सूखे से ग्रस्त किसान मांग रहे हैं ”आत्महत्या करने की इजाजत“

Farmer4 copyकेंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने राज्य सभा सत्र के दौरान बताया कि पिछले 2 सालों से सूखा ग्रसित महाराष्ट्र के वर्धा जिले के 109 किसानों ने जिला अधिकारियों से आत्महत्या करने की इजाजत मांगी है। उन्होंने कहा कि ये आवेदन सरकार से नाराजगी के कारण नहीं हैं बल्कि फसल के बर्बाद हो जाने की वजह से हैं।
इस बारे में राज्य सरकार ने बताया कि ये आवेदन सरकार द्वारा उनकी शिकायत सुनने में कमी या फसल के बदले पर्याप्त मुआवजा न दिए जाने के कारण नहीं है बल्कि खरीफ की फसल कम होने की वजह से हैं।
दरअसल, खराब फसल के कारण हुए नुकसान और ऋण से मुक्ति के लिए 102 किसानों ने आत्महत्या करने का विचार बनाया था। इस पर स्थानीय अफसरों की टीम उन्हें समझाने भी गई। आत्महत्या करने वाले 6 किसान 2014 में खरीफ की फसल के नुकसान में वित्तीय सहायता की मांग कर रहे थे लेकिन उन्हें कुल 28,350 रुपए की सहायता दी गई जिसमें हर किसान को 4,725 रुपए मिले।
राधा मोहन सिंह ने ये भी बताया कि राज्य स्वास्थ्य विभाग के द्वारा चलाए जा रहे प्रेरणा नामक प्रोजेक्ट के अंतर्गत सरकार तनाव और अन्य बीमारियों से ग्रसित किसानों को काउंसलिंग और दवाइयां प्रदान कर रही है।
उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा महाराष्ट में सूखे से राहत के लिए लगभग 3,050 करोड़ रुपए दिए गए हैं। साथ ही एक दर्जन योजनाओं में मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने, ऑर्गनिक फार्मिंग, सिंचाई और बीमा सम्बंधित, किसानों को बेहतर फसल और बेहतर दाम मिलने में सहायता की जा रही है।
यही नहीं इन प्रयासों के बाद भी 2005 में वर्धा जिले के दोरली गांव के ऋणग्रस्त किसानों ने ऋण चुकाने के लिए अपनी किडनी बेच देने की योजना बनाई।
शेतकारी संगठन के कृषक नेता विजय जवंधिया ने बताया, ‘‘इस समय ज्यादातर केंद्रीय और राज्य योजनाएं किसानों पर आई मुश्किलों को नियंत्रित करने में नाकामयाब रही हैं। सिर्फ कुछ ही किसानों को बर्बाद हुई फसल के बदले मे मुआवजा मिला है। कई किसान अभी भी ऋण नहीं चुका पा रहे हैं’’।
राधा मोहन सिंह द्वारा बताई गई 12 योजनाएं किसानों की मदद करने में नाकाम रही हैं। उन्होंने 4 मार्च को राज्य सभा में बताया कि 2015 में महाराष्ट्र में 3,228 किसानो ने आत्महत्या की। जो पिछले 15 सालों में सबसे अधिक हैं।
आत्महत्या करने वाले 1,841 किसानों को 1 लाख प्रति किसान मुआवजा दिया गया जबकि 903 मामले ऐसे थे जो मुआवजे के हकदार नहीं थे। बाकी के 484 मामलों की जांच अभी भी चल रही है। इन सब के अलावा कृषि सम्बन्धी कारणों से 2,806 किसानों ने आत्महत्या की थी।
किसान आत्महत्या मामलों में, महाराष्ट्र में सबसे अधिक 1,841 आत्महत्याएं की गईं। इसके बाद पंजाब में 449, तेलंगाना में 342, कर्नाटक में 107 और आंध्र प्रदेश 58 आते हैं। जबकि कई राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश, ओडिसा, मध्य प्रदेश में कृषि आपदाओं के बाद भी एक भी आत्महत्या का मामला सामने नहीं आया है।
भारत में दूसरा सबसे खराब मानसून का साल 2015 था। जिन दस राज्यों को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया गया था उनके लिए केंद्र से 41,722 करोड़ की वित्तीय सहायता की मांग की। लेकिन मिला केवल 12,773 करोड़।
इन समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय बजट में बीमा और सिंचाई योजनाओं का बजट बढ़ा दिया गया है, ताकि कृषि आपदाओं से निपटा जा सके।