अतरहट में होलिका दहन का रिवाज ऐसा है जिसमें होलिका केवल पुरुष ही जला सकते हैं; महिलाओं को इसमें भाग लेने की अनुमति नहीं है। वे चाहें तो दूर से चोरी-छिपे देख लें, या बिल्कुल न देखें — लेकिन आग के उस दायरे में उनका होना वर्जित है। सवाल उठता है कि आखिर उन्हें दूर क्यों रखा गया है? विडंबना यह है कि जिस होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक कहा जाता है, उसी दौरान महिलाओं के लिए आपत्तिजनक शब्दों, अश्लील गीतों और दुर्व्यवहार का खुलेआम प्रदर्शन होता है। अब तो महिलाओं के पुतले बनाकर सार्वजनिक चौराहों पर जलाए जाने लगे हैं, मानो प्रतीकात्मक रूप से स्त्री को ही अग्नि के हवाले किया जा रहा हो। यह किसी छिपे कोने में नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन की मौजूदगी में होता है, जहां सब तमाशबीन बने रहते हैं। हैरानी यह भी है कि कई महिलाएं, जिनका इस कथित “जागरूकता” से कोई लेना-देना नहीं, वे भी चुप्पी ओढ़े इस परंपरा को स्वीकार करती दिखती हैं। सवाल आस्था पर नहीं, उस मानसिकता पर है जो त्योहार को भी भेदभाव और अपमान का मंच बना देती है। आखिर कब तक परंपरा के नाम पर यह चलता रहेगा, और कब तक समाज चुपचाप देखता रहेगा?
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