साल 2025 में छत्तीसगढ़ सहित देश के कई हिस्सों में कथित धर्मांतरण के आरोपों के तहत ईसाई समुदाय पर हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और कानूनी उत्पीड़न की घटनाएँ चिंताजनक रूप से बढ़ी हैं। चर्चों और प्रार्थना सभाओं पर हमले, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, ईसाई परिवारों को गांवों से बेदख़ल करना और मृतकों के अंतिम संस्कार तक को रोकना इस संकट की भयावह तस्वीर पेश करता है। कई मामलों में पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता या पक्षपातपूर्ण भूमिका भी सामने आयी है जबकि धर्मांतरण विरोधी जैसे कानूनों का इस्तेमाल अक्सर पीड़ितों के ख़िलाफ़ होते देखा गया। न्यायालयों से भी कई बार स्पष्ट और निर्णायक राहत न मिलने के कारण धार्मिक स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन के संवैधानिक अधिकार कमजोर होते दिखाई देते हैं। यह स्थिति न केवल अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा पर सवाल उठाती है बल्कि भारत के धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक मूल्यों के भविष्य को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है।
इंग्लैंड स्थित मीडिया संस्था चर्च टाइम्स ने वकालत समूहों की हालिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित किया, इस रिपोर्ट अनुसार भारत के कई हिस्सों में ईसाई समुदाय बढ़ती हिंसा, सामाजिक तनाव और कानूनी जांच का सामना कर रहा है। इस वर्ष ईसाइयों पर हमलों और उत्पीड़न की घटनाएं लगभग रोज़ सामने आ रही हैं जिनका असर परिवारों, पादरियों और छोटे चर्च समूहों पर पड़ा है।
इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (EFIRLC) ने जनवरी से जुलाई 2025 के बीच हिंसा, धमकी और भेदभाव के 334 पुष्ट मामले दर्ज किए हैं। वहीं राष्ट्रीय हेल्पलाइन चलाने वाले यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम (UCF) के अनुसार सितंबर 2025 तक ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 579 हो गई है। इन घटनाओं में प्रार्थना सभाओं के दौरान मारपीट, चर्चों में तोड़फोड़, और राज्य स्तरीय “धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम” के तहत की गई गिरफ्तारियां शामिल हैं।
इन घटनाओं का सबसे अधिक प्रभाव छत्तीसगढ़ में देखा जा रहा है जहां कथित धर्मांतरण के आरोपों के चलते हिंसा और तनाव लगातार बढ़ी है। सिर्फ़ छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी ईसाई समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है।इन रिपोर्टों में वर्ष 2025 में इसकी गंभीरता और भी स्पष्ट रूप से सामने आयी है कि कैसे छत्तीसगढ़ में कई स्थानों पर चर्चों को नुकसान पहुंचाया गया। प्रार्थना में शामिल लोगों के साथ मारपीट की गई और कुछ मामलों में ईसाई परिवारों को घरों से बेदख़ल किया गया। यहां तक कि कुछ घटनाओं में मृतक ईसाई नागरिकों को गांव में दफनाने की अनुमति नहीं दी गई और इन मामलों में न्याय की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची लेकिन अपेक्षित राहत नहीं मिली।
हम इस आर्टिकल के माध्यम से विस्तार में जानने की कोशिश करेंगे कि छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के सवाल पर ईसाई समुदाय के साथ हिंसा और तनाव किस स्तर तक पहुंच गया है इन मामलों पर आदलतों का क्या रूख रहा, घटनाओं की जमीनी हकीकत क्या रही, घटना से प्रभावित लोग क्या कह रहे हैं साथ ही सरकार की ओर से इन विषयों पर क्या प्रतिक्रियाएं सामने आयी हैं।
2025 में हुए बड़े मामले
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें धर्मांतरण के आरोपों के नाम पर ईसाई समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया उनके साथ मारपीट की गई और सामाजिक रूप से परेशान किया गया। इन मामलों में कुछ घटनाएँ तो रिपोर्ट और चर्चा का विषय बन गईं लेकिन कई ऐसी भी घटनाएं हैं जो मीडिया की सुर्खियों तक नहीं पहुँच पातीं और गांवों या बस्तियों की सीमा में ही दबकर रह जाती हैं।
दुर्ग रेलवे स्टेशन पर ननों की गिरफ़्तारी, धर्मांतरण के आरोपों पर राष्ट्रीय बहस
इसी क्रम में छत्तीसगढ़ से एक बड़ा मामला सामने आया जहाँ दो ननों को गिरफ़्तार कर कथित आरोप लगाया कि आदिवासी लड़कियों को अपने साथ बाहर ले जा रही थीं ताकि उनका धर्म परिवर्तन कराया जा सके। यह घटना न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनी और धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के इस्तेमाल को लेकर कई सवाल भी खड़े हुए।
Chhattisgarh Durg: छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के आरोप में केरल के दो नन गिरफ्तार
दरअसल 25 जुलाई 2025 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग रेलवे स्टेशन पर धर्म परिवर्तन और मानव तस्करी को लेकर हंगामा हुआ। बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने 2 नन के साथ एक युवक और 3 आदिवासी युवतियों को घेरकर रोका और आरोप लगाए थे कि युवतियों को बहला-फुसलाकर उत्तर प्रदेश के आगरा ले जाया जा रहा था। जहां उनके धर्मांतरण की योजना थी। आरोप है कि आदिवासी युवतियों के साथ मारपीट भी की गई। बजरंग दल के हंगामे के बाद दो नन और एक युवक को जीआरपी ने गिरफ्तार कर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करते हुए एफआईआर में उल्लेखित आरोपों में छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 1968 की धारा 4 के तहत गैरकानूनी धार्मिक रूपांतरण और भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 143 के तहत मानव तस्करी शामिल है।
