विभाग, साइबर कैफे, रुपिया के बर्बादी

चित्रकूट अउर बांदा जिला के मड़ई या समय आनलाइन राशन कार्ड का बनवावैं खातिर साइबर कैफे के चक्कर लगावत रही जात हवैं। आनलाइन राशन कार्ड का फारम भरै मा मड़ई चार चार दरकी फारम भर चुके हवै, पै उनके आनलाइन राशन नहीं बन पावत हवै।
आनलाइन राशन कार्ड बनवावैं का नियम सरकार एक साल से लागू करिस रहै। आनलाइन राशन कार्ड खातिर अगर मड़ई जिला पूर्ति विभाग जात हवैं तौ उनका या कहिके लउटा दीन जात हवै कि उंई जा के साइबर कैफे मा पता करै। अगर मड़ई साइबर कैफे जात हवै। हुंवा या कहि दीन जात हवै कि हमार काम फारम भरब रहै तौ भर दीन गा हवै। हमार या काम नहीं आय कि हम बताई कि केहिका राशन कार्ड बना हवै अउर केहिका राशन कार्ड नहीं बना आय। शायद यहै बात का लइके मड़ई दूनौं कइती चक्कर मा पर जात हवैं कि हमार राशन कार्ड बनी कि नहीं। सरकार का सोच के आनलाइन राशन कार्ड बनवावैं खातिर सोचिस रहै। आनालाइन फारम भरै मा गरीब मड़इन का रुपिया लाग जात हवै, पै उनका राशन कार्ड नहीं बन पावत आय। यहिसे जिला पूर्ति विभाग वालेन अउर सरकार का कउनौ फर्क नहीं परत आय कि गरीब जनता कउनतान आपन रुपिया का बर्बाद करत हवै।
एक-एक रुपिया कमाये मा तौ मड़इन का पसीना बहत हवै, पै यहिसे बड़े अधिकारिन अउर सरकार का कउनौ मतलब नहीं रहत आय। अगर अधिकारी अउर सरकार गरीब मड़इन के जइसे जमीनी स्तर के सच्चाई अउर मेहनत का जानै अउर समझै तौ वा दिन दूर नहीं कि समाज से भृष्टाचार जइसे का मुद्दा अउर गरीब सरकारी योजना का लाभ लें से वंचित नहीं रही सकत हवै। आखिर सरकार का सोच के आन लाइन राशन कार्ड भरवावैं खातिर सोचिस अउर या नियम लागू करिस रहै। इं सबहिन खातिर सरकार का पहिले से सोचै अउर समझै के जरुरत रहत हवै। आज अगर देखा जाये तौ बांदा अउर चित्रकूट जिला मा लाखन के संख्या मा गरीब अउर पा़त्र मड़ई राशन कार्ड बनवावैं का परेशान रहत हवैं। जउन मड़ई पात्र हवैं। उनका राशन कार्ड बनब जरुरी हवै। न कि अपात्र मड़इन का राशन कार्ड बनावैं के जरुरत हव? ज्यादातर या हवै कि अमीर लोगन के राशन कार्ड बन गें, पै पात्र मड़ई विभागन के चक्कर लगावत रही जात हवैं? सरकार के पांच साल पांच घंटा के जइसे बीत जात, पै गरीबन खातिर पांच साल पंद्रह साल के जइसे गुजरत हवैं?