‘प्राइवेट पार्ट छूना-पजामे का नाड़ा खींचना रेप का प्रयास नहीं’, इस तरह की टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने 20 मार्च 2025 को एक मामले में सुनवाई के दौरान की थी। इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इस फैसले को ख़ारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस केस में धारा 376 यानी रेप और POCSO एक्ट की धारा 18 (यानी रेप की कोशिश) के तहत ही सुनवाई होगी। यह फैसला कल सोमवार 8 दिसंबर को चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनाया।
देश में आज भी रेप के मामले बढ़ रहे हैं। इन मामलों में कोई बदलाव नज़र नहीं आता है और रेप के आरोपियों को सजा मिलने में भी कई साल गुजर जाते हैं। कोर्ट द्वारा कहीं न कहीं इस तरह की टिप्पणियां भी जिम्मेदार है जो आरोपी के अपराध करने के हौसलें को और मजबूत कर देती है। इस तरह की टिप्पणी के लिए किसी न किसी को इस पर जवाब देना चाहिए था जोकि सुप्रीम कोर्ट ने दिया है।
क्या था पूरा मामला
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह घटना 2021 की है। जब कथित तौर पर दो आरोपियों ने एक नाबालिग लड़की को लिफ्ट देने के बहाने बलात्कार करने की कोशिश की थी लेकिन लोगों ने उसे बचा लिया था। मौके से आरोपी भागने पर मजबूर हो गए। नाबलिग के परिवार ने पुलिस में शिकायत की थी। इस मामले के बारे में पूरा जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।
Allahabad High Court: “लड़की के स्तनों को दबाना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना” बलात्कार नहीं
आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 (बलात्कार) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम की धारा 18 के तहत कासगंज अदालत (निचली अदालत) में मुकदमा दर्ज था। इसके लिए आरोपियों को समन भेजा (अदालत की तरफ से बुलावा) गया था। आरोपियों ने समन को चुनौती देने के लिए इलाहबाद हाई कोर्ट का रुख किया था। इस सम्बन्ध में इलाहबाद कोर्ट ने 17 मार्च 2025 को फैसला सुनाया।
“लड़की के स्तनों को दबाना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना रेप नहीं” – इलाहबाद हाई कोर्ट
इस मामले पर इलाहबाद कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा था कि “लड़की के स्तनों को दबाना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना, उसको पुलिया के नीचे खींचना। ये सभी क्रियाएं बलात्कार करने की कोशिश के लिए काफी नहीं है।” हालांकि, न्यायालय ने इन आरोपों को गंभीर यौन हमला करार दिया।
न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ लगाए गए आरोप यह साबित नहीं करते कि बलात्कार करने की कोशिश की गई है। उन्होंने आगे कहा कि बलात्कार करने की कोशिश और वास्तव में बलात्कार करने के बीच अंतर होता है।
“लड़की के स्तनों को दबाना, उसके पाजामे का नाड़ा तोड़ना रेप नहीं” पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
लल्लन टॉप की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में कल मंगलवार 8 दिसंबर 2025 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। उन्होंने कहा कि यौन अपराधों में खासकर जब इनमें विक्टिम बच्चे हो तो कोर्ट को किस तरह की टिप्पणी करनी है? और अपने फैसले को कैसे फ्रेम करना है? इसके लिए गाइडलाइंस बनाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि ये कोई सिर्फ एक केस नहीं था जब कोर्ट की तरफ से ऐसी टिप्पणी की गई हो। इससे पहले इलाहाबाद, कलकत्ता और राजस्थान हाईकोर्ट से भी ऐसे बयान आ चुके हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक केस में लड़की से ये तक कह दिया था कि अगर आप नशे में किसी के घर जाती हैं तो आप खुद ही मुसीबत को न्योता दे रही हैं। यानी नशे की हालत में यदि किसी लड़की के साथ यौन हिंसा या बलात्कार होता है तो इसकी जिम्मेदार वो खुद है।
नई गाइडलाइंस बनाने पर विचार
जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इस तरह के मामलों की सुनवाई के लिए नए गाइडलाइंस बनाएगा।
जब एक कोर्ट की तरफ से इस तरह के आदेश और फैसले सामने आते हैं तो लगता है कि आरोपियों को बचाया जा रहा है। क्या किसी महिला या नाबलिग के साथ इस तरह की बदसलूकी करना जिसमें उसके शरीर के अंगों को जबरन दबाना या कपड़े खोलना एक बलात्कार करने के इरादे को नहीं दर्शाता? क्या हम आरोपी का बलात्कार होने तक का इंतजार करें तब जाकर उस बलात्कार करने के प्रयास और बलात्कार की धाराएं लगाई जाएँगी? इस तरह की जवाबदेही एक तरह आरोपियों का समर्थन करती है और साथ ही उसका बचाव भी करती है जोकि सही नहीं है।
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