इस गिरफ़्तारी से देश में आक्रोश फैल गया। जहाँ 30 जुलाई 2025 को केरल के सांसद और कुछ वामपंथी संगठन काफी मसक्कतों के बाद ननों से मिलने दुर्ग जिले के केंद्रीय जेल पहुंचे। ससे पहले इंडिया गठबंधन के सांसद ननों से मिलने के लिए दुर्ग जेल पहुंचे जहां भारी हंगामा हुआ। आरोप है कि जेल प्रशासन ने सांसदों को मिलने से रोक दिया। इसके बाद सांसदों ने धरना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने साफ कहा कि छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
नारायणपुर की तीन बेटियों को नर्सिंग की ट्रेनिंग दिलाने और उसके पश्चात जॉब दिलाने का वादा किया गया था। नारायणपुर के एक व्यक्ति के द्वारा उन्हें दुर्ग स्टेशन पर दो ननो को सुपुर्द किया गया, जिनके द्वारा उन बेटियों को आगरा ले जाया जा रहा था।
इसमें प्रलोभन के माध्यम से ह्यूमन…
— Vishnu Deo Sai (@vishnudsai) July 28, 2025
ननों को गिरफ़्तारी के बाद कुछ दिनों तक दुर्ग जेल में रखा गया जहां उनकी स्वास्थ्य बिगड़ने लगी थी। इसी के साथ एक ननों के साथ जो आदिवासी युवक सुखमन मंडावी थे उन्हें भी जेल में रखा गया। लगभग एक सप्ताह बाद एनआईए अदालत ने 2 अगस्त 2025 को केरल की दोनों ननों समेत सुखमन मंडावी को ज़मानत दे दी गई। इसके अलावा सीजी खबर नाम के एक चैनल पर प्रसारित एक अन्य वीडियो में उन तीनों महिलाओं के बयान सामने आए। इस वीडियो में उन्होंने दावा किया कि उनसे गलत बयान दिलवाने की कोशिश की गई थी और उन पर दबाव बनाया गया था। महिलाओं ने आगे बताया कि इस मजबूरी के बाद उन्होंने अपनी ओर से एक जवाबी FIR दर्ज कराई है।
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार संबंधित महिलाओं के परिवार सामने आए और उन्होंने कहा कि उनकी बेटियां अपनी इच्छा से ननों के साथ गई थीं। परिवारों ने जबरन धर्मांतरण के आरोपों को पूरी तरह गलत बताया।
रिपोर्ट में एक महिला की बड़ी बहन के बयान का ज़िक्र है जिसमें उसने कहा कि उनके माता-पिता अब नहीं हैं और उन्होंने अपनी बहन को इसलिए भेजा ताकि वह आगरा में नर्सिंग की नौकरी कर सके।
“मैं पहले लखनऊ में इन्हीं ननों के साथ काम कर चुकी हूँ। यह मौका उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद करेगा।” इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि परिवार के एक सदस्य ने बताया कि उन्होंने लगभग पाँच साल पहले ही ईसाई धर्म अपना लिया था। रिश्तेदारों ने ननों और मंडावी की गिरफ्तारी को “अन्यायपूर्ण और भ्रामक कार्रवाई” कहा।
ईसाई व्यक्ति के शव दफ़न पर रोक, परिवार को जाना पड़ा सुप्रीम कोर्ट
दूसरा मामला छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के छिंदवाड़ा गांव का है जहाँ 7 जनवरी 2025 को सुभाष बघेल जो दलित समुदाय से थे और लंबे समय से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे का निधन हो गया। जब उनके परिवार ने गांव के उस कब्रिस्तान में दफनाने की कोशिश की जहां पहले भी ईसाई परिवारों को दफनाया गया था कुछ ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और धमकी दी। परिवार को निजी ज़मीन पर भी अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं मिली और पुलिस ने सहयोग करने के बजाय शव गांव से बाहर ले जाने का दबाव बनाया। हाई कोर्ट से निराशा मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने राज्य की भूमिका पर नाराज़गी जताई लेकिन अंततः दफन गांव से 20 किलोमीटर दूर ईसाई कब्रिस्तान में कराने का आदेश दिया गया।
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में ऐसी घटनाएँ अब नई नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में बस्तर क्षेत्र में ईसाई आदिवासियों और दलितों के अंतिम संस्कार रोकने, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं। कई मामलों में शवों को कब्र से निकाल दिया गया या परिवारों को 50–100 किलोमीटर दूर जाकर अंतिम संस्कार करने को मजबूर किया गया। रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासन और पुलिस ने अक्सर विरोध करने वालों का साथ दिया और केवल अदालत के हस्तक्षेप पर ही कार्रवाई की। अक्टूबर 2022 में कोंडागांव और कांकेर जिलों में ईसाई महिलाओं के शव कब्र से निकाले जाने की घटनाएं भी दर्ज हैं, जिनमें स्थानीय राजनीतिक और अलग-अलग सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों की मौजूदगी की बात सामने आई।
कांकेर में धर्मांतरण विवाद ने लिया हिंसक रूप
छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के आमाबेड़ा क्षेत्र में 18 दिसंबर 2025 को धर्मांतरण से जुड़ा एक बड़ा और गंभीर हिंसक घटनाक्रम सामने आया। यह टकराव उन आदिवासियों के बीच हुआ जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है और उन आदिवासियों के बीच जो अब भी पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। विवाद की शुरुआत एक सरपंच के पिता के शव को ईसाई रीति से दफनाने को लेकर हुई जिसने जल्द ही पूरे गांव को तनाव की चपेट में ले लिया। हालात बिगड़ते ही दोनों पक्षों के बीच झड़प, पत्थरबाज़ी और आगज़नी शुरू हो गई। इसी समुदाय के लोगों को का घर भी जला दिया गया। इस दौरान तीन से चार चर्चों को जला दिया गया और कई घरों में तोड़फोड़ की गई। हिंसा में ग्रामीणों के साथ-साथ पत्रकार और करीब 20 पुलिसकर्मी घायल हुए। स्थिति काबू में करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई। भारी पुलिस बल और वरिष्ठ अधिकारी मौके पर तैनात किए गए हैं। घटना के बाद क्षेत्र में डर और तनाव का माहौल बना हुआ है और कई ईसाई परिवारों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा है।
