दिल्ली में हो रहा ए-आई इम्पैक्ट सम्मिट भारत के लिए एक अहम मौका है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “सबके लिए AI” की दिशा में बताया, लेकिन ज़मीनी तस्वीर इससे अलग दिखती है। सैकड़ों सेशनों में ज़्यादातर हिस्सेदारी सरकार, बड़ी कंपनियों और विदेशी संस्थाओं की रही, जबकि गांवों, महिलाओं, मज़दूरों और हाशिये के समुदायों की आवाज़ें लगभग गायब रहीं। आयोजन की महंगाई और अव्यवस्था ने आम लोगों की पहुंच और सीमित कर दी। सवाल यह है कि क्या ग्रामीण आवाज़ों के बिना AI का विकास संभव है? और क्या इस सम्मिट का असर ज़मीनी स्तर पर दिखाई देगा, या यह सिर्फ़ बड़े दावों तक ही सीमित रह जाएगा?
लेखन – एलिया
दिल्ली में इस हफ्ते चल रहे ए-आई इम्पैक्ट सम्मिट पर दुनिया की नज़र है। कई देशों के नेता, AI कंपनियों के CEO और नीति-निर्माता इसमें शामिल हुए। यह सम्मिट 2023 से हर साल अलग-अलग देशों में होता रहा है, लेकिन पहली बार इसे किसी “ग्लोबल साउथ” देश में आयोजित किया गया। इस सम्मिट से सब की उम्मीद थी कि यहां वे आवाज़ें भी जगह बना पाएंगी जो पश्चिमी मंचों पर अक्सर छूट जाती हैं।
Bringing the world together to discuss AI!
Starting today, India hosts the AI Impact Summit at Bharat Mandapam in Delhi. I warmly welcome world leaders, captains of industry, innovators, policymakers, researchers and tech enthusiasts from across the world for this Summit. The…
— Narendra Modi (@narendramodi) February 16, 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने X अकाउंट पर सम्मिट की थीम “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” बताई है, जिसका अर्थ है सभी के कल्याण और सभी के सुख के लिए।
अगर देखा जाए कि इस सम्मिट में किस की आवाज़ें सुनी गईं, तो तस्वीर कुछ और दिखती है। भारत में हो रहे इस ए-आई इम्पैक्ट सम्मिट में कुल 793 सार्वजनिक सेशन आयोजित किए गए। इनमें से ज़्यादातर सेशन सरकार और विदेशी कंपनियों से जुड़े लोगों के हाथ में रहे। टेक पॉलिसी प्रेस में छपे आंकड़ों के मुताबिक, करीब 40 प्रतिशत सेशन केंद्र सरकार की संस्थाओं और राज्यों के आईटी विभागों ने आयोजित किए। वहीं लगभग 35 प्रतिशत सेशन बड़ी कंपनियों, AI स्टार्टअप्स और उद्योग संगठनों के हिस्से में आए।
जिस देश की करीब 65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, वहां AI के विकास में सबसे ज़रूरी होता है कि गांवों, छोटे शहरों, महिलाओं, मज़दूरों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की आवाज़ें भी सुनी जाएं।
किसके लिए खुला था सम्मिट?
View this post on Instagram
सोशल मीडिया पर प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ने सम्मिट की तारीफ़ करते हुए लिखा कि इसमें 20 से ज़्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष, 60 मंत्री और 500 से अधिक अंतरराष्ट्रीय एआई विशेषज्ञ शामिल हुए। लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है कि इस सम्मिट में “सबका साथ और सबका विकास” सुनिश्चित करने के लिए आखिर क्या ठोस कदम उठाए गए। जिनकी आवाज़ें अक्सर दब जाती हैं, उनकी मौजूदगी और हिस्सेदारी का कोई स्पष्ट आँकड़ा सामने क्यों नहीं है?
