खबर लहरिया Blog BIhar, Patna News : सरकारी ट्यूबबेल खराब होने से 150 किसानों की खेती पर असर

BIhar, Patna News : सरकारी ट्यूबबेल खराब होने से 150 किसानों की खेती पर असर

पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड के दहिभत्ता गांव में लगी सरकारी ट्यूबवेल के लंबे समय से खराब रहने के कारण किसानों की सिंचाई व्यवस्था ठप पड़ी हुई है। कई किसान समय पर अपने खेतों में सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं जिसके चलते उनकी फसलें नुकसान की कगार पर हैं।

सरकारी ट्यूबवेल की तस्वीर (फोटो साभार : सुमन दिवाकर)

रिपोर्ट – सुमन दिवाकर , लेखन – सुचित्रा

ग्रामीण इलाकों में अभी चारों तरफ खेती–किसानी का समय चल रहा है। रास्ते से गुजरिए तो कहीं किसान खेत जोतते दिखते हैं, कहीं बुआई करते हुए। कोई खेत में पानी के लिए पाइप बिछा रहा है, तो कोई क्यारी में ‘पड़वा’ चलाकर पानी की दिशा ठीक कर रहा है। कुल मिलाकर, हर किसान अपने खेत और फसल को लेकर चिंतित और लगातार मेहनत करते नज़र आते हैं।

खेती का सबसे अहम हिस्सा है – पानी। फसल को सही समय पर पानी न मिले तो पूरी मेहनत बेकार हो सकती है। प्रकृति पर निर्भर खेती में पानी का समय पर उपलब्ध होना जरूरी है, वरना खेती संभव नहीं होती। यही कारण है कि पानी की सुविधा किसानों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बन जाती है। सरकारी ट्यूबवेल की खराबी ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

नकदी बटाई करने वाले किसान को पानी की गंभीर समस्या

पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड के बिलंदचक गांव के किसान राजनंदन सिन्हा इन दिनों अपने खेतों में जुटे हुए हैं। उनके पास कुछ स्वयं की खेती है और कुछ जमीन वे नकदी बटाई पर लेकर खेती करते हैं। लेकिन इन दिनों पानी की समस्या उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

राजनंदन सिन्हा बताते हैं कि उनके गांव के पास ही एक सरकारी ट्यूबवेल कई साल पहले लगाया गया था, साल का पता नहीं, लेकिन यह काफी पुराना है। पहले उसी ट्यूबवेल से किसानों को पर्याप्त पानी मिल जाता था। उस समय एक कट्ठा सिंचाई के लिए मात्र 5 रुपए देने पड़ते थे और जब भी जरूरत होती, आसानी से पानी उपलब्ध हो जाता था। पानी की गुणवत्ता भी अच्छी थी, जिससे फसलें बढ़िया होती थीं।

वे कहते हैं “अब हमें पानी ₹30 प्रति कट्ठा के हिसाब से मिलता है। पहले के मुकाबले यह महंगा है, लेकिन मजबूरी है। हम पूरे 12 महीने खेती करते हैं – सब्जी भी लगाते हैं और बीच-बीच में मक्का भी बोते हैं। फसल चाहे भुट्टा हो, मूली हो या कोई और सब्जी सभी में पानी की सबसे ज़्यादा जरूरत होती है। सरकारी ट्यूबवेल चालू नहीं है, वरना हमें बड़ी राहत मिल जाती।”

वे कहते हैं कि सरकार का ट्यूबवेल चालू होता तो लागत कम होती और पानी समय पर मिलता, जिससे खेती और बेहतर हो सकती थी।

बिना पानी के खेती का नुकसान

पिंटू करीब तीन बीघा जमीन पर खेती कर रहे हैं। अलग-अलग टुकड़ों में उन्होंने अलग-अलग फसलें लगा रखी हैं जैसे कहीं मूली, कहीं लाल साग, कहीं पालक, सरसों और कुछ जगह पर मक्का। सब्जी आधारित खेती होने के कारण सिंचाई उनके लिए सबसे बड़ी जरूरत है।

सालों से बंद पड़ी सरकारी ट्यूबवेल (फोटो साभार : सुमन दिवाकर )

सरकारी ट्यूबवेल एक समय में सहारा थी, अब बेकाम की

पिंटू ने बताया कि एक समय था जब इसी सरकारी ट्यूबवेल से खेती में सिंचाई का काम करते थे लेकिन अब ट्यूबवेल कई सालों से खराब पड़ा है। उन्होंने बताया शायद 3 से 5 साल हो चुके हैं – उन्होंने उसे चलते कभी नहीं देखा। गांव के कई लोग तो भूल भी गए हैं कि यह ट्यूबवेल कभी चालू भी था।

