यू.पी. की हलचल – दिल्ली के चुनावी सबक का यू.पी. में होगा असर

सुमन गुप्ता उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे फैज़ाबाद स्थित जन मोर्चा अखबार में काम करती हैं। इस समय वे यू.पी. स्तर पर पत्रकार हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत ने लोकसभा चुनाव में बहुमत से जीतकर आई भारतीय जनता पार्टी के माथे पर चिन्ता की लकीरें खींच दी हैं। यह चुनाव था तो दिल्ली जैसी छोटी विधानसभा का जिसे पूर्ण राज्य का दर्जा तक प्राप्त नहीं है। लेकिन इस चुनाव ने भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों को चैकन्ना कर दिया है।
लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में से भाजपा और उसके सहयोगी दलों को तिहत्तर सीटें मिलीं थीं।
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी अब दूध की जली छाछ भी फूंक-फूंक कर पी रही है।
अभी तक दूसरी पार्टियों से आने वालों के लिए भाजपा के दरवाज़्ो पूरी तरह खुले थे। लोकसभा चुनाव और दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान दूसरे दलों के लोगों को खूब महत्व दिया गया। अरविंद केजरीवाल से निपटने के लिए देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले अन्ना हज़ारे की टीम की किरन बेदी को लाया गया था। दरअसल अरविंद केजरीवाल और किरन बेदी दोनों ही अन्ना आंदोलन का बड़ा चेहरा रहे हैं। ऐसे में भाजपा को लगा था कि किरण बेदी अरविंद केजरीवाल पर भारी पड़ेंगी। पर हुआ उलटा। किरण बेदी पूरी पार्टी को तो छोड़ो खुद भी नहीं जीत पाईं।
भारतीय जनता पार्टी अब उत्तर प्रदेश के 2017 के विधानसभा चुनाव को लेकर सतर्क हो गई है। अब वह बहुत सोच समझ कर किसी को पार्टी में शामिल करेगी।
दिल्ली के चुनाव परिणाम आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की भी चुप्पी टूटी है। भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी संगठनों द्वारा अभियान के तौर पर चलाए जा रहे अभियानों के बारे में उठ रहे सवालों का उन्हें जवाब देना ही पड़ा।
उत्तर प्रदेश में मोदी की पार्टी के लोग और संघ के मित्र संगठनों द्वारा चलाए जा रहे लव जेहाद, घर वापसी समेत अन्य सांप्रदायिक अभियानों पर रोक लगानी पड़ेगी। भले ही यह रोक उत्तर प्रदेश के चुनाव होने तक ही हो।