भारत के विश्वविद्यालय और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव काफी हद तक बढ़ गया है। इसका खुलासा हाल ही में अनुदान आयोग (यूजीसी) / University Grants Commission (UGC) द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के जरिए हुआ। यह आंकड़ें संसदीय समिति और सर्वोच्च न्यायालय को प्रस्तुत किए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में पिछले पांच सालों में 118.4% की वृद्धि हुई है। हालांकि आंकड़ों में 90% मामलों के निपटाने की दर दिखाई गई, लेकिन शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों ने एससी/एसटी सेल में प्रशासनिक नियंत्रण की कमी का हवाला देते हुए इस आंकड़े पर सवाल उठाए हैं।
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अक्सर जातिगत भेदभाव की ख़बरें सामने आती है। जाति आधारित आरक्षण को हटाने की मांग को लेकर भी कई बार सवाल उठे हैं। कॉलेजों में आरक्षण की वजह से दाखिल लेने वालों को मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है जिसकी वजह से कई छात्रों के आत्महत्या करने और छात्रों को परेशान करने की भी खबर सामने आई। यूजीसी द्वारा जारी आंकड़ों में ये बात स्पष्ट हो गई कि जाति आधारित भेदभाव आज तक छात्रों के साथ होता है जिसका ग्राफ ऊपर उठता ही जा रहा है।
विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव में वृद्धि
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के आंकड़ों से पता चला है कि दर्ज की गई जातिगत घटनाओं की संख्या 2019-20 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गई ।
2019-20 और 2023-24 के बीच, यूजीसी को 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों में समान अवसर प्रकोष्ठों (ईओसी) और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) प्रकोष्ठों द्वारा दर्ज की गई 1,160 शिकायतें प्राप्त हुईं।
इनमें से 1,052 शिकायतों को हल के रूप में चिह्नित किया गया, जो 90.68% की निपटान दर को दर्शाता है। हालांकि, लंबित मामलों की संख्या 2019-20 में 18 से बढ़कर 2023-24 में 108 हो गई।
जातिगत भेदभाव में लगातार वृद्धि
आंकड़ों में यह भी समाने आया कि यह संख्या कम नहीं हो रही है बल्कि साल के साथ साथ इसमें भी वृद्धि देखी गई है। शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति के साथ साझा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि दर्ज किए गए मामलों में लगातार वृद्धि हुई है:
2020-21 में 182
2021-22 में 186
2022-23 में 241
जिसके बाद 2023-24 में इनमें तेजी से वृद्धि हुई।
छात्रों में बढ़ती जागरूकता भी वृद्धि का कारण
हिंदुस्तान टाइम्स के रिपोर्ट के अनुसार यूजीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि शिकायतों में वृद्धि का कारण अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और समान अवसर प्रकोष्ठों (Equal Opportunity Cell) के कामकाज के बारे में छात्रों में बढ़ती जागरूकता हो सकती है। जातिगत भेदभाव होने पर अब चुप नहीं होते बल्कि शिकायत भी दर्ज करते हैं जिसकी वजह से यह वृद्धि देखी गई है।
पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला से जुड़ी याचिका
यूजीसी द्वारा प्रस्तुत आंकड़े जनवरी 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के जवाब में थे, जिसमें निकाय को 2012 के नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर डेटा संकलित करने की आवश्यकता थी। यह निर्देश हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला की मृत्यु के बाद दायर एक याचिका के तहत आया है। याचिका में विश्वविद्यालय परिसर में जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए यूजीसी द्वारा जवाबदेही तय करने और पर्याप्त तंत्र स्थापित करने की मांग की गई थी।
फरवरी 2025 में, यूजीसी ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर किया जिसमें कहा गया कि उसे 3,522 उच्च शिक्षा संस्थानों से प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं। आंकड़ों से पता चला कि 3,067 समान अवसर प्रकोष्ठों और 3,273 अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठों को 1,503 शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जिनमें से 1,426 का समाधान किया गया था।
यूजीसी के जातिगत भेदभाव के खिलाफ नए नियम
