इस आदेश में छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को जबरन क़ब्र से निकालकर गांव से बाहर ले जाने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया है।
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ सालों से धर्मांतरण का मुद्दा चर्चित मुद्दा बना हुआ है। इसी मुद्दे पर बीते साल कई मामला भी देखने को मिला। साल 2025 में छत्तीसगढ़ सहित देश के कई हिस्सों में कथित धर्मांतरण के आरोपों के तहत ईसाई समुदाय पर हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और कानूनी उत्पीड़न की घटनाएँ चिंताजनक रूप से बढ़ी हैं। चर्चों और प्रार्थना सभाओं पर हमले, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, ईसाई परिवारों को गांवों से बेदख़ल करना और मृतकों के अंतिम संस्कार तक को रोकना इस संकट की भयावह तस्वीर पेश करता है। कई मामलों में पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता या पक्षपातपूर्ण भूमिका भी सामने आयी है जबकि धर्मांतरण विरोधी जैसे कानूनों का इस्तेमाल अक्सर वे लोग जो मामले का सामना कर रहे हैं उनके ख़िलाफ़ होते देखा गया। न्यायालयों से भी कई बार स्पष्ट और निर्णायक राहत न मिलने के कारण धार्मिक स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन के संवैधानिक अधिकार कमजोर होते दिखाई देते हैं लेकिन अब इसी मामले से संबंधित सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम अंतरिम आदेश दिया है। इस आदेश में छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को जबरन क़ब्र से निकालकर गांव से बाहर ले जाने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया जिसमें आरोप लगाया गया था कि कुछ इलाक़ों में आदिवासी ईसाइयों को अपनी गांव की सीमा (शव दफ़नाने की जगह) में अपने मृत परिजनों को दफ़नाने नहीं दिया जा रहा है।
गांव में शव को दफ़नाने से मना करने कि कुछ बड़ी घटनाएं भी हुई हैं जिसमें एक तो शव को दफ़नाने ही नहीं दिया जा रहा था और दूसरा दफ़न हुए शव को बाहर निकालने का भी मामला दिखा। इसकी सभी जानकारी नीचे आर्टिकल में देखने को मिल जाएंगे।
लाइव लॉ के अनुसार जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हए साफ कहा कि फ़िलहाल किसी भी दफ़नाए गए शव को कब्र से बाहर निकालने की अनुमती नहीं होगी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ट वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने अदालत में दलील दी कि शवों को जबरन हटाने की घटनाएं सामने आई हैं और इसमें प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
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याचिका में यह भी कहा गया है कि अन्य समुदायों को गांव के भीतर अंतिम संस्कार या दफ़न की इजाज़त है लेकिन आदिवासी ईसाइयों के साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है। आरोप है कि कुछ मामलों में परिजनों को बिना बताएं शवों को कब्र से निकालकर दूसरी जगह दफ़नाने की कोशिश की गई।
छत्तीसगढ़ के धमतरी जैसे अन्य इलाक़ों में धर्म परिवर्तन का मामला हिंसात्मक भी हो गया था।
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इस मामले में दाखिल जनहित याचिका में अदालत से साफ तौर पर यह घोषणा करने की मांग की गई है कि धर्म, जाति या एससी/एसटी/ ओबीसी जैसे किसी भी पहचान के आधार पर भेदभाव किए बिना हर व्यक्ति को अपने गांव में अपने मृत परिजनों को दफ़नाने का अधिकार मिले। याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार सभी ग्राम पंचायत को निर्देश दे कि वे हर गांव में अलग – अलग समुदायों के लिए दफ़न स्थल तय करें और वहां दफ़न की अनुमती सुनिश्चित करें। इसके साथ ही पारंपरिक दफ़न प्रथाओं में दखल न देने और जहां संभव हो सभी समुदायों के लिए क़ब्रिस्तान की व्यवस्था करने की मांग की गई है।
इसी बीच एक दूसरे घटना क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी 2026 को उस याचिका को ख़ारिज कर दिया जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने ग्राम सभा द्वारा गांव के कुछ प्रवेश मार्गों पर लगाए गए बोर्ड (होर्डिंग्स) को सही ठहराया था। इन लगे बोर्ड के ज़रिए ईसाई पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के गांव में प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही गई थी।
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