हम भी बन जाएं प्रधान!

 pradhan poem

बिनती सुन लीजिए भगवान।
हम भी बन जाएं प्रधान।।
जनता में हम बनते खलीफा।
रुपया लेकर बांटते वज़ीफा।।
कितनों को कर डालते गंजा।
रूपिया मिलता जो बिछाते खणंजा।।
बैठे-बैठे चांदी काटते।
रूपिया लेकर कालोनी बांटते।।
बन जाते जल्दी से धनवान।
हम भी बन जांए प्रधान।।
हम पक्की कोठी बनवाते।
रूपया लेकर देते पंचायत।।
पक्का बनता मेरा कमरा।
सुखी रहता मेरा परिवार।।
गंाव में बढ़ती मेरी शान।
हम भी बन जाएं प्रधान।।
पूछ हिलाते कोटेदार।
चलता वहंा भी दाव हमारा।।
रहता न मुझको कोई टेंशन।
रूपिया लेकर बनाते पेंशन।।
घर में चलते सीना तान।
हम भी बन जाएं प्रधान।।
जाता भाग दारिद्रता का रोग।
लगा रहता रूपिया का भोग।।
भरी रहती मेरी अलमारी।
हम भी बन जाएं प्रधान।।
हो जाते हम मालामाल।
बढ़ चढ़ खूब बजाते गाल।।
सब बंजर ज़मीन होती मेरी।
रोज़ लगता रूपिया का डाल।।
बढ़ता गंाव में रोज़ सम्मान।
हम भी बन जाएं प्रधान।।
रूपिया की होती बौछार।
बने रहते हम सदा बहार।।
जि़न्दगी बन जाती आसान।
हम भी बन जाएं प्रधान।।
नाम- धर्मेंन्द्र विश्वकर्मा उर्फ धीरू
ग्रामसभा- रकौरा
पोस्ट-बाकरगंज
ब्लाॅक- मया बाज़ार
जि़ला- फैज़ाबाद