बिहार में “भूंजा” नाम सुनकर आपको थोड़ा अलग जरूर लग सकता है, लेकिन यह कोई नई या अलग चीज़ नहीं है। भूंजा एक बहुत पुराना नाम है जो है एक तरह से नमकीन के तौर पर खाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्र में पहले समय में जब लोग मजदूरी करने या फिर किसानी करने अपने घर से दूर जाते थे तो साथ में भूंजा रख दिया जाता था ताकि भूख लगने पर खाया जा सके। जब भी भूंजा की बात होती है, तो बिहार की याद अपने आप आ जाती है। भूंजा के साथ लोगों की कई कहानियां जुड़ी है।
रिपोर्ट – सुमन, लेखन – सुचित्रा
पहले के समय में लोग भूंजा बनवाने के लिए भांजे या रिश्तेदारों के घर जाया करते थे। वहां चना और अन्य अनाजों को भूनकर सब लोगों में बांटा जाता था। जो भी अनाज घर में होता, उसे भूनकर वहीं बैठकर खाने की परंपरा थी।
अब हर दुकान पर मिलता है भूंजा
समय के साथ चीज़ें बदलीं और विकास भी हुआ। भूंजा खाने के शौकीनों के लिए यह सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। लोगों को किसी के आने का इंतजार नहीं करना पड़ता अब तो बिहार में कई जगह भूंजा की दुकानें मिल जाती हैं। इन दुकानों पर अलग-अलग खाने योग्य मोटा अनाज रखा रहता है, जिसे लोग अपनी पसंद से मिक्स करवाते हैं। इसी मिश्रण से तैयार होता है भूंजा।
हालांकि, पहले जैसी पारंपरिक व्यवस्था अब नहीं रही। जैसे कि इस दुकान में आप देख सकते हैं कि गर्मियों के मौसम में लोग चने का भूंजा की मांग करते हैं और ऐसे यह भूंजा 12 महीने लोगों की पसंद बना रहता है। बिहार के भुंजे की खास बात यह है कि भूंजा कई तरह के अलग-अलग अनाज से मिलाकर भूंजा तैयार किया जाता है और लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं।
भूंजा की दुकान लगाकर चलाती है घर-परिवार
नीचे दी गई तस्वीर में महिला सुनीता हैं, जो मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की रहने वाली हैं। उनके पति के निधन के बाद, दुकान की पूरी जिम्मेदारी अब उन्हीं के कंधों पर है। अपनी मेहनत और हौसले के बल पर वे रोज़ाना यह दुकान चलाती हैं।
सुनीता बताती हैं कि उनकी दुकान सुबह से खुल जाती है और शाम तक चलती है। गर्मियों के मौसम में दुकान की बिक्री ज्यादा होती है, खासकर सत्तू की वजह से। हालांकि, अगर भूंजा की बात करें, तो लोग इसे साल के बारहों महीने खाना पसंद करते हैं।
सुनीता आगे बताती हैं कि भूंजा एक दिन में तैयार नहीं होता। फिलहाल वे मकई से भूंजा तैयार कर रही हैं। इसकी प्रक्रिया पहले दिन से शुरू होती है। पहले मकई को पानी में भिगोया जाता है, जैसा कि फोटो में दिखाई दे रहा है। इसके बाद, दूसरे दिन उसे जमीन पर फैलाकर सुखाया जाता है।
जब मकई अच्छी तरह सूख जाती है, तो उसे गर्म कढ़ाही में डाला जाता है, जिसमें बालू (रेत) रहती है। बालू की गर्मी से मकई अच्छे से पक जाती है। इसके बाद मकई को छानी से छानकर अलग किया जाता है और फिर पैक करके रख लिया जाता है।
