छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ द्वारा यह फ़ैसला सुनाया गया है कि बलात्कार की घटना में पेनिट्रेशन (प्रवेश) साबित नहीं होता तो उसे बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार की कोशिश माना जाएगा। रुष अंग को महिला के जननांग के ऊपर रखकर बिना प्रवेश के वीर्यपात करना आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार नहीं है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक पूरे मामले में एक बलात्कार आरोपी की सजा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दी है। अदालत ने कहा कि अगर बलात्कार की घटना में पेनिट्रेशन (प्रवेश) साबित नहीं होता तो उसे बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार की कोशिश माना जाएगा। लाइव लॉ के अनुसार कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ पुरुष अंग को महिला के जननांग के ऊपर रखकर बिना प्रवेश के वीर्यपात करना आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार नहीं है। इसलिए सज़ा धारा 376 की जगह 376/511 (बलात्कार की कोशिश) में दी जाएगी। यह फैसला जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने सुनाया।
क्या है इसका पूरा मामला
यह मामला छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का है और करीब 22 साल पुराना है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आरोपी युवती को जबरन घर से खींचकर अपने घर ले गया कपड़े उतारे, कमरे में बंद किया, हाथ-पैर बांधे और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया। बाद में युवती की मां ने उसे छुड़ाया। ट्रायल कोर्ट ने 2005 में आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) और 342 के तहत दोषी मानते हुए 7 साल की सज़ा दी थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान युवती की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट फिर से देखी गई। शुरू में पेनिट्रेशन का आरोप था लेकिन बाद में युवती ने कहा कि आरोपी ने सिर्फ अपना प्राइवेट पार्ट वजाइना पर रखा था प्रवेश नहीं किया। डॉक्टर की रिपोर्ट में भी हाइमन सुरक्षित पाया गया हालांकि कपड़ों और निजी अंगों पर स्पर्म मिलने की बात आई। इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि अपराध की कोशिश हुई थी पूरा बलात्कार साबित नहीं हुआ। इसलिए सज़ा को बदलकर 376/511 के तहत साढ़े 3 साल कर दिया गया। कानून साफ कहता है कि अगर किसी के साथ उसकी मर्जी के बिना यौन संबंध बनाया जाए तो वह अपराध है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?
गौर करने वाली बात है कि बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि महिलाओं से जुड़े यौन अपराधों पर अदालतों की लापरवाह या असंवेदनशील टिप्पणियां सिर्फ लड़की या महिला ही नहीं उसके परिवार और पूरे समाज पर डर और गलत संदेश छोड़ती हैं। बता दें यह बात तब कही गई थी जब एक मामले में “स्किन-टू-स्किन” संपर्क को यौन उत्पीड़न न मानने और एक नाबालिग को ही अपनी इच्छाओं पर काबू रखने की सलाह देने जैसी टिप्पणियां सामने आई थीं। कोर्ट ने उस समय साफ किया था कि महिलाओं की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता और न्याय करते समय इस्तेमाल की जाने वाली भाषा भी उतनी ही संवेदनशील और जिम्मेदार होनी चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी चेताया है कि यौन अपराधों पर असंवेदनशील टिप्पणियाँ समाज में गलत संदेश देती हैं। जब अदालतें यह संकेत देती हैं कि कुछ हरकतें “अभी बलात्कार नहीं” हैं तो यह भी देखना होगा कि इससे रेप का सामना करने वाली महिला का न्याय पर भरोसा कितना प्रभावित होता है। कानून केवल साक्ष्य का तटस्थ विश्लेषण नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का माध्यम भी है।
बलात्कार कब और किसे माना जाए?