द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव से निपटने के लिए नए नियम बनाए हैं। इन नए नियमों के तहत परिसरों में समानता समितियों का गठन अनिवार्य है और इनका पालन न करने पर डिग्री या कार्यक्रम प्रदान करने से प्रतिबंधित किए जाने सहित दंड का प्रावधान है। यह नियम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने मंगलवार 14 जनवरी 2026 को जारी किए थे।
यूजीसी ने 14 जनवरी 2025 को नए नियम अधिसूचित किए, जिनका नाम है “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विनियम, 2026”। ये नियम 2012 से चले आ रहे भेदभाव-विरोधी नियमों को अपडेट करने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन इन नए नियमों का एक मसौदा (ड्राफ्ट) यूजीसी ने पिछले साल फरवरी 2025 में जनता से सुझाव लेने के लिए जारी किया था। उस ड्राफ्ट को लेकर काफी आलोचना हुई, क्योंकि ओबीसी छात्रों को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे से बाहर रखा गया था,जिससे लगा कि उनकी समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
ओबीसी छात्रों हुई जाति-आधारित भेदभाव को भी किया शामिल
नियमों के अंतिम अधिसूचित संस्करण में, यूजीसी ने ओबीसी को “जाति-आधारित भेदभाव” के दायरे में शामिल किया है और झूठी शिकायतों से संबंधित प्रावधान को हटा दिया है। इसके अलावा, “भेदभाव” की परिभाषा को थोड़ा विस्तारित किया गया है ताकि इसमें 2012 के विनियमों में निहित कुछ भाषा को शामिल किया जा सके।
विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव के चलते आत्महत्या
रोहित वेमुला
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के शोधार्थी रोहित वेमुला ने विश्वविदयालय प्रशासन के जातीय भेदभाव के चलते 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने आत्महत्या से पहले लिखे पत्र में संस्थागत भेदभाव, अपमान और अलगाव की बात लिखी थी।
यह मामला देशभर में संस्थागत जातिवाद पर बहस का केंद्र बना। इसके बाद विश्वविद्यालयों में दलित छात्रों की स्थिति पर व्यापक चर्चा हुई।

यूनिवर्सिटी से हाथ में सामान लेते हुए और एक हाथ में डॉ भीमराव आंबेडकर की तस्वीर लिए रोहित वेमुला (फोटो साभार : सोशल मीडिया X अकाउंट The Dalit Voice)
आप नीचे दिए गए आर्टिकल में रोहित वेमुला की आत्महत्या मामले में जानकारी ले सकते हैं।
मुथुकृष्णनन जीवानंदम
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक दलित शोधार्थी मुथुकृष्णनन जीवानंदम ने 13 मार्च 2017 को कथित रूप से आत्महत्या कर ली। मौत से पहले उसने अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखकर यूनिवर्सिटी प्रशासन पर भेदभाव के आरोप लगाए।
मौत से कुछ दिन पहले यानि 10 मार्च 2017 को कृष ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखा था- ‘अगर समानता नहीं है तो कुछ भी नहीं है। एमफिल और पीएचडी एडमिशन में कोई बराबरी नहीं है। वायवा में बराबरी नहीं है, केवल समानता का ढोंग होता है। प्रशासनिक भवन में छात्रों को प्रदर्शन नहीं करने दिया जाता है। हाशिए के लोगों के लिए शिक्षा की बराबरी नहीं है।’
पायल तड़वी (Dr Payal Tadvi’s suicide)
पायल ताडवी ने 22 मई, 2019 को मुंबई सेंट्रल स्थित बीवाईएल नायर अस्पताल के अपने छात्रावास के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। वे पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्रा थीं। आरोप लगा कि सीनियर छात्रों द्वारा जातिगत अपमान और मानसिक उत्पीड़न किया गया।
ऐसे कई नाम हैं जिन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा और उनके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं मिला। ये घटनाएँ दिखाती हैं कि जाति आधारित भेदभाव केवल सामाजिक नहीं, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों की भी गंभीर समस्या है। जाति के आधार पर छात्रों के साथ आज भी जातिगत भेदभाव आम बात है बस भेदभाव करने का तरीका अलग है। भले कुछ लोग इस बात से साफ़ इंकार कर देते हैं कि अब जातिगत भेदभाव नहीं होता और शहरों में तो बिल्कुल नहीं होता, उन लोगों को यूजीसी की रिपोर्ट में बढ़ती संख्या को देखने की जरूरत है। जिन्होंने जाति की वजह से शुरू से ही संघर्ष किया अब उनके बच्चों को बड़े बड़े नामी कॉलेज और यूनिवर्सिटी में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यदि वे इसके खिलाफ आवाज उठाये या फिर शिकायत करने की कोशिश करे तो उन्हें डराया धमकाया जाता है कि उन्हें इसके लिए कॉलेज या यूनिवर्सिटी से बाहर किया जा सकता है। इस डर के चलते बहुत से छात्र-छात्राएं इन जातिगत भेदभाव को अब तक सहते आ रहे हैं और सह भी रहे हैं।
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