CG Dharmantran News: शव दफ़नाने पर हिंसा, चर्च में लगाई आग और हुई लाठीचार्ज, गांव में धारा 144 लागू
चर्च में घुसकर धर्मांतरण के आरोप
तीसरा मामला आउटलेट मकतूब एक वीडियो के अनुसार देखा गया। 15 अगस्त को मकतूब द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में दावा किया गया कि विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ के रायपुर के जेहोवा निस्सी चर्च में घुस गए। वीडियो के विवरण के अनुसार समूह का आरोप था कि चर्च में धर्मांतरण की गतिविधियां चल रही थीं। कैप्शन में कहा गया कि विवाद के दौरान चर्च की संपत्ति को क्षति पहुंचाई गई और विरोध कर रहे ईसाइयों पर हमला भी हुआ। साथ ही भीड़ ने कथित धर्मांतरणकर्ताओं पर कार्रवाई की मांग करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ किया। वीडियो में यह भी देखा गया कि मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी भगवा शर्ट और गमछा पहने लोगों की भीड़ और चर्च के सदस्यों के बीच खड़े होकर स्थिति संभालने की कोशिश कर रहे हैं। इस दौरान भीड़ की ओर से बजरंग दल के समर्थन में नारेबाजी भी की गई।
उसके बाद Zee Madhya Pradesh Chhattisgarh के एक यूटूब वीडियो के अनुसार कुछ बयान सामने आए। घटनास्थल पर मौजूद बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के एक सदस्य ने बातचीत के दौरान आरोप लगाया कि उन्हें इस बात की जानकारी मिली थी कि प्रार्थना सभा में शामिल होने वाली महिलाओं को 200 रुपये प्रतिदिन दिए जा रहे हैं। उनका कहना है कि इसी वजह से आसपास के लोगों में नाराज़गी बढ़ी है। बातचीत के दौरान उन्होंने सवाल उठाया “अगर यहां धर्मांतरण नहीं हो रहा तो फिर प्रार्थना सभा बंद कमरे में क्यों की जा रही है?” इसमें से एक युवक का कहना था कि “वो चर्च नहीं है अवैध रूप से उस घर में धर्मांतरण का काम चलाया जा रहा है उस जगह पर सुलभ शौचालय बनाना चाहिए।”
रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने उन महिलाओं को अपनी हिरासत में लिया था जिन पर जबरन धर्म परिवर्तन का हिस्सा होने का आरोप था।
महिलाओं द्वारा बजरंग दल पर आरोप
उसी दिन गिरफ़्तार किए गए महिलाओं का भी वीडियो सामने आया जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था। वीडियो में मिरर छत्तीसगढ़ की पत्रकार ईसाई महिलाओं का इंटरव्यू लेते दिखीं। इसी रिपोर्ट के एक वीडियो में मौजूद भीड़ में से एक व्यक्ति महिलाओं की ओर आपत्तिजनक इशारे करता दिखता है। इसके अलावा एक और शख्स पुलिस की मौजूदगी में भी इसी तरह की अशोभनीय हरकत करते हुए नज़र आता है।
इसी इंटरव्यू में ईसाई महिलाएं बजरंग दल पर आरोप लगाती हैं कि बजरंग दल के सदस्य उनके कपड़े खींचे और उनका स्तन भी छुआ गया। उन्होंने ये भी बतलाया कि हिंदुत्व कार्यकर्ताओं ने उन महिलाओं से पूछा कि “क्या तुम 200-300 रुपये में मेरे साथ आओगी?” इसके अलावा ईसाई महिलाओं को उस भीड़ के अंदर खींच के ले जाने की भी कोशिश की जा रही थी। उन्होंने कहा उस समय पुलिस भी वहां मौजूद थी लेकिन उनके तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दिखी। इसके विरोध में महिलाओं द्वारा एफ़आईआर करवाने पर भी एफ़आईआर नहीं लिखी गई। दूसरी महिला ने बताया कि उनके नाम बताने पर उन्हें जातिसूचक “चमार” गाली दी गई। उन्होंने आगे बताया कि कुछ पुरुषों ने उन्हें बलात्कार करने की धमकी दी और कथित तौर पर ये कहा कि “हम मणिपुर बनायेंगे” (यह टिप्पणी दरअसल मई 2023 में मैतेई समुदाय के पुरुषों की भीड़ द्वारा दो कुकी महिलाओं पर किए गए यौन उत्पीड़न की घटना की ओर इशारा करती थी।)
तो वहीं दुर्ग नन वाले मामले में भी आदिवासी महिलाओं ने बजरंग दल के सदस्यों पर आरोप लगाया गया कि दुर्गा वाहिनी से जुड़ी ज्योति शर्मा लगभग 50 से लेकर 150 लोगों के साथ आई और उन्हें ज़बरदस्ती घसीटकर पुलिस स्टेशन ले जाकर धमकियाँ दी गईं कि उनका बलात्कार किया जाएगा और उन्हें पुरुषों के साथ सोने के लिए मजबूर किया जाएगा। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि उनके शरीर के निजी हिस्सों में छेड़छाड़ की गई, उनसे गाली-गलौच की गई और हिंसक ढंग से मारपीट की गई। परिजनों के साथ पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर बजरंग दल और सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति शर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की थी।
महिलाओं का यह भी कहना था कि उनके माता-पिता को उनकी यात्रा की जानकारी थी फिर भी ज्योति शर्मा ने उनके साथ बदसलूकी की। आरोपों के मुताबिक भीड़ में मौजूद पुरुषों ने उनके साथ छेड़छाड़ की और मोबाइल पर उनका वीडियो बनाने की कोशिश की। महिलाओं का दावा था कि जब उन्होंने वीडियो रिकॉर्ड न करने की अपील की, तो जवाब मिला कि यह “अपनी बेटियों की रक्षा” के लिए किया जा रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शर्मा ने उन्हें कई बार थप्पड़ मारे लेकिन उस हिस्से को रिकॉर्ड नहीं किया गया।
बड़े मामले के अलावा 2025 के और भी मामले
मकतूब की रिपोर्ट के अनुसार 3 मार्च 2025 को बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े एक समूह ने छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित डब्ल्यूआरएस कॉलोनी में लगभग 20 साल पुराने एक चर्च को तोड़ दिया। वायरल वीडियो में भगवा स्कार्फ पहने लोग हथौड़ों से दीवारें गिराते दिखाई देते हैं। स्थानीय लोगों का कहना था कि घटना के समय कॉलोनी में बहुत कम लोग मौजूद थे और पुलिस भीड़ के साथ खड़ी दिखाई दी। रिपोर्ट में बताया गया कि चर्च रेलवे की जमीन पर बना है और हाल ही में उस पर एक अतिरिक्त मंजिल के निर्माण का प्रयास किया गया था। घटना के बाद चर्च पर भगवा झंडा लगा दिया गया और मलबा अब भी वहीं पड़ा है। आसपास के इलाकों में भी इसी तरह की घटनाओं की सूचना मिली है लेकिन अब तक किसी की भी (जो चर्च गिराने के मामले में शामिल हैं) गिरफ्तारी नहीं हुई है। दोनों समुदायों के बीच पिछले कुछ वर्षों में तनाव बढ़ा है और अब हालात और भी गंभीर हो गए हैं।
