आदिवासी समाज और धर्मांतरित समुदाय के बीच 18 दिसंबर 2025 को तनाव बढ़ गया और दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। हालात बिगड़ने पर गुस्साए आदिवासियों ने गांव के सरपंच के घर में तोड़फोड़ की और एक चर्च में आग लगा दी। लगभग तीन चर्चों में आग लगा दी गई।
छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के आमाबेड़ा इलाके के बड़े तेवड़ा गांव में शव दफनाने को लेकर विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। आदिवासी समाज और धर्मांतरित समुदाय के बीच 18 दिसंबर 2025 को तनाव बढ़ गया और दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। हालात बिगड़ने पर गुस्साए आदिवासियों ने गांव के सरपंच के घर में तोड़फोड़ की और एक चर्च में आग लगा दी। इसके बाद भीड़ बढ़ती चली गई और करीब तीन हजार लोग आमाबेड़ा पहुंच गए। यहां एक और चर्च को आग के हवाले कर दिया गया। भीड़ तीसरे चर्च की ओर बढ़ रही थी तभी पुलिस ने लाठीचार्ज कर हालात को काबू में करने की कोशिश की।
इस हिंसा में कई ग्रामीणों के साथ-साथ कवरेज कर रहे कुछ पत्रकार और अंतागढ़ के एएसपी आशीष बंछोर समेत करीब 20 पुलिसकर्मी घायल हो गए। तनाव को देखते हुए पूरे इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई है और पुलिस बल तैनात किया गया है।
बता दें दोनों ही पक्ष मूल रूप से आदिवासी समुदाय से हैं। जिस समूह को ईसाई समुदाय कहा जा रहा है वे आदिवासी हैं जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है जबकि दूसरा पक्ष उन आदिवासियों का है जिन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया है और अपने पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। बताया जा रहा है कि सरपंच राजमन सलाम चाहते थे कि उनके पिता का अंतिम संस्कार ईसाई रीति-रिवाजों के अनुसार दफनाकर किया जाए। इसी बात का गांव के अन्य आदिवासियों ने विरोध किया, जिसके बाद विवाद बढ़ता गया और हालात तनावपूर्ण हो गए।
क्या है पूरा मामला
आमाबेड़ा क्षेत्र के बड़े तेवड़ा गांव में 16 दिसंबर को सरपंच राजमन सलाम के पिता चमरू राम सलाम (70) का निधन हो गया था। परिजनों ने शव को घर के पास अपनी ही ज़मीन पर दफन कर दिया। इसी बात को लेकर आदिवासी समाज में नाराज़गी फैल गई। ग्रामीणों का कहना था कि अगर आदिवासी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार नहीं किया गया है तो शव को गांव से बाहर कहीं और दफनाया जाए। रविवार से ही इस मुद्दे पर माहौल तनावपूर्ण बना रहा और ग्रामीण लगातार शव को कब्र से निकालने की मांग करते रहे। 17 दिसंबर 2025 को मामला तब और बिगड़ गया जब आदिवासी समाज के लोग खुद ही शव निकालने पहुंचे तभी दूसरे पक्ष के लोग सामने आ गए और दोनों ओर से मारपीट हो गई जिसमें कुछ लोग घायल हो गए। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर हालात संभालने की कोशिश की लेकिन तनाव कम नहीं हो सका।
हिंसा, लाठीचार्ज और गांव में भारी पुलिस तैनाती
17 दिसंबर 2025 को हुई झड़प के बाद आमाबेड़ा बंद रहा और 18 दिसंबर 2025 को पुलिस बल की तैनाती और बढ़ा दी गई। हालात गंभीर होते देख प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस डीआईजी तुकाराम कांबले भी मौके पर पहुंचे। इसी बीच सरपंच के बेटे ने वीडियो जारी कर समर्थकों से शव निकालने का विरोध करने की अपील की। पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में विधिवत प्रक्रिया के तहत शव को कब्र से निकालकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया लेकिन इसके बाद भी हालात नहीं सुधरे। ग्रामीणों