हिमाचल प्रदेश और गुजरात पर बीजेपी की रणनीति

फोटो साभार: विकिमीडिया

दो राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर है। तो पहले बात हिमाचल प्रदेश की 68 विधानसभा सीट पर 9 नवंबर को चुनाव होंगे। चुनाव के नतीजें 18 दिसम्बर को होंगे। प्रदेश की दो बड़ी पार्टी कांग्रेस और बीजेपी ने अपने मुख्यमंत्री के लिए दांव पुराने दिग्गजों पर ही ठोका है। कांग्रेस से वीरभद्र सिंह और बीजेपी ने ऐन वक्त में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार प्रेम सिंह धूमिल को कर दिया। युवा षक्ति को आगे लाने का दांव करने वाले प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी ने प्रेम सिंह धूमिल को हारकर प्रदेश की सत्ता की चाबी दे दी है। हालांकि मोदी-शाह की पसंद जेपी नड्डा थे। पर धूमिल को प्रदेश का जमीनी नेता होने के कारण ये मौका दे दिया गया।
वहीं दूसरी तरफ एक परिवार, एक टिकट फॉर्मूला में ढील देते हुए भाजपा ने मंडी सदर विधानसभा सीट से राज्य के मंत्री कौल सिंह ठाकूर की बेटी चम्पा ठाकुर को टिकट दिया। तो कांग्रेस ने  वर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे और हिमाचल प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रमादित्य सिंह को शिमला ग्रामीण सीट का टिकट दे दिया है, जबकि ये वीरभद्र सिंह की पारंपरिक सीट थी।
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गुजरात चुनाव में नजर डालें तो बहुत विवाद के बाद चुनावी घोषणा बता दी गई। 182 विधानसभा सीटों पर दो चरण पर चुनाव होंगे। 9 दिसंबर को 89 सीटों पर चुनाव होगा। दूसरे चरण का चुनाव 14 दिसंबर को 93 सीटों पर चुनाव होंगे। हालांकि वोटों की गिनती 18 दिसंबर को होगी। साथ ही गोवा के बाद हिमाचल और गुजरात ऐसे राज्य होंगे जहां चुनावों में पूरी तरह से वीवीपैट मशीनों का प्रयोग किया जाएगा।
बीजेपी ने इस चुनाव में अपने मुख्यमंत्री की घोषणा कर दी है, जबकि पिछले कई विधानसभा चुनावों में पार्टी नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव मैदान पर आई है। हिमाचल में चुनाव से थोड़ा पहले प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया गया है, तो वहीं गुजरात में विजय रुपाणी को अपना चेहरा बना चुकी है। हालांकि अगले साल होने वाले कर्नाटक चुनाव के लिए भी पार्टी ने वीएस येदयुरप्पा की अगुवाई में चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। ये मुख्यमंत्री की घोषणा कहीं न कहीं मोदी चमक के फीके होने की बात बता रही है।
नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दे पर आलोचना झेल रही केन्द्रीय सरकार नहीं चाहती कि चुनाव केन्द्रीय नीतियों पर लड़ा जाए। साथ ही हर प्रदेश में गुजरात की उपमा देने वाली सरकार भी गुजरात में जातिगत समीकरण पर ही चुनाव खेलना चाह रही है। गुजरात चुनाव की घोषणा में होने वाली देरी के कारण पहले ही सरकार की बहुत आलोचना हो चुकी है। उस पर अमदाबाद के सिविल अस्पताल में 66 घंटे में 11 नवजात बच्चों की मौत पर भी सरकार लिपापोती कर रही है। खैर दोनों प्रदेशों में देखना अब ये रोचक होगा कि मोदी लहर से हटकर प्रदेश के चेहरों पर चुनाव की नाव चलाना बीजेपी को कितना फायदा देता है।
बाइलाइन-अल्का मनराल