रायपुर का यह मामला अकेला नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार कॉलोनी से कुछ किलोमीटर दूर एक अन्य स्थान पर भी एक चर्च पर हमला किया गया और एक पादरी को निशाना बनाया गया। समुदाय और पादरी का आरोप है कि कई शिकायतों और स्पष्ट सबूतों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। पुलिस क्षेत्र का दौरा तो कर चुकी है लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
दौड़ा-दौड़ा कर पीटने का आरोप
छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के अंतागढ़ ब्लॉक के हवाचूर गांव में धर्मांतरित (जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया है) लोगों के साथ मारपीट किया गया। 10 अगस्त 2025 की सुबह 8 बजे ग्रामीण (वे ग्रामीण जो आदिवासी हैं लेकिन अपने इच्छा अनुसार चर्च में प्रार्थना करने जाते हैं) के परिवार चर्च से प्रार्थना कर अपने घर लौटे ही थे इसी दौरान गांव के ही कुछ और ग्रामीणों ने (जिन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया है) चर्च से लौटे ग्रामीणों के साथ मारपीट शुरू कर दी। उनका का आरोप था कि उन्हें दौड़ा – दौड़ा कर पीटा गया। महिलाओं के साथ भी बेरहमी से मारपीट की गई। उन ग्रामीणों में 8 परिवार के 36 सदस्य थे।11 अगस्त को भी उन ग्रामीणों को ढूंढ – ढूंढ कर उनके साथ मारपीट की गई और सभी को दूसरे धर्म अपनाने को लेकर उन्हें डंडों से पीटा गया।
मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार ग्रामीणों के साथ हुए मारपीट के विरोध में वे सभी शिकायत दर्ज कराने थाना पहुंचे। शांति बाई दर्रों को बेरहमी से पीटने का आरोप उनके बेटे हितेश कुमार ने लगाया है। वहीं एक और महिला गंभीर रूप से घायल है। जागेशवर उसेंडी के कान का पर्दा फट गया। सभी का इलाज कांकेर के जिला अस्पताल में चल रहा था। राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा कांकेर ईसाई प्रदेश सचिव साईमन दिग्बल ने बताया कि सभी ग्रामीण चर्च गए थे। वे सभी चर्च से वापस आगर अपने – अपने कामों में लगे थे उसी दौरान यह घटना की गई। पुलिस में शिकायत की गई है लेकिन मामला दर्ज नहीं हो पाया है। ग्रामीण दोषियों पर कार्यवाही का मांग कर किए पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।
धर्मांतरण को लेकर झड़पें
बिलासपुर के सीपत में ईसाई समुदाय की बैठक के दौरान लगभग 300 लोगों की मौजूदगी पर हिंदू संगठनों ने धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए विरोध किया जिसके बाद पुलिस ने ईसाई समुदाय के सात सदस्यों पर मामला दर्ज किया और तनाव फैल गया। दोनों समुदायों ने थाने के बाहर घंटों प्रदर्शन किया जिससे माहौल और बिगड़ गया। इसी तरह दुर्ग में भी एक प्रार्थना सभा के दौरान हिंसा भड़क उठी जहां कथित विवाद के बाद एक व्यक्ति (जॉन जो ईसाई समुदाय से था) की पिटाई की गई और बाद में उसे हिरासत में लिया गया जिसके चलते और प्रदर्शन हुए। आरोपों और काउंटर-आरोपों के बीच बजरंग दल और अन्य संगठनों ने कठोर कार्रवाई और जांच की मांग की जबकि ईसाई समुदाय ने धर्मांतरण के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि उनकी सभाओं का उद्देश्य केवल प्रार्थना और सामाजिक सुधार है। पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश की और जांच जारी करने की बात कही लेकिन स्थिति संवेदनशील बनी हुई रही।
छह ईसाई परिवारों को घर बेदख़ल किया
CSW के रिपोर्ट के अनुसार सुकमा में 12 अप्रैल की शाम नौ-ग्राम पंचायतों की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जो 13 ईसाई परिवार अपनी पूर्व परंपरागत आस्था में वापस नहीं लौटेंगे उन्हें समुदाय से बाहर किया जाएगा क्योंकि पंचायतों के अनुसार ईसाई धर्म अपनाने से पारंपरिक रीति-रिवाज प्रभावित हो रहे हैं। सुनवाई के दौरान सात परिवारों ने वापस मूल धर्म स्वीकार कर लिया जबकि छह परिवारों ने अपना धर्म न छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद पंचायत ने इन परिवारों को निष्कासित करने का आदेश दिया। आरोप है कि निर्णय के बाद ग्रामीणों ने इन परिवारों के घरों में घुसकर सामान बाहर फेंक दिया और ट्रैक्टर में लादकर उन्हें गांव से बाहर भेज दिया जिससे करीब 25 लोग जिनमें बच्चे भी शामिल थे रातभर जंगल में रहने को मजबूर हुए।
13 अप्रैल को सीआरपीएफ ने करिंगुंडम के छह विस्थापित परिवारों को वापस लाने की कोशिश की लेकिन ग्रामीणों ने प्रवेश से रोक दिया जिसके चलते परिवारों को पास के चर्च में रात गुज़ारनी पड़ी। अगले दिन अधिकारियों ने ग्रामीणों से बात की और संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि अगर रोक जारी रही तो कार्रवाई होगी। इसके बाद परिवारों को घर लौटने दिया गया।
CSW के अनुसार सुकमा में यह कोई अलग घटना नहीं है। बीते महीनों में आदिवासी समुदायों द्वारा ईसाइयों को गांवों से निकालने की घटनाएँ बढ़ी हैं। नवंबर 2024 में आठ ग्राम सभाओं ने सामूहिक रूप से ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाने का प्रस्ताव भी पारित किया था जिससे करीब 100 लोग प्रभावित हुए। इसी बीच यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम का कहना है कि छत्तीसगढ़ अब ईसाइयों पर हमलों का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है।