निजी बोरिंग की कीमत ज्यादा

अब निजी बोरिंग पर निर्भरता के कारण लागत बढ़ गई है। तीन बीघा में पानी देने के लिए उन्हें हर बार करीब 300 रुपए देने पड़ते हैं। अगर 3 महीने में 4–5 बार सिंचाई करनी पड़े तो केवल पानी पर 1200 -1500 खर्च हो जाता है जबकि पहले सरकारी ट्यूबवेल होने पर यह खर्च बहुत कम था।
वे बताते हैं “हमारे गांव निशियामा में खेती तो है, लेकिन पानी की सबसे बड़ी समस्या है। सरकारी ट्यूबवेल दे-भट्टा साइड में है, पर कभी चलता ही नहीं। पिताजी बताते हैं कि पहले चलता था, तब सबको पानी मिलता था, लेकिन मैंने कभी उसे चलते नहीं देखा।”

किसान करी कहते हैं “सरकार की मशीनें एक बार खराब हों तो उन्हें ठीक कराने वाला कोई नहीं। किसान मजबूरी में निजी बोरिंग वालों पर निर्भर हो गए हैं।”

“कई बार कर चुके शिकायत, फिर भी नहीं हुई सुनवाई” – उमेश कुमार

दहिभत्ता गांव के निवासी उमेश कुमार पढ़े-लिखे, समझदार किसान और समाजसेवी हैं। वे बताते हैं कि गांव का यह ट्यूबवेल कभी लगभग 150 किसानों की सिंचाई जरूरत पूरी करता था। इसका पानी दहिभत्ता, बुलंदी चौक, निश्यामा और शर्मा सहित 3-4 गांवों में जाता था जिससे फसलों की पैदावार भी अच्छी होती थी। लेकिन अब यह ट्यूबवेल लगभग पिछले 5 साल से बंद पड़ा है। उमेश बताते हैं कि ट्यूबवेल की बिल्डिंग पूरी तरह जर्जर हो चुकी है, दीवारों पर गोबर के उबले चिपके हैं और रात में वहां नशेड़ियों का अड्डा बन जाता है। ऑपरेटर भी कभी मौजूद नहीं रहता।

ट्यूबवेल के लिए बनाया गया कमरा (फोटो साभार : सुमन दिवाकर)

उमेश ने कई बार इस समस्या की शिकायत की। वे मुखिया के पास गए, विभाग से बात की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। उन्होंने बताया “मैंने इसकी शिकायत कई बार की है मुखिया से जाकर के हमने बात की है। मुखिया ने बताया कि इसकी शिकायत मसौढ़ी में नहीं होती क्योंकि यह ट्यूबवेल जिला स्तर का है। यह पटना जिला में आता है तो आप यहां पर शिकायत भी नहीं कर सकते और रही बात सिंचाई विभाग की तो बासुरी में कोई सिंचाई विभाग ही नहीं है जिसमें हम इसकी शिकायत भी करें। मुखिया ने कहा कि ट्यूबवेल में कुछ खराबी है, शायद इसका जो पाइप है वह फट गया है उसको बनवाना चाहिए सरकार को वह बन जाएगा तो चालू हो जाएगा तो सबके लिए अच्छी बात है पर वह होता नहीं है मुखिया जी कहे हैं कि हां ठीक है करवा देंगे करवा दहीभता करवा।

“मामला जिला स्तर का है, इसलिए प्रक्रिया धीमी चल रही है।”- मुखिया चंदन भारती

मुखिया चंदन भारती से बात करने पर उन्होंने कॉल पर बताया कि उनको ट्यूबेल का नम्बर तो सही से नही पता पर वह समस्या से वह अवगत है। इस समस्या को लेकर वह जिला स्तर पर मीटिंग में गए थे और उन्होंने लिखित रुप से अगस्त में दिया है और बोला था कि हो जाएगा पर अभी नही हुआ । देखिए कब तक होगा क्योंकि जिला स्तर की बातें हैं और फिर अभी चुनाव भी हो गया और फिर से चुनाव आने वाला है क्या कह सकते हैं पर मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूं कि बन जाए यही कारण है कि वहां पर ट्यूबवेल ऑपरेटर नहीं बैठता है।

सरकार वैसे तो ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे लगाती है लेकिन अब लगता है सरकार इस नारे को भूल चुकी है। तभी तो जो किसान दूसरों को पेट भरने के लिए खेती करते हैं वहां तक पानी पहुंचाने में भी सरकार विफल रही है। नाम के लिए सरकार ने किसानों के लिए सरकारी ट्यूबेल की सुविधा दे रखी है पर क्या वास्तव में यह किसानों के काम आ ही है? किसानों की इस समस्या को आखिर क्यों नज़रअंदाज किया जाता है?

इस बारे में जे ई सुशील ने कॉल पर बताया कि सरकारी ट्यूबवेल जल्द ही ठीक हो जाएगा। अभी फ़िलहाल जो दूसरे खराब थे उनको ठीक करवाया है। इस तरह का जवाब गैर जिम्मेदारी को दिखाता है। हर बार की तरह प्रशासन से जवाब समस्या का कोई हल नहीं देता बल्कि एक और इंतजार दे जाता है।

 

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