी नहीं बुझी। पहाड़ी कस्बे के हजारों लोग आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां वर्षों से चली आ रही पानी की समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है।
ढाई साल से खड़ी टंकी, फिर भी बूंद-बूंद को तरसते लोग
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के पहाड़ी कस्बे में ब्लॉक कार्यालय के ठीक बगल में जल जीवन मिशन योजना के तहत बनाई गई पानी की टंकी है जो पिछले ढाई साल से खड़ी है। देखने में यह टंकी विकास का प्रतीक लगती है लेकिन हकीकत में यह सिर्फ एक ढांचा बनकर रह गई है। कस्बे के करीब पंद्रह हजार लोग आज भी पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्षों पुरानी पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है। सबसे ज्यादा परेशानी गरीब, पिछड़े और दलित समुदाय के लोगों को झेलनी पड़ रही है जिनके पास न तो निजी समरसेबल लगवाने की हैसियत है और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था।
एक किलोमीटर दूर से पानी लाने को मजबूर दलित बस्ती
स्थानीय लोगों ने बताया कि थाना के पीछे पहाड़ के नीचे बसी दलित बस्ती के लोग आज भी रोजमर्रा के पानी के लिए करीब एक किलोमीटर दूर जाने को मजबूर हैं। कई परिवार दूसरों के यहां से हर महीने पचास रुपये देकर पानी भरते हैं लेकिन यह भी तय नहीं कि पैसे देने पर पानी मिलेगा ही। कुछ लोगों को व्यक्तिगत पहचान और व्यवहार के कारण थोड़ा पानी मिल जाता है जबकि कई परिवारों को पैसे देने के बावजूद पानी नसीब नहीं होता। सवाल यह है कि जब सरकारी योजना के तहत नल लगे हैं तो लोगों को दूसरों पर निर्भर क्यों होना पड़ रहा है?
सूखते कुएं और खत्म होती परंपरा
स्थानीय लोगों के अनुसार पहले थाना के पास एक कुआं हुआ करता था जिससे पीने और घरेलू काम के लिए पानी लिया जाता था। दलित बस्ती के भीतर भी एक कुआं बनाया गया था। इसी कुएं की कहानी बताते हैं बस्ती के चुनकाऊना।
वे कहते हैं कि “लगभग चालीस साल पहले भी पानी की बहुत दिक्कत थी। तब सबने मिलकर तय किया कि अपनी बस्ती में कुआं होना चाहिए। मैंने खुशी से अपनी जमीन कुएं के लिए दान कर दी। मोहल्ले वालों ने श्रमदान किया। उस दिन बहुत खुशी हुई थी जब पहली बार अपने मोहल्ले में पानी देखा।”
हालांकि अब वही कुआं सिर्फ बरसात के बाद सावन से माघ तक यानी चार महीने ही पानी देता है। वह भी पीने के लिए नहीं सिर्फ नहाने-धोने और अन्य इस्तेमाल के लिए। इसके बाद कुआं सूख जाता है। चुनकाऊना बताते हैं कि अब पानी मुश्किल से एक हफ्ते चलेगा उसके बाद और दूर से पानी लाना पड़ेगा। एक समय था जब कुआं बिना बिजली, बिना मशीन और बिना किसी योजना के सबको पानी देता था। आज कुएं खत्म हो रहे हैं और उनकी जगह टंकियां और नल आ गए हैं लेकिन पानी फिर भी नहीं।
‘चालीस साल से बस इंतजार कर रहे हैं’
दलित बस्ती में रहने वाली दुलिहाई कहती हैं कि “हम चालीस साल से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कभी तो पानी आएगा।” जल जीवन मिशन के तहत जब पाइपलाइन बिछी और नल लगे तो लगा कि अब घर-घर पानी आएगा लेकिन ढाई साल बीत गए और आज तक नल से एक बूंद पानी नहीं आया। जानवरों के लिए और नहाने-धोने के लिए जैसे-तैसे पानी जुटा लिया जाता है लेकिन पीने के लिए दिन में तीन बार एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
दुलिहाई बताती हैं कि शादियों या किसी कार्यक्रम में टैंकर मंगाना पड़ता है। रास्ता पतला होने के कारण टैंकर बस्ती के अंदर नहीं आ पाता और पांच सौ मीटर दूर खड़ा होता है। फिर बाल्टी-बाल्टी पानी ढोना पड़ता है। टैंकर का पैसा भी बस्ती के लोगों को ही देना पड़ता है। वे कहती हैं “हमें बस पानी चाहिए और कुछ नहीं”
महिलाओं के लिए पानी और भी बड़ा संघर्ष
फूल कुमारी बताती हैं कि उन्हें यहां रहते हुए तीस साल हो गए हैं लेकिन हालात जस के तस हैं। वे कहती हैं “पहाड़ के नीचे रहते हैं इसलिए सरकार की कोई सुविधा यहां तक नहीं पहुंचती।” पहले थाना के पास वाले कुएं से पीने का पानी मिल जाता था लेकिन अब वह कुआं सूख चुका है कचरे से भर गया है और इस्तेमाल लायक नहीं बचा।
महिला होने की वजह से थाने के अंदर जाना भी मुश्किल