चर्चों पर अनौपचारिक प्रतिबंध
14 अगस्त को रायपुर पुलिस ने ज़िले के लगभग सौ पेंटेकोस्टल पादरियों को बातचीत के लिए बुलाया। इस बैठक में उनसे कहा गया कि शहर के सभी हाउस चर्च तब तक अपनी गतिविधियाँ रोक दें जब तक वे जिला कलेक्टर से औपचारिक अनुमति नहीं प्राप्त कर लेते। यानी बैठक के दौरान पादरियों को बताया गया कि अब किसी भी घरेलू चर्च में उपासना करना अनुमति योग्य नहीं है। पुलिस का तर्क था कि उन्हें लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि इन घरों में अवैध धर्मांतरण किया जा रहा है। बैठक के बाद रायपुर और आसपास के सभी हाउस चर्च बंद हो गए और दो रविवार से इनमें कोई गतिविधि नहीं हो पाई।
24 अगस्त को स्थिति और गंभीर हो गई जब एक पादरी को आदेश का उल्लंघन करने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में ले लिया। रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस अधीक्षक ने स्पष्ट कहा कि आगे से ईसाई केवल सरकारी रूप से पंजीकृत चर्च भवनों में ही सामूहिक प्रार्थना कर सकेंगे। निजी घरों में होने वाली धार्मिक सभाओं को रोकना, उनके अनुसार, “कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़रूरी कदम” है।
हालाँकि कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया लेकिन पादरी और ईसाई कार्यकर्ता इस निर्देश को घरेलू चर्चों पर एक तरह का अनौपचारिक प्रतिबंध मान रहे हैं। हाउस चर्च आमतौर पर छोटे समूहों में घरों के भीतर प्रार्थना और धार्मिक बैठकें करने वाली इकाइयां होती हैं खासकर पेंटेकोस्टल समुदाय में जो पारंपरिक चर्च भवनों की बजाय निजी स्थानों में संचालित होती हैं।
शव दफ़नाने से किया इंकार
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के बालोद ज़िले के जेवरतला गांव में ग्रामीणों ने एक ईसाई व्यक्ति रमन साहू के शव दफ़नाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। यह घटना उस मामले के तुरंत बाद सामने आई जिसमें कांकेर ज़िले के कोडेकुर्से गाँव के लोगों ने मनोज निषाद के अंतिम संस्कार का विरोध किया था उनके परिवार को तीन दिनों तक शव लेकर गांव-गांव जगह तलाशनी पड़ी थी।
दोनों मृतक साहू और निषाद ने ईसाई धर्म अपनाया था और यही वजह बताई जा रही है कि ग्रामीणों ने उन्हें सामुदायिक कब्रिस्तान में जगह देने से मना कर दिया। इससे पहले जुलाई में भी कांकेर ज़िले के जामगांव में तनाव तब बढ़ गया था जब सोमलाल राठौर को दफ़नाने के विरोध में एक चर्च पर हमला किया गया था।
रायपुर के एक अस्पताल में साहू की मौत के बाद, जब उनका शव गांव पहुंचा तो ग्रामीणों ने मांग की कि अंतिम संस्कार केवल पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाज़ों के अनुसार ही किया जाए। पुलिस की समझाइश न चलने पर परिवार को सांकरा गाँव स्थित कब्रिस्तान में दफ़नाना पड़ा। एक ओर जब गांव में किसी की मौत होती है तो पूरा समुदाय मिलकर दफ़न करता है। लेकिन अब धर्म बदलने पर वहीं गांव दफ़न की जगह नहीं देना हिंसात्मक या बहिष्कार की सोच ने जन्म ले लेने को दर्शाता हैं।
छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फ़ोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ने इस तरह की घटनाओं की कड़ी आलोचना की। उनके अनुसार दफ़नाने से रोकना न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का हनन है बल्कि यह भी दर्शाता है कि प्रशासन भीड़ दबाव के सामने निष्क्रिय है।
रिपोर्ट अनुसार 2025 में कितने ऐसे मामले दर्ज हुए मामले
इवैंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (EFI-RLC) और यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम (UCF) की रिपोर्टों के अनुसार भारत में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इन मामलों में पूजा सभाओं पर हमले, चर्चों में तोड़फोड़ और धर्मांतरण विरोधी कानूनों के तहत गिरफ्तारियां शामिल हैं।
2025 में ईसाइयों के खिलाफ दर्ज हमले –
- जनवरी–जुलाई 2025: 334 सत्यापित मामले (EFI-RLC)
- सितंबर 2025 तक: 579 मामले (UCF – राष्ट्रीय हेल्पलाइन)
EFI की रिपोर्ट के अनुसार –
- 2023: 601 हिंसक घटनाएँ दर्ज
- 2024: 840 घटनाएँ दर्ज जिनमें से 640 मामलों की पुष्टि हुई
- 2014: केवल 147 मामले दर्ज हुए थे
EFI की वार्षिक रिपोर्ट “भारत में ईसाइयों के विरुद्ध घृणा और लक्षित हिंसा 2024” बताती है कि बीते एक दशक में यह संख्या कई गुना बढ़ चुकी है।
इसी अवधि में छत्तीसगढ़ में जनवरी से जुलाई 2025 के बीच ईसाइयों को “सुनियोजित तरीके से निशाना बनाए जाने” के 86 मामले सामने आए।
इन आँकड़ों के आधार पर ईसाई संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने नए लेबर कोड सहित उन नीतिगत बदलावों को वापस लेने की मांग की है जो धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं को प्रभावित करते हैं।
1950 के दशक से जुड़ा मामला
छत्तीसगढ़ में ईसाई-विरोधी हिंसा का इतिहास 1950 के दशक से जुड़ा माना जाता है। इसी दौरान आरएसएस ने ईसाई-बहुल जशपुर ज़िले में अपना पहला वनवासी कल्याण आश्रम स्थापित किया था। इस संगठन के संस्थापक बालासाहेब देशपांडे ने ईसाइयों और संभावित धर्मांतरण करने वालों के खिलाफ शारीरिक धमकी और हिंसा को बढ़ावा दिया था।
1954 में कांग्रेस शासित मध्य प्रदेश सरकार ने शिकायतों के आधार पर एक जांच समिति बनाई। कहा गया था कि मिशनरी कथित तौर पर लोगों को “जबरन या धोखे से” धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि इस क्षेत्र में आदिवासी समुदायों को वापस उनके मूल धर्म में लाने (घर-वापसी) के प्रयास भी हो रहे थे। यही वजह थी कि उस समय कांग्रेस और आरएसएस दोनों ने इस इलाके में ईसाई धर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिश की।
