यू.पी. की हलचल – किसान पर प्रशासन की भी मार

 

लखनऊ की वरिष्ठ पत्रकार सारा जमाल कई अखबारों के लिए लिख चुकी हैं।

15-04-15 Kshetriya Banda - Farmer Pachchi 2 webउत्तर प्रदेश के किसान न केवल प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहे हैं बल्कि खराब प्रशासन के भी शिकार हैं। बर्बाद फसलों के मुआवज़े के हकदार किसानों को उचित मुआवज़ा नहीं मिल रहा है। ऐसा तब है जबकि प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मौजूदा साल को किसान वर्ष घोषित किया है।
बेमौसम बारिश और तेज़ आंधी के साथ बरसने वाले ओलों ने खेती को बिल्कुल बर्बाद कर दिया है। ऐसे में कर्जदार किसानों के हिस्से आई बर्बादी ने कोई मौका नहीं छोड़ा है जिससे कि वह अपना कर्ज चुका सकें। कुछ किस्मत वाले किसान ही खेतों से अपनी फसलों को काट पाए हैं।
जिलों से किसानों की आत्महत्या और सदमे से होने वाली मौतों की खबरें रोज़ाना आ रही हैं। इस पर मुख्य सचिव आलोक रंजन का यह कहना कि कोई भी किसान फसल बर्बाद होने से नहीं मरा है -सरकार के रवैए पर सवाल खड़ा करता है। आधिकारिक रूप से सरकार ने सदमे से मरने वाले किसानों को असमय मौत माना है। लेकिन जिस सदमे के कारण इनकी मौत हुई है, उसे कारण नहीं माना है। हालांकि इस तरह से मरने वाले किसानों के परिवारों के लिए केंद्र सरकार से डेढ़ लाख और राज्य से साढ़े तीन लाख रुपए की मदद मिलेगी। इसके अलावा दो लाख रुपए मुख्यमंत्री कोष से भी मिलेंगे।
बर्बाद फसलों का भी मुआवजा इस साल बढ़ा है। तेज़्ा बरसात से बर्बाद फसलों के लिए केंद्र सरकार पैंतालिस सौ रुपया प्रति हेक्टेयर देगी जबकि सिंचित भूमि के लिए नौ हजार रुपए मिलेंगे। राज्य सरकार ने तो इन किसानों के लिए केंद्र से दोगुना मुआवज़ा तय किया है। मुआवज़े की राशि के तौर पर राज्य सरकार ने पांच सौ करोड़ रुपए की घोषणा की है। लेकिन सुस्त चाल प्रशासन इस घोषणा को पूरा करने के लिए चुस्त नहीं दिख रहा है। यह प्रशासन की ही लापरवाही और अनदेखी ही है कि झूठे सर्वे और लेखपाल द्वारा घूस लेने की खबरें आ रही हैं। मुआवज़्ो के तौर पर सौ सौ रुपए के चेक बांटे जा रहे हैं।