पहाड़ी थाने के ठीक बगल में एक तरफ स्कूल और दूसरी तरफ थाना के बीच रहने वाली नीतू मिश्रा जो थाना और स्कूल के बीच रहती हैं वे बताती हैं कि पानी के लिए उन्हें रोज जद्दोजहद करनी पड़ती है। स्कूल खुला हो तो वहीं से पानी मिल जाता है वरना एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। थाना परिसर में पानी की सुविधा है लेकिन थाने के अंदर पुलिस वाले रहते हैं महिला होने के नाते वे वहां जाने से कतराती हैं “डर लगता है कि कहीं कुछ कह न दें।” नीतू मिश्रा बताती हैं कि कई बार उन्हें करीब एक किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है अगर स्कूल खुला होता है तो वहीं से पानी मिल जाता है लेकिन छुट्टी के दिन या स्कूल बंद होने पर बहुत परेशानी होती है।
उन्होंने कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह खुद समरसेबल या कोई निजी पानी व्यवस्था कर सकें। “हमें यहां रहते हुए बीस साल हो गए हैं मेरे सास ससुर को पैंतीस साल हो गए बीस साल से यही हाल है हर दिन पानी की चिंता के साथ जागना पड़ता है उसी चिंता में सोना नीतू मिश्रा का कहना है कि जल जीवन मिशन के तहत जब पाइपलाइन और नल लगे तब उन्हें भी उम्मीद जगी थी कि अब राहत मिलेगी लेकिन आज भी नल सूखा पड़ा है। नीतू कहती हैं कि उनके परिवार को यहां रहते हुए बीस साल हो गए हैं और हर दिन पानी की चिंता के साथ सुबह होती है और उसी चिंता में रात कटती है।
जनसंख्या पंद्रह हजार पर व्यवस्था अधूरी
पूर्व प्रधान विजय बहादुर बताते हैं कि उनके कार्यकाल में पानी की टंकी के लिए जगह चिन्हित की गई थी लेकिन न टंकी बन पाई और न पानी पहुंच पाया। उस समय गर्मियों में टैंकर भेजे जाते थे और चौराहों पर पानी की टंकियां रखवाई जाती थीं जो अब गायब हो चुकी हैं।
वर्तमान पहाड़ी प्रधान राम नरेश वर्मा मानते हैं कि पानी की समस्या एक मोहल्ले एक वाड की दिक्कत नहीं है पूरे पहाड़ी कस्बे की है। उनका कहना है कि पहाड़ी इलाका होने के कारण खुदाई में काले पत्थर निकलते हैं और पानी नहीं निकलता। जो कूआं थाने के पास है उसमें भी काम कराने की कोशिश की वो नहीं हुआ काफी लोगों को उससे सुविधा मिल जाती थी अब मेरे पास एक ही रास्ता है जब पानी की समस्या ज्यादा बढती है मैं मोहल्ले मोहल्ले टैंकर पहूंचाता हूं वहीं करूंगा। दलित बस्ती के कुएं में बोर कराकर हैंडपंप लगाने की कोशिश हुई लेकिन कुआं पुराना होने के कारण कोई उतरने को तैयार नहीं हुआ। रही बात जल जीवन मिशन के तहत नामनि गंगे परियोजना से जो पाइप लाइन पड़ी हैं वो अधूरी हैं पूरे पहाड़ी में अभी पाइप लाइन नहीं बिछी न ही टंकी से पानी की सप्लाई पूरी हुई है।
सवाल वही है, टंकी या पानी?
जल जीवन मिशन और जल धन जैसी योजनाओं का मकसद हर घर तक पानी पहुंचाना है लेकिन पहाड़ी कस्बे में यह लक्ष्य अब भी अधूरा है। कुएं की परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो रही है लोग टंकियों और नलों पर निर्भर हो चुके हैं लेकिन जब नल सूखे हों तो भरोसा किस पर किया जाए? कस्बे के हर मोहल्ले में आज यही सवाल गूंज रहा है क्या सिर्फ टंकी बना देना ही विकास है? या फिर लोगों की प्यास बुझाना भी सरकार की जिम्मेदारी है?
विभाग द्वारा क्या कहा गया?
इस मामले पर पहाड़ी क्षेत्र के जल निगम के जेई अभिजीत ने बताया कि वहां की पानी की टंकी का काम अभी पूरी तरह पूरा नहीं हुआ है। टंकी में पेंटिंग, चारदीवारी और सीढ़ियों का काम अभी बाकी है। इसके अलावा पूरे पहाड़ी इलाके में पाइपलाइन भी अभी नहीं बिछाई गई है।
उन्होंने बताया कि मेन चौराहे पर पाइपलाइन डालनी है लेकिन फिलहाल राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) प्राधिकरण ने काम रोक रखा है। उनका कहना है कि सड़क निर्माण के दौरान पाइपलाइन टूट सकती है जिससे दोबारा काम करना पड़ेगा। इसी वजह से पाइपलाइन का काम फिलहाल रुका हुआ है। जेई अभिजीत ने कहा कि जल्द से जल्द काम शुरू करने की कोशिश की जा रही है ताकि पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की पानी की समस्या दूर हो सके।
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