पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं वैसे-वैसे बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है लेकिन अब यह बहस सिर्फ सीमा सुरक्षा या अवैध प्रवास तक सीमित नहीं रह गई है। यह एक ऐसा नैरेटिव बनता जा रहा है जिसके तहत आम नागरिकों की नागरिकता पर शक किया जा रहा है पुलिस और प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है और हिंसा को भी ठहराने की कोशिशें दिख रही हैं। 12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले भारत के अलग-अलग हिस्सों में सामने आ रही घटनाएं इसी बदलते माहौल की ओर इशारा करती हैं।
मंगलुरु में झारखंड के एक प्रवासी मजदूर पर बांग्लादेशी होने के शक में हमला करने के मामले में पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है। यह घटना 11 जनवरी 2025 को शहर के बाहरी इलाके कुलूर में हुई। पुलिस आयुक्त सुधीर कुमार रेड्डी ने प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार बताया है कि दिलजान अंसारी पिछले 10–15 वर्षों से मजदूरी के लिए मंगलुरु आता रहा है और हर साल चार से छह महीने यहां काम करता है। आरोपियों ने उसे घेरकर उसकी नागरिकता पर सवाल उठाए और पहचान पत्र दिखाने को कहा। अंसारी के बार-बार खुद को भारतीय नागरिक बताने के बावजूद उसे परेशान किया गया और आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं जिसके बाद उसके सिर पर वार कर उस पर हमला किया गया।
घटना के दौरान एक स्थानीय महिला ने बीच-बचाव कर अंसारी को आरोपियों से छुड़ाया। डर के कारण अंसारी ने तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई और घर लौट गया। बाद में स्थानीय नेताओं द्वारा मामला उठाए जाने पर पुलिस ने जांच शुरू की। जांच में यह पुष्टि हुई कि दिलजान अंसारी भारतीय नागरिक है और रोजगार के लिए मंगलुरु आया था। इसके बाद कुलूर निवासी सागर, धनुष, लालू उर्फ रतीश और मोहन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस आयुक्त ने आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी के निर्देश दिए हैं और मामले की आगे जांच जारी है।
जांच पूरी होने के बाद अधिकारियों ने साफ किया कि दिलजान अंसारी भारतीय नागरिक है और काम की तलाश में मंगलुरु आया था। इस मामले में कुलूर इलाके के रहने वाले सागर, धनुष, लालू उर्फ रतीश और मोहन को आरोपी बनाया गया है। इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2), 109, 352, 351(3), 353, 118(1) और 3(5) के तहत केस दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
देहरादून मामला
देहरादून के पटेल नगर इलाके से पुलिस ने एक महिला को गिरफ्तार किया है जो कथित तौर पर अवैध रूप से भारत में रह रही थी। DECCAN HERALD के खबर अनुसार वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय सिंह के मुताबिक़ गिरफ्तार महिला की पहचान 40 वर्षीय सुबेदा बेगम के रूप में हुई है। पुलिस को एक मुखबिर से सूचना मिली थी कि लोक संस्कृति कॉलोनी में रहने वाली एक महिला संदिग्ध रूप से रह रही है, जिसके बाद कार्रवाई की गई।
पुलिस पूछताछ में महिला ने स्वीकार किया कि वह बांग्लादेश की नागरिक है और कोविड महामारी के दौरान अवैध रूप से पश्चिम बंगाल के रास्ते भारत में दाखिल हुई थी। उसने सुबेदा बीबी, मोनी और प्रिया रॉय जैसे फर्जी नामों से अपनी पहचान छिपा रखी थी। तलाशी के दौरान पुलिस ने उसके पास से अलग-अलग नामों से बने फर्जी जन्म प्रमाण पत्र, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य दस्तावेज बरामद किए।
पुलिस ने बताया है कि महिला ने चार साल पहले पश्चिम बंगाल में कौसर शाह नाम के व्यक्ति से शादी की थी और करीब दो साल पहले वह अपने पति के साथ देहरादून आकर रहने लगी थी। इस दौरान उसने हरिद्वार के रुड़की और देहरादून से फर्जी भारतीय दस्तावेज बनवाए। उसका पति फिलहाल दुबई में काम करता है। सुबेदा बेगम के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, पासपोर्ट अधिनियम और विदेशी अधिनियम की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।
एसएसपी अजय सिंह ने बताया कि इससे पहले भी देहरादून जिले में 19 बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है जिनमें से नौ को फर्जी दस्तावेजों के जरिए अवैध रूप से भारत में रहने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था जबकि 10 लोगों को उनके देश वापस भेज दिया गया है।
मशीन करती है बांग्लादेशियों की पहचान
23 दिसंबर 2025 को गाजियाबाद के कौशांबी इलाके में रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) और पुलिस की एक टीम झुग्गी बस्ती में पहुंची। वहां मौजूद लोगों से सवाल किए गए कि क्या वे बांग्लादेशी हैं और एक कथित मशीन को पीठ पर रखकर जांच की गई। जवानों ने दावा किया कि मशीन किसी व्यक्ति को बांग्लादेशी बता रही है। यह कार्रवाई अवैध बांग्लादेशी नागरिकों, रोहिंग्या शरणार्थियों और बिना दस्तावेज़ के रह रहे लोगों की पहचान के लिए चलाए जा रहे अभियानों जैसे ‘ऑपरेशन टॉर्च’ और ‘ऑपरेशन इंट्रूडर’ का हिस्सा बताई गई।
हालांकि इन अभियानों का असर कई जगह भारतीय नागरिकों पर भी पड़ा है। दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में असम के मुसलमानों और बंगाली भाषा बोलने वाले लोगों को संदेह की नजर से देखा जा रहा है और उन्हें बांग्लादेशी बताकर परेशान किया जा रहा है। 23 दिसंबर की घटना का वीडियो सामने आने के बाद द क्विंट द्वारा कौशांबी और बोहापुर इलाकों का दौरा किया जहां यह तलाशी अभियान चला था।
रिपोर्टिंग के दौरान टीम की मुलाकात रोशनी खातून से हुई जो वीडियो में भी नजर आ रही थीं। रोशनी ने बताया है कि वह बिहार के अररिया जिले की रहने वाली हैं और पिछले 14 – 15 वर्षों से इसी इलाके में रह रही हैं। उनके अनुसार पुलिस ने उनके परिवार से पहचान पत्र मांगे और मजाक उड़ाते हुए उन्हें बांग्लादेशी कहा जिससे पूरे इलाके में डर का माहौल बन गया। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस ने खुद वीडियो बनाया और उसे फैलाया जबकि उन्हें यह तक नहीं पता था कि उनके साथ क्या किया जा रहा है।
इन अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर देखें तो दिखता है कि बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा अब सिर्फ अवैध प्रवासियों की पहचान तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा नैरेटिव बनता जा रहा है जिसके तहत गरीब, प्रवासी मजदूर, बंगाली भाषी लोग और अल्पसंख्यक समुदाय सबसे ज़्यादा शक के दायरे में आ रहे हैं। राज्य मशीनरी की कमजोरियों और वर्षों से चले आ रहे दस्तावेज़ी अव्यवस्थाओं का बोझ आम लोगों पर डाला जा रहा है।
12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले भारत में इस मुद्दे का उभार यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ‘घुसपैठ’ की बहस सुरक्षा की चिंता है या फिर यह नागरिकता, पहचान और डर की राजनीति का एक नया औज़ार बनती जा रही है।
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