सम्मिट में शामिल होने गईं प्रिया थुवाश्री कहती हैं कि, “ए-आई इम्पैक्ट सम्मिट में एक दिन जाना ही काफ़ी था। यह सम्मेलन कम और मेला ज़्यादा लगा। लंबी कतारें थीं, सेशन की जानकारी साफ़ नहीं थी, और भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि एक पूरा विंग बंद करना पड़ा।
लेकिन असली चिंता इससे कहीं बड़ी है। AI, इंटरनेट के बाद सबसे बड़ा बदलाव है और बहुत तेज़ी से फैल रहा है। अगर इसे शुरुआत से ही लैंगिक, जाति और ग्रामीण नज़रिए से नहीं गढ़ा गया, तो असमानताएं और गहरी होंगी।
ग्रामीण और हाशिये के समुदायों, खासकर महिलाओं के लिए AI कौशल अब विकल्प नहीं, ज़रूरत है। आज बहुत से लोग AI का इस्तेमाल जाने-अनजाने कर रहे हैं—कभी उपभोक्ता के रूप में, तो कभी गलत जानकारी और डीपफेक जैसे खतरों के शिकार बनकर।
टेक्नोलॉजी तभी सब के लिए बनेगी जब महिलाएं सिर्फ उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि भागीदार और फैसले लेने वाली हों। यहां बात दिखावे की नहीं, ताक़त के बंटवारे की है। वरना AI का भविष्य कुछ लोगों तक ही सीमित रह जाएगा।”, प्रिया इस समय चंबल मीडिया की को-सीईओ हैं।
दिल्ली में आयोजित इस सम्मिट के दौरान होटलों के कमरों का किराया बढ़कर 6,000 डॉलर प्रति रात तक पहुँच गया, जिससे आम लोगों के लिए इस कार्यक्रम तक पहुँचना लगभग नामुमकिन हो गया। मीडिया कंसल्टेंट रितिका के मुताबिक, आयोजन का प्रबंधन भी बेहद खराब रहा। उन्होंने बताया, “जैसे ही कोई हाई-प्रोफाइल व्यक्ति आता था, बाकी लोगों के लिए अफरा-तफरी मच जाती थी। सुरक्षा व्यवस्था भी ठीक से नहीं संभाली गई। कई बार तो बड़े लोगों के आने पर स्टार्टअप फाउंडर्स तक को बाहर निकाल दिया गया।”
सरकारी स्कीम और ए आई
सरकार द्वारा आयोजित कई पैनल इस बात पर थे कि AI सरकारी योजनाओं को ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाने में कैसे मदद कर सकता है, लेकिन इन सेशनों में कहीं भी किसी ग्रामीण या हाशिये की आवाज़ को शामिल नहीं किया गया। जबकि ऐसे विषयों पर चर्चा के लिए हर नजरिये की मौजूदगी ज़रूरी है।
प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2025 तक भारत में कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में सिर्फ 41.75 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों से हैं, जबकि देश की 65 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी गांवों में रहती है।
खबर लहरिया की कई रिपोर्टें दिखाती हैं कि सरकारी योजनाओं में डिजिटल तकनीक लाने पर ज़मीनी स्तर पर कैसी दिक्कतें सामने आती हैं।
मध्य प्रदेश के छतरपुर में जब पोषण योजना के लिए e-KYC अनिवार्य किया गया, तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। बढ़ते डिजिटल घोटालों के डर से कई महिलाएं OTP साझा करने से हिचक रही थीं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार AI जैसी और जटिल तकनीक के लिए ग्रामीण इलाकों में भरोसा कैसे बनाएगी।
बांदा: डिजिटल प्रक्रिया से परेशान किसान लगा रहे विभाग के चक्कर
इसी तरह, बांदा में जब सरकारी योजनाओं और कृषि सेवाओं को ऑनलाइन किया गया, तो कई किसान आवेदन और लाभ लेने की प्रक्रिया में ही अटक गए। इंटरनेट की कमी, सर्वर एरर और टेक्नोलॉजी जानकारी न होने के कारण उन्हें साइबर कैफे और बिचौलियों पर निर्भर होना पड़ा, जिससे समय और पैसा दोनों का नुकसान हुआ।
MANREGA News: मनरेगा संकट में, मजदूरों की गारंटी कमजोर और हक की लड़ाई तेज
मनरेगा में NMMS ऐप और आधार आधारित भुगतान प्रणाली लागू होने के बाद नेटवर्क की कमी के कारण कई मजदूर रोज़ फोटो अपलोड नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि उन्हें काम से बाहर कर दिया गया या उनकी मज़दूरी अटक गई।
जब साधारण डिजिटल ऐप्स को चलाने में ही ग्रामीण इलाकों में इतनी दिक्कतें हैं, तो AI जैसी तकनीक, जो कहीं ज़्यादा डेटा और मजबूत इंटरनेट मांगती है, उसे वहां कैसे पहुंचाया जाएगा—इस पर एक साफ़ और ज़मीनी रोडमैप होना बेहद ज़रूरी है।
भाषा और संस्कृति
कई पैनलों में AI मॉडल और उनके भाषाई व सांस्कृतिक संदर्भ पर भी चर्चा हुई। क्योंकि ज़्यादातर AI मॉडल विदेशों में बनाए जाते हैं, इसलिए भारतीय भाषाओं को अक्सर बाद में शामिल किया जाता है। भारत सरकार की कई पहलें इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं में अगर ग्रामीण आवाज़ें न हों, तो इसका सीधा नुकसान होता है।
