मानवाधिकारों के खिलाफ धारा 377

377सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से नाराज कुछ लोग सड़कों पर उतरे। इस फैसले में कहा गया है कि औरत औरत और पुरुष पुरुष के बीच संबध बनना प्रकृति के नियम के खिलाफ है। यानि जो लोग ऐसा करते हैं वो गुनाहगारों की श्रेणी में आ जाएंगे। सड़कों पर उतरे लोग इन्हीं लोगों में से हैं। इनमे से एक व्यक्ति ने कहा -‘हम न तो भ्रश्टाचारी हैं, न ही चोर।
न किसी को धोखा दिया हमने, देषद्रोही भी नहीं हैं, तो फिर हम अपराधी क्यों?’ दरअसल इन लोगों ने एक ऐसे रिष्ते को समाज के सामने लाने की हिम्मत की जिसे लोग डर के कारण छिपाते थे। क्योंकि यह रिष्ता बनी बनाई सामाजिक धारणा को चुनौती देने वाला है। हालांकि यह फैसला तो सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2013 में ही दे दिया गया था लेकिन दोबारा से इस फैसले पर विचार करने के लिए एक याचिका डाली गई थी, पर कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया कि विचार करने की जरूरत नहीं है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने साल 2009 में इस बारे में फैसले को सुनाते हुए कहा था कि इस तरह के संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 दरअसल मानवाधिकारों को छीनने वाली है। मानवाधिकार के आर्टिकल 14 जिसमें कहा गया है कि कानून के सामने सब बराबर होंगे, आर्टिकल 15 जिसके अनुसार धर्म, जाति, जेंडर, जन्म के स्थान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा, और इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण आर्टिकल 21 जिसमें सभी को अपने जीवन की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। लेकिन 377 धारा अगर लागू रही तो इन सभी अधिकारों को बचाना कठिन होगा।