के बीच फिर झड़प हुई, पत्थरबाजी शुरू हो गई और गुस्साए लोगों ने चर्च में तोड़फोड़ कर आग लगा दी। स्थिति काबू से बाहर होती देख पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। फिलहाल आमाबेड़ा और बड़े तेवड़ा गांव में तनाव बना हुआ है। बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक, कांकेर के डीआईजी, कलेक्टर और एसपी समेत भारी पुलिस बल और कार्यपालिक दंडाधिकारी गांव में मौजूद हैं। रास्तों को पेड़ काटकर और पत्थर रखकर बंद किया गया था और आदिवासी समाज ने धर्मांतरण के विरोध में प्रदर्शन किया। प्रशासन का कहना है कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है और शांति बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं
दोनों पक्षों के बयान
आदिवासी समाज का कहना है कि जिस तरीके से शव को जमीन में दफन किया गया वह गांव की परंपराओं और सामाजिक नियमों के खिलाफ है। उनका आरोप है कि न तो समाज की अनुमति ली गई और न ही पुराने रीति-रिवाजों का पालन किया गया। इसी वजह से वे इस दफन को गलत मानते हैं और इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर धर्मांतरित समुदाय का तर्क है कि अंतिम संस्कार उनके अपने धार्मिक विश्वास और परंपरा के अनुसार किया गया है। उनका कहना है कि प्रक्रिया में किसी तरह की गलती नहीं हुई है और उन्होंने अपने धर्म के नियमों का ही पालन किया है। इसी विरोधाभास के कारण दोनों पक्षों के बीच विवाद और गहराता चला गया।
कांकेर के गांवों में धर्मांतरण को लेकर सख्ती
कांकेर जिले में धर्म परिवर्तन से जुड़े मामलों के बाद ग्रामीणों ने 14 गांवों में पास्टर और पादरियों के प्रवेश पर रोक लगा दी है। गांव वालों का कहना है कि यह फैसला उन्होंने अपनी परंपरा, संस्कृति और सामाजिक ढांचे को बचाने के लिए लिया है। इन गांवों में जामगांव भी शामिल है जहां करीब सात हजार की आबादी रहती है। ग्रामीणों के अनुसार यहां 14–15 परिवारों ने बिना सार्वजनिक घोषणा के ईसाई धर्म अपनाया है।
बढ़ती दूरी और कोर्ट का रुख
धर्म परिवर्तन के बाद आदिवासी समाज और ईसाई बने परिवारों के बीच आपसी संबंधों में खटास बढ़ गई है। ईसाई समुदाय के लोगों का कहना है कि अब उनके रिश्तेदार भी उनसे मिलने नहीं आ पाते क्योंकि आसपास के गांवों में भी इसी तरह की पाबंदियों के बोर्ड लगे हुए हैं। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ग्राम सभाओं के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने माना कि जबरन या लालच देकर होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए लगाए गए ऐसे बोर्ड असंवैधानिक नहीं हैं बल्कि स्थानीय संस्कृति की रक्षा के लिए उठाया गया एहतियाती कदम हैं।
आज की जानकारी
अखिलेश एड्गर सामाजिक कार्यकर्ता (प्रोग्रेसिव क्रिशचन एलाइंस) ने बताया कि अभी वहां की स्थिति गंभीर है और पुलिस फ़ोर्स लगी हुई है। स्थिति इतनी गंभीर है क़ि वहां के बहुत सारे लोग जो ईसाई समुदाय के लोग हैं वे अपना घर छोड़ कर दूसरी जगह पर चले गए हैं। उन्होंने बताया कि आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा तीन चर्च जलाए गए हैं। जो राजमन सलाम (विक्टिम) हैं उनका घर जला दिया गया और वहां पर एक चर्च था उसे भी तोड़-फोड़ कर चर्च में आग लगा दी गई। गांव से तीन किलोमीटर आमाबेड़ा है जहां पे उस एरिया का थाना है वहां पर दो चर्च थे और उस दोनों चर्चों में भी तोड़-फोड़ की गई और जला दिया गया। उन्होंने बताया की कुछ लोगों को अस्पताल में इलाज के लिय भर्ती भी की गई।
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