मोदी की ‘आत्मसंतुष्टि’ ही उनकी महानता है

KL Logo 2 copy webइस लेख को खबर लहरिया की पत्रकार प्रियंका सिंह ने लिखा हैं। यह लेख उनकी राय और अनुभव पर आधारित है।

अमरीकी कांग्रेस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को लेकर खूब चर्चा हो रही है। बताया जा रहा है कि पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने अपने प्रभावी भाषण के कारण अमेरिकीयों का दिल जीत लिया है। यह बात बेहद बचकानी है कि मोदी द्वारा किया गया हर कार्य ‘पहली-पहली’ बार किया गया है। लेकिन हैरानी की बात है कि क्या भारत को गर्व करने के लिए महज इतना भर चाहिये? मोदी विदेशों में जा कर गाँधी और आंबेडकर का नाम लेकर वाहवाही लूटते हैं और देश में गोडसे और गोलवलकर का नाम जपते हैं। देश में गांधी उनके लिए विरोधी है और गोडसे महात्मा। वह अक्सर बाहर कहा करते हैं कि भारत का संविधान एक ‘पवित्र ग्रंथ’ है लेकिन देश में रहते हुए उसे बदलना चाहते हैं। उनके हिसाब से हर मुद्दा धर्म और हिंदुत्व से जुड़ा होना चाहिए तभी वो संविधान को पवित्र ग्रंथ और संसद को मंदिर कहते है। मोदी की बातों में इतना विरोधाभास है कि खुद शायद वो भी समझ नही पाते होंगे कि कब उन्होंने क्या कह दिया। एक प्रधानमंत्री होने के नाते उन्हें अपनी प्रधानमंत्री की छवि का ख्याल रखना चाहिए न कि ‘मोदी छवि’ का, लेकिन लगता नहीं है कि मोदी को ‘मोदी छवि’ से निकाला भी जा सकता है।
एक तरफ उनकी ही पार्टी की कार्यकर्ता ‘मुस्लिम मुक्त भारत’ बनाने की बात करती हैं तो वहीं मोदी विदेशों में भारत को एक लोकतांत्रिक देश बता कर तारीफें बटोरते हैं। अब जरा सोचिए, भारत विश्व के सामने एक लोकतांत्रिक देश, अखंडता में एकता का प्रतिक है लेकिन देश की सत्ताधारी सरकार इसे सिर्फ हिन्दू राष्ट्र बनाने पर तुली है! ऐसे में कैसे मोदी विदेशों में जा कर विरोधाभास भाषणों द्वारा झूठी तारीफ बटोर कर खुद को महान साबित कर सकते हैं! भाजपा के सदस्यों ने ही कहा है कि ज्यादातर मुस्लिम आतंकवादी होते हैं, कुत्ते का पिल्ला होते हैं, उन्हें पाकिस्तान भेजा जाना चाहिये और दलितों को सर पर शौच उठाने में गर्व होना चाहिये। ताज्जुब है कि इन सब पर मोदी कुछ नही कहते। क्या तब उन्हें खुद पर गर्व होता है? यह वाकई कमाल है कि तालियां बटोरने के लिये मोदी अपने ही विचारो से बेईमानी कर रहे हैं! ये तालियाँ उन्हें उस भारत की मूल आत्मा, संविधान और लोकतान्त्रिक मूल्यों पर मिली जिनपर खुद उनका विश्वास नही है।
अब सवाल यह है कि इस दोहरी विचारधारा से मोदी कब तक आत्मसंतुष्टि करते रहेंगे?