कई पैनलों में स्थानीय भाषाओं को शामिल करने की बात तो हुई, लेकिन क्षेत्रीय बोलियों और रोज़मर्रा की भाषा पर कम ध्यान दिया गया। इसका असर खास तौर पर उन महिलाओं पर पड़ता है, जिन्होंने औपचारिक शिक्षा नहीं ली है और जिनकी समझ ज़्यादातर अपनी बोली और स्थानीय संदर्भों पर टिकी होती है।
एक पैनल में यह चर्चा भी हुई कि स्थानीय संस्कृति को समझकर AI विकसित करने से कैसे बेहतर नतीजे मिल सकते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उस चर्चा में भी भारत के गांवों से जुड़ी कोई आवाज़ मौजूद नहीं थी, जो यह बता सके कि ज़मीनी स्तर पर सामाजिक नियम, भाषा और जीवन के अनुभव कैसे काम करते हैं।
इस पैनल में AI को ट्रेन करने के लिए बॉलीवुड फ़िल्मों के इस्तेमाल की बात भी रखी गई। यह एक अच्छी पहल मानी जा सकती है, क्योंकि फ़िल्में भाषा, भाव और संस्कृति को सामने लाती हैं।
लेकिन सिर्फ़ बॉलीवुड तक सीमित रहना काफ़ी नहीं है। अगर सच में समावेशी AI बनानी है, तो क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। गांवों में बोली जाने वाली भाषाएं, स्थानीय संवाद और रोज़मर्रा के अनुभव ट्रेनिंग डेटा का हिस्सा बनेंगे, तभी AI हर वर्ग के लिए उपयोगी हो पाएगी। वरना विकास फिर उन्हीं लोगों और इलाकों तक सीमित रह जाएगा, जिनकी आवाज़ पहले से ज़्यादा सुनी जाती रही है।
महिलाओं के लिए AI
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के हर 10 में से 9 पुरुष और 5 में से 4 महिलाएं व्यक्तिगत कॉल करने या इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए मोबाइल फोन का उपयोग करती हैं। लेकिन इसी सर्वे में यह भी सामने आया कि 84 प्रतिशत पुरुषों के पास अपना मोबाइल फोन है, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा सिर्फ 56 प्रतिशत है।
एपीसी संसथा के साथ मिलकर किए गए खबर लहरिया के पॉडकास्ट में महिलाओं ने बताया कि सोशल मीडिया और डिजिटल चीज़ो का इस्तेमाल करने पर उन्हें डराया जाता है। कई बार परिवार के लोग उन्हें फोन या इंटरनेट इस्तेमाल करने से मना कर देते हैं, या महिलाएं खुद इसे सुरक्षित नहीं मानतीं।कुछ महिलाओं के पास तो अपना फोन ही नहीं था और जिनके पास था, वह पूरे परिवार का सामूहिक फोन बन जाता है, जिससे उनके लिए कुछ भी निजी नहीं रह पाता। इस तरह डिजिटल दुनिया से महिलाओं को धीरे-धीरे दूर रखा जाता है।
अगर इसी दौर में AI के विकास के समय इन आवाज़ों को अनसुना किया गया, तो डीपफेक (यानी AI से किसी की नकली तस्वीर, वीडियो या आवाज़ बनाकर उसे असली जैसा दिखाना) जैसे और अन्य खतरों से ये समस्या और गहरी हो सकती है। सम्मिट में जाने वालों ने बताया कि कार्यक्रम में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर कई पैनल तो हुए, लेकिन इनमें से ज़्यादातर पैनलों में ग्रामीण महिलाओं की आवाज़ सुनाई ही नहीं दी।
2024 में यूनेस्को की एक स्टडी में पाया गया कि AI मॉडल अक्सर महिलाओं को पारंपरिक और घरेलू भूमिकाओं में दिखाते हैं। महिलाओं को “घर”, “परिवार” और “बच्चों” से जुड़े शब्दों के साथ जोड़ा जाता है, जबकि पुरुषों को ऊंचे दर्जे वाले पेशों से। महिलाओं के लिए घरेलू कामगार या रसोइए जैसी भूमिकाएं ज़्यादा दिखाई देती हैं।
इस तरह का भेदभाव इसलिए भी पैदा होता है क्योंकि टेक्नोलॉजी कंपनियों में लंबे समय से महिलाओं की आवाज़ों को कम अहमियत दी गई है। अगर AI को सच में सबके लिए उपयोगी बनाना है, तो आगे बढ़ते हुए इस असमानता को समझना और इसे जानबूझकर दूर करना ज़रूरी होगा।
मंच बड़ा, सवाल अब भी बाकी
इतनी बड़ी सम्मिट का भारत में आयोजन देश के विकास और आने वाले वर्षों में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में मज़बूत भूमिका बनाने का एक बड़ा मौका है। लेकिन इसका असली मतलब तभी होगा, जब विकास की इस प्रक्रिया में सबकी आवाज़ें सुनी जाएं और यह देखा जाए कि हर कोई इस सफ़र में शामिल है या नहीं।
पहले भी G20 जैसी कई अंतरराष्ट्रीय सम्मिट भारत में हो चुकी हैं, लेकिन उनमें देश के कम प्रतिनिधित्व वाले वर्गों के लिए ठोस कार्रवाई बहुत कम दिखी। अब इस ए-आई इम्पैक्ट सम्मिट के बाद यह देखना अहम होगा कि अंत में बनने वाला “दिल्ली एक्शन प्लान” सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रहता है या ज़मीन पर भी लागू होता है। यही तय करेगा कि यह सम्मिट वाकई बदलाव की शुरुआत थी या एक और बड़ा आयोजन भर।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके कासब्सक्रिप्शन लें
