सरकार अपने काम खातिर बहुतै प्रचार प्रसार करत हवै।पै जनता का हाल बेहाल हवै।

दशहरा के बाद दीवाली का त्योहार आ गा पै सरकार कइती से मंहगाई कम नहीं भे आये। बाजार मा दुकान तौ सजी हैं पै खरीदै वाले बहुतै कम देखात हवैं। खास कर गरीब मड़ई जउन दुई जून के रोटी का जूगाड़ बडे़ मुश्किल मा कई पावत हवैं।उनका इं सजी दुकानन से कऊनौ मतलब नहीं आय। सरकार जीएसटी लागू कई के जनता का जीयब मुश्किल कई दिहिस हवैं।
मजूरी करै वाले मड़इन का कह हवै सरकार हम गरीबन खातिर कउनौ सुविधा नहीं देत आय पैं मंहगाइ मी येत्ती ज्यादा हवै कि हम जइसे लोगन का कुछ फायदा नहीं आय। का सरकार बिना हमरे मदद कके कुर्सी पा सकत हवै? काहे सरकार सब का मारै मा लाग हवै? सरकार आखिर चाहत काहवै? बिना जनता के सहयोग से वा कत्तौ राज कई सकत हवै?
सरकार का तौ वा काम करै का चाहीची जऊन सब के काम आये? पै सरकार तौ आपन बस देखै मा लाग हवै। पता नहीं हम दीवाली मना भी पइवे या नहीं?