“सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े” होतें हैं मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई कैदी

deathrow copy20 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की जेलों में बंद फांसी की सजा पाने वाले 373 कैदियों और उनके परिवारवालों से बातचीत के आधार पर तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि फांसी की सजा पाने वाले 74.1 फीसदी कैदी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हैं। इनमें 76 फीसदी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी या धार्मिक अल्पसंख्यक समूह से हैं।
‘सेंटर ऑन द डेथ पेनाल्टी’ की रिपोर्ट में एक खुलासे के अनुसार, जघन्य अपराधों के लिए फांसी की सजा पाने वालों की संख्या सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में है, जबकि बिहार दूसरे स्थान पर है। अब तक, उत्तर प्रदेश में कुल 79 लोगों को फांसी की सजा मिली है। इनमें से 62 लोगों को हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, फांसी की सजा पाने वाले 373 कैदियों में से दिहाड़ी मजदूर (खेतिहर और गैर खेतिहर) की संख्या 170 है, जबकि 17 बेरोजगार, 6 छात्र और 3 धर्म से जुड़े काम करने वाले हैं।

इन कैदियों में से…

  • रिपोर्ट के अनुसार फांसी की सजा पाने वालों में 84 फीसदी ऐसे हैं, जिन्होंने पहली बार अपराध किया।
  •  73 फीसदी अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे, जबकि 59 परिवार में कमाने वाले मुख्य सदस्य थे।
  • रिपोर्ट के मुताबिक, फांसी की सजा पाने वाले कैदियों में 23 फीसदी ऐसे हैं जो कभी स्कूल नहीं गए, जबकि 61.6 फीसदी ने माध्यमिक तक की शिक्षा पूरी नहीं की।
  • फांसी की सजा पाए लोगों में 34 फीसदी ओबीसी हैं, जबकि 24.5 फीसदी एससी, एसटी व 24 फीसदी सामान्य वर्ग के हैं।
  • 20.7 फीसदी धार्मिक अल्पसंख्यक समूह के हैं।
  • आतंकी गतिविधियों में फांसी की सजा पाने वालों में करीब 93.5 फीसदी अनुसूचित जाति या धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से हैं।
  • यही नहीं, रिपोर्ट के अनुसार फांसी की सजा पाने वालों में 12 महिलाएं भी हैं।