इस संदर्भ में अब एक बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि आख़िर बलात्कार की परिभाषा क्या मानी जाए? क्या तब ही उसे बलात्कार कहा जाएगा जब किसी लड़की या महिला के साथ बेहद हिंसक घटना हो जाए या उसकी जान तक चली जाए? ऐसे फैसलों को पढ़कर कहीं ऐसा तो नहीं लगता कि अपराध होने का इंतज़ार कर रहे हैं? उसके पहले की हरकतों को गंभीरता से नहीं ले रहे। आज देश का माहौल ऐसा है कि बलात्कार से न तो छः साल की नवजात सुरक्षित हैं और न ही अस्सी साल की बुज़ुर्ग महिला। अगर देखा जाए तो एक बड़ी लड़की या महिला तो यह समझ सकती है कि उसके साथ गलत हो रहा है और वह उसका विरोध भी कर सकती है लेकिन छह महीने की नवजात या पांच साल की लड़की यह कैसे समझेगी कि उसके साथ क्या किया जा रहा है? अगर शुरुआत की हरकतों को ही अपराध नहीं माना गया तो बलात्कार जैसी घटना होना तो तय है। सड़क, बस, ट्रेन, स्कूल और कॉलेज जैसे हर जगह लड़कियों को गलत तरह से छूने, इशारे करने और अपमानजनक बातें कहने की शिकायतें मिलती हैं। क्या इन सबको तब तक गलत नहीं माना जाएगा जब तक मामला बलात्कार तक न पहुंच जाए? फिर उन लड़कियों और महिलाओं का क्या जो रोज़ किसी न किसी तरह की छेड़छाड़ झेलती हैं लेकिन बोल नहीं पातीं? क्या ऐसे फैसलों से अपराधियों का हौसला और नहीं बढ़ेगा? और अगर न्याय की भाषा ही ऐसी होगी तो लड़की या महिलाएं इंसाफ के लिए किसके पास जाएंगी?
यह भी याद रखना ज़रूरी है कि यह पहला मौका नहीं है इससे पहले भी ऐसे फैसले सामने आ चुके हैं जिन पर महिलाओं के अधिकार और सम्मान को लेकर सवाल उठे हैं।
पति का पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाना सज़ा के दायरे में नहीं
10 फरवरी 2025 को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मैरिटल रेप से जुड़े एक मामले में फैसला देते हुए कहा कि पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाना मौजूदा क़ानून के तहत अपराध नहीं है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास द्वारा पहेले भी इस तरह की जजमेंट देखी गई है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने पति को आईपीसी की धारा 376, 377 और 304 से बरी करते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी की उम्र 15 साल या उससे ज़्यादा है तो पति के साथ बना यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाएगा भले ही वह बिना सहमति के ही क्यों न हो। इस फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल उठा है कि भारत के कानून में पत्नी की सहमति को कितनी अहमियत दी जाती है। इस मामले में पहले जिला अदालत ने आरोपी पति को 10 साल की सजा सुनाई थी लेकिन हाई कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया।
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसके पति ने उसके साथ ज़बरदस्ती और अप्राकृतिक तरीके से यौन संबंध बनाए जिससे उसकी तबीयत बिगड़ गई। इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई और मरने से पहले उसने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया। इसी आधार पर पति पर बलात्कार और अन्य धाराओं में मामला दर्ज हुआ था।
इस मामले पर कुछ वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों का कहना था कि ऐसे फैसले जबरन संबंध बनाने वालों को बढ़ावा देते हैं और यह महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है। मैरिटल बलात्कार के मामलों में भी यही सवाल सामने आता है कि क्या शादी हो जाने के बाद पत्नी की सहमति की कोई अहमियत नहीं रह जाती। अगर किसी वयस्क महिला की मर्जी के बिना उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं तो यह उसके अपने शरीर पर उसके अधिकार को छीनने जैसा है। कानून भले ही अभी इसे पूरी तरह अपराध न मानता हो या इसकी सीमा तय करता हो, लेकिन यह बहस साफ दिखाती है कि आज भी पत्नी की सहमति को पूरा और बराबर का कानूनी हक नहीं मिला है।
प्राइवेट पार्ट छूना-पजामे का नाड़ा खींचना रेप का प्रयास नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 20 मार्च 2025 को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि किसी का प्राइवेट पार्ट छूना या पजामे का नाड़ा खींचना रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी पर काफी सवाल उठे, और अब Supreme Court ने इस फैसले को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इस मामले में अब आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) और POCSO एक्ट की धारा 18 (बलात्कार की कोशिश) के तहत ही सुनवाई होगी। यह फैसला 8 दिसंबर, सोमवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनाया। अदालत ने यह भी माना कि देश में रेप के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और ऐसे मामलों में फैसलों में देरी होती है। कई बार अदालतों की इस तरह की टिप्पणियां अपराधियों का हौसला बढ़ा देती हैं। ऐसे में इस
इलाहाबाद के फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया कि गलत टिप्पणियों पर जवाब देना जरूरी है। हालाँकि बीते कल यानी 18 फरवरी 2026 सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है।अब उस फैसले को रद्द कर दिया है
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