संविधान क्या कहता है
भारत के संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 तक नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। इन प्रावधानों के अनुसार हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसे प्रचार करने का अधिकार है।
हालाँकि यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है। इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसी शर्तों के तहत लागू किया गया है। यानी कोई भी व्यक्ति तब तक अपने धर्म का पालन या प्रचार कर सकता है जब तक उससे समाज में हिंसा, तनाव या किसी की सुरक्षा और अधिकारों पर असर न पड़े।
अनुच्छेद 25 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के साथ स्वतंत्र रूप से जी सकें लेकिन उसी के साथ समाज की शांति और दूसरों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।
इसी के साथ क़ानून कहता है कि धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 1968 की धारा 4 के तहत किसी व्यक्ति को बल प्रयोग, धमकी, धोखे, लालच या किसी भी प्रकार के अनुचित दबाव के ज़रिये धर्म परिवर्तन कराने को अपराध माना गया है। कानून के अनुसार ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
इस मामले पर सरकार का रुख़ –
धर्मांतरण संशोधन विधेयक
छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदायों के ऊपर हो रही हिंसा जगज़ाहिर हैं जिससे सरकार भी अनछुआ नहीं हैं। अब लंबे समय से जारी धर्मांतरण बहस नए कानून के रूप में निर्णायक मोड़ ले रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा का शीतकालीन सत्र इस बार 14 दिसंबर से 17 दिसंबर तक आयोजित किया गया जिसमें धर्मांतरण संशोधन विधेयक लागू करने की बात कही गई थी लेकिन चूँकि यह विधानसभा सत्र समाप्त हो चुका है और इससे संबंधित कोई भी जानकारी नहीं आयी है। सरकार का दावा है कि कानून में ऐसे प्रावधान जोड़े गए हैं जिससे प्रलोभन, दबाव या धोखे से होने वाला धर्म परिवर्तन रोका जा सके।
छत्तीसगढ़ विधानसभा का शीतकालीन सत्र 14 से 17 दिसंबर तक चलेगा, कुल 4 दिनों के इस सत्र में धर्मांतरण संशोधन विधेयक सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा. गृहमंत्री विजय शर्मा ने पुष्टि की है कि सरकार इस सत्र में नया संशोधित विधेयक पेश करेगी. प्रस्तावित ड्राफ्ट के मुताबिक, अब छत्तीसगढ़ में किसी भी… pic.twitter.com/asyjdeNko5
— Vistaar News (@VistaarNews) November 23, 2025
रायपुर में मंत्री विजय शर्मा द्वारा यह पुष्टि की गई थी कि ड्राफ्ट को अंतिम रूप दिया जा चुका है और सदन की प्रक्रिया पूरी होते ही कानून लागू होगा।
पुलिस की सक्रियता
कई घटनाओं में यह भी सामने आया है कि पुलिस की भूमिका सक्रिय नहीं रही। कुछ मामलों में जब किसी ईसाई परिवार को घर से निकालने, धार्मिक स्थल को नुकसान पहुँचाने या महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की शिकायत की गई, तो पुलिस द्वारा तुरंत कार्रवाई नहीं की गई। प्रभावित लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत दर्ज करवाने में भी कठिनाई होती है और FIR दर्ज नहीं होती। कुछ घटनाओं में जब ईसाई समुदाय की ओर से मारपीट या शव दफ़नाने से रोकने जैसे मामलों में शिकायत करने की कोशिश की गई तो FIR दर्ज न होने की भी बात सामने आई है। इससे भी देखा जा सकता है पुलिस सुनती है सरकार की वे अपनी मर्ज़ी से इस तरह के कदम नहीं उठा पाते कहीं कहीं उनके ऊपर ऑर्डर होता है जिसके अनुसार पुलिस काम करती है। ये उदाहरण सरकार के रुख़ को समझने में आसान बनाती हैं।
डी लिस्टिंग
फिर आता है डी लिस्टिंग। डी लिस्टिंग आज एक चर्चित विषय है। छत्तीसगढ़ में कुछ वर्गों द्वारा ये भी कहा जा रहा था कि जो लोग अपना धर्म परिवर्तन करते हैं उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची से बाहर कर दिया जाए। मई 2025 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साई ने भी घोषणा की थी कि उनकी सरकार आदिवासी लोगों और संभवतः अन्य लोगों के धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए एक नया कड़ा कानून लाएगी। पीटीआई वीडियो को दिए एक साक्षात्कार में विष्णु देव साई ने आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी से बाहर करने की भी वकालत की। यदि वे किसी अन्य क्षेत्र में धर्मांतरण करते हैं तो उन्हें अनुसूचित जनजाति की श्रेणी से हटा दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे धर्मांतरण को रोका जा सकेगा।
देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदाय के प्रति हिंसा कांकेर बस्तर इलाके में ज़्यादातर देखने को मिलता है। इन इलाक़ों में आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं और कई आदिवासी अपने स्वतंत्रता अनुसार या तो ईसाई समुदाय में शामिल होते हैं या फिर कुछ बिना शामिल प्रार्थना के लिए चर्च चले जाते हैं। इसीलिए हिंदू के एक वर्ग यह मानते हैं कि जो भी आदिवासी ईसाइयों और मुसलमानों में धर्म परिवर्तन करते हैं उन्हें संविधान की जनजातीय अनुसूची से हटा दिया जाए ताकि उन्हें आरक्षण का लाभ न मिले। धर्मांतरण के बाद वे आदिवासी नहीं रह जाते हैं, आदिवासी रीति रिवाज को नहीं मानते। पर अब ये सिर्फ आदिवासी नहीं बल्कि सभी लोगों के लागू होगा जिन समुदाय या जाति को आरक्षण का लाभ है। अब सवाल ये है कि जो आदिवासी हिंदू धर्म अपनाया है उनके मामले में यह मान लिया जाना चाहिए कि उन्हें आरक्षण न दिया जाए?