सुनीता बताती हैं कि इस तरह से भूंजा तैयार हो जाता है। इसे लोग नमक, प्याज और मिर्च के साथ खाते हैं। हर व्यक्ति का इसे खाने का अपना-अपना तरीका और स्वाद होता है।
ठेले पर भी बिक रहा भूंजा
नीचे दिए गए फोटो में एक ठेला दिखाई दे रहा है, जिस पर आगे की ओर चना, मकई और अन्य सामग्री सलीके से सजाकर रखी गई है। ठेले के एक तरफ छोटा सा चूल्हा बना हुआ है, जिस पर कढ़ाही रखी रहती है। पास में छन्नी, चटनी और अन्य जरूरी सामान भी मौजूद है। ठेले का संचालक खुद वहीं खड़ा होकर ग्राहकों को भुंजा तैयार करके देता है। इस ठेले को आमतौर पर “भुंजा ठेला” कहा जाता है।
यह ठेला बिहार के पटना जिले के मसौढ़ी स्टेशन के पास रोज़ाना लगाया जाता है। यह फोटो केवल एक उदाहरण है। यदि आप कभी बिहार आएँ, तो स्टेशन से बाहर निकलते ही, बाज़ारों में, बस स्टैंड पर या किसी भी चौक-चौराहे पर आपको ऐसे कई भुंजा ठेले आसानी से देखने को मिल जाएंगे।
शाम के समय ये ठेले आवाज़ लगाते हुए गलियों और सड़कों पर घूमते नजर आते हैं, जिससे लोगों को पता चल जाता है कि आसपास भुंजा की दुकान मौजूद है। लोग अपने खाली समय में, समय बिताने के लिए या दोस्तों के साथ हल्का-फुल्का नाश्ता करने के लिए इन ठेलों पर रुकते हैं और अपनी जरूरत के अनुसार भुंजा लेकर खाते हैं।
भूंजा के कई प्रकार
दुकानदार बताते हैं कि भूंजा कई तरह से तैयार किया जाता है। जैसा कि पहले एक महिला दुकानदार ने भी बताया था, भूंजा पांच प्रकार या सात प्रकार की चीज़ों को मिलाकर बनाया जाता है। आमतौर पर चावल, पोहा (जिसे चुरा भी कहा जाता है), चना, मकई और मूंगफली के दाने—इन पांच चीज़ों को मिलाकर जो मिश्रण तैयार होता है, वही भूंजा कहलाता है।
कई लोग सिर्फ मूंगफली और चने का भूंजा बनवाने के लिए कहते हैं, लेकिन दुकानदार उसमें चुरा ज़रूर डालते हैं, क्योंकि यह स्वाद और संतुलन के लिए जरूरी माना जाता है। इसे चटनी के साथ खाया जाए तो इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है।
कुछ ग्राहक ज्यादा चीज़ें मिलवाना पसंद करते हैं और तरह-तरह के मोटे अनाज डलवाकर भूंजा खाते हैं। ऐसे कई तरह के मिश्रण बड़ी दुकानों पर आसानी से मिल जाते हैं, जबकि छोटी दुकानों पर आमतौर पर ये पांच चीज़ें ही उपलब्ध रहती हैं। इसके अलावा, कुछ जगहों पर चावल का धान भी इसमें मिलाया जाता है, जिससे भूंजे का स्वाद और बेहतर हो जाता है।
भूंजा के साथ बिहार के लोगों की यादें
भूंजा से बिहार के रहने वालों की यादें जुड़ी हुई है। बिहार से बाहर जो लोग कमाने के लिए गए हैं और कई लोग शहर में रहने लगे हैं, लेकिन उन्हें आज भी बिहार से आने वाले रिश्तेदारों का इंतजार रहता है। यदि कोई बिहार से आना वाला होता है तो उनकी ऑंखें उम्मीद से भर जाती है और वह उनसे कहते आ रहे हैं तो भूंजा भी लेते आइयेगा न। वहीं जब भी कोई शहर कमाने या पढ़ने जाता है तो माँ, नानी, दादी भूंजा साथ रख देती है।
भले भूंजा दुकानों और ठेले पर नज़र आता हो लेकिन जो स्वाद गांव में अपने घर का आता है वो शायद ही किसी दुकान या ठेले पर मिले।
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