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कहता है कि मात्र धर्म परिवर्तन से एक व्यक्ति अनुसूचित जनजाति की सदस्यता से वंचित नहीं रह जाता है। कोर्ट ने फैसला दिया था कि जनजाति के सदस्य ईसाई धर्म स्वीकार करते हैं वे अपनी जाति नहीं खोते और अनुसूचित जनजातियों को प्रदत्त अधिकारों एवं सुविधाओं से वंचित नहीं किए जा सकते।
न्यायालय
जनता आखिर में न्याय के दरवाज़े पर ही भरोसा करती है। जब समाज और प्रशासन से हर उम्मीद टूट जाती है तो लोग बड़ी आशा के साथ न्यायालय का रुख करते हैं। लेकिन सोचिए क्या हो जब न्यायालय से भी उन्हें निराश होकर लौटना पड़े? रमेश बघेल के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ जहाँ हाईकोर्ट ने अपने ही पुराने फैसलों से मुँह मोड़ लिया। अगर इस पूरी कहानी को विस्तार से देखें तो स्थिति और भी चिंताजनक दिखती है।
रमेश बघेल के मामले को सामान्य रूप से देखा जाए तो हाईकोर्ट का निर्णय असंवैधानिक प्रतीत होता है। दरअसल इससे पहले भी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में साल 2024 में इसी तरह के दो मामले आए थे रामलाल कश्यप बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और सार्तिक कोर्राम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य। दोनों ही मामले बस्तर क्षेत्र से थे और इनके तथ्य भी रमेश बघेल वाले मामले जैसे ही थे। उन मामलों में हाईकोर्ट ने पीड़ित परिवारों के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें पुलिस सुरक्षा के साथ अपने गांव में ही शव दफ़नाने की अनुमति दी थी।
लेकिन रमेश बघेल के मामले में पहली बार हाईकोर्ट ने पहले से बने नियम और अपने ही पिछले फैसलों को नज़रअंदाज़ करते हुए शव दफ़नाने से रोकने का आदेश दे दिया। पहले पीठ के फैसले को बदला जा सकता था लेकिन इसके लिए आवश्यक था कि नई पीठ यह लिखे कि पिछला फैसला असंवैधानिक है पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मामला आगे सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। यहाँ दो जजों बी.वी. नागारत्ना और सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ थी। दोनों ने अलग-अलग राय दी –
जस्टिस नागारत्ना ने कहा कि सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार मौलिक अधिकार है। उन्होंने सरकार को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर हर गांव में ईसाई समुदाय के लिए दफ़न भूमि निर्धारित की जाए। लेकिन यह आदेश लागू नहीं हो सका क्योंकि यह दोनों जजों का संयुक्त फैसला नहीं था।श्री सॉलिसिटर, हमें बहुत दुख है कि एक व्यक्ति को अपने पिता का अंतिम संस्कार करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा। हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि न तो पंचायत, न ही राज्य सरकार और न ही उच्च न्यायालय इस समस्या का समाधान कर पाए हैं। और उच्च न्यायालय ने शरण लेते हुए कहा है कि इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होगी। हमें इससे बहुत दुख हुआ है। अगर उच्च न्यायालय और राज्य सरकार इस मामले को नहीं सुलझा सकते… तो हमें इस बात का दुख है कि इस व्यक्ति को अपने पिता का अंतिम संस्कार करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा।”
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि इस तरह के संवेदनशील और जटिल मामलों में भावनाओं के आधार पर निर्णय नहीं दिया जा सकता।
आमतौर पर जब सुप्रीम कोर्ट के दो जज सहमत नहीं होते तो मामला बड़ी पीठ को भेजा जाता है। लेकिन शव कई दिनों से पड़ा था इसे कारण बताते हुए आपातकालीन स्थिति में दोनों जज सिर्फ एक बात पर सहमत हुए कि शव को गांव से 20 किलोमीटर दूर दफ़नाया जाए।
इसका परिणाम यह हुआ कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पहले वाले फैसलों की स्पष्ट वैधता खत्म हो गई और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर कोई अंतिम साफ़ निर्णय नहीं दिया। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट पहले कई बार यह स्पष्ट कर चुका है कि अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार का अधिकार मृत व्यक्ति को भी प्राप्त है और किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म के आधार पर दफ़नाने से रोका नहीं जा सकता। अब सबसे चिंता की बात यह है कि इसी फैसले के बाद यह एक ‘नियम’ जैसा बन गया है कि आदिवासी ईसाई समुदाय को गांव में दफ़नाने के लिए अलग से जमीन नहीं मिलेगी।
बस्तर में लगातार बढ़ती घटनाएं
बस्तर क्षेत्र में ऐसे मामले कोई नई बात नहीं हैं। पिछले तीन-चार वर्षों से यहां ईसाई आदिवासी समुदाय लगातार हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और डर के माहौल का सामना कर रहा है। कई परिवारों को अपने रिश्तेदारों का अंतिम संस्कार तक करने नहीं दिया गया। किसी को सौ किलोमीटर दूर दूसरे गांव में शव ले जाना पड़ा तो किसी के घर तोड़ दिए गए। चर्चों और पादरियों पर भी कई बार हमले किए गए।
एक मामले में ग्रामीणों ने एक वृद्ध ईसाई महिला के दफनाए गए शव को कब्र से निकालकर परिवार को वापस कर दिया और कहीं और ले जाकर दफनाने को मजबूर किया। अधिकतर घटनाओं में प्रशासन ने ग्रामीणों का ही साथ दिया और पीड़ितों की मदद करने से कतराया। कांकेर, नारायणपुर और कोंडागांव जिलों में लगभग हर गांव में चर्च जाने वाले परिवारों को किसी न किसी तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। दिसंबर 2022 में तो हालात इतने बिगड़े कि 16 गांवों में 450 से अधिक ईसाई आदिवासियों जिनमें महिलाएं और बच्चे भी थे को बड़ी हिंसा का सामना करना पड़ा।
इन परिवारों के सामने सिर्फ दो रास्ते छोड़ दिए गए या तो चर्च जाना बंद कर दें और परंपरागत रीतियों को मानें या फिर गांव हमेशा के लिए छोड़ दें। यह डर अब बिहार मध्य प्रदेश और ओडिशा तक फैल चुका है जहां पादरी बताते हैं कि स्थानीय समूह लगातार उन्हें निगरानी में रखते हैं और छोटी-छोटी प्रार्थना सभाओं पर भी पुलिस पूछताछ हो जाती है। अमेरिकी USCIRF ने भी इस साल भारत को “विशेष चिंता वाला देश” बताया हालांकि भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को गलत बताया।
धार्मिक स्वतंत्रता पर बढ़ते सवाल, छत्तीसगढ़ में हालत चिंताजनक
कई पीड़ित परिवारों द्वारा यह भी सामने आया कि जब वे मदद के लिए पुलिस प्रशासन के पास पहुंचे तो उन्हें न्याय दिलाने की जगह उल्टा उन्हीं पर मामले दर्ज कर दिए गए। धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा धमकी और भेदभाव की घटनाओं को लेकर प्रशासन और पुलिस अक्सर चुप्पी साधे रहते हैं। राज्य की यह चुप्पी कट्टरपंथी समूहों को बढ़ावा देती है, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों में भय और असुरक्षा गहराती जा रही है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 हर नागरिक को समान अधिकार और कानून के तहत बराबरी की सुरक्षा देते हैं। साथ ही धार्मिक आधार पर किसी भी भेदभाव को साफ तौर पर गलत ठहराते हैं। इसके बावजूद प्रदेश में लागू धार्मिक स्वतंत्रता कानून का इस्तेमाल अक्सर केवल एक धर्म से दूसरे धर्म में जाने पर रोक लगाने के रूप में किया जा रहा है जबकि “घर वापसी” जैसी गतिविधियां इस कानून के दायरे से बाहर हैं। हाल ही में ऐसी कई खबर हैं जिसमें लोगों को ईसाई समुदाय को छोड़ कर हिंदू धर्म में आने को मजबूर कर रहे हैं और उनके आने पर उनका पैरा धुलवा कर उनका स्वागत किया जा रहा है।
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और हर व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म मानने का हक है। यदि प्रशासन इस अधिकार की रक्षा नहीं कर पा रहा तो यह सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों की भी असफलता है।
इतिहास और कानून दोनों यह बात मानते हैं कि आदिवासी समुदाय मूल रूप से हिंदू धर्म से नहीं जुड़े थे। फिर भी आज सबसे ज़्यादा विरोध इन्हीं धर्मांतरित आदिवासियों को झेलना पड़ रहा है। दूसरी ओर अनुसूचित जाति समुदायों को कहीं भी अंतिम संस्कार को लेकर ऐसे विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। इसका कारण यह माना जाता है कि संवैधानिक व्यवस्था ने हमेशा अनुसूचित जातियों को हिंदू धार्मिक ढांचे के हिस्से के रूप में माना है जिसके चलते दलित संगठनों ने इस पर कई बार आपत्ति भी जताई है।
ऊपर जिन सभी मामलों की चर्चा की गई है वे वर्ष 2025 की घटनाएँ हैं और यह दिखाती हैं कि छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण से जुड़ी स्थिति लगातार गंभीर और चिंताजनक होती जा रही है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि लोगों को अपने मूल अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायालयों का सहारा लेना पड़ रहा है।
सबसे अहम सवाल यह है कि सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का शिकार मुख्य रूप से आदिवासी समाज का ही एक वर्ग क्यों हो रहा है। ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासी न तो अपने पारंपरिक समुदाय में स्वीकार किए जा रहे हैं और न ही उन्हें सुरक्षा और समान अधिकार मिल पा रहे हैं। शव दफनाने, गांव में रहने और धार्मिक प्रथाओं तक पर रोक जैसी घटनाएँ यह बताती हैं कि आस्था का प्रश्न अब सामाजिक टकराव में बदल चुका है।
कई मामलों में ग्राम सभा और भीड़ का दबाव कानून से ऊपर दिखाई देता है जबकि प्रशासन की भूमिका भी अक्सर सवालों के घेरे में रही है। यह स्थिति केवल धर्मांतरण नहीं बल्कि आदिवासी समाज के भीतर बढ़ती असहिष्णुता और संवैधानिक अधिकारों के कमजोर पड़ने की ओर इशारा करती है।
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