माता और शिशु मृत्यु दर बना राज्य में गंभीर मुद्दा

भारत में हर दस मिनट पर एक गर्भवती औरत की प्रसव के दौरान मृत्यु होती है। उत्तर प्रदेश में कई औरतों ने सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना चाहा पर कहीं लापरवाही तो कहीं घूसखोरी ने इन लाभों को उनकी पहुंच से दूर ही रखा।

रिफर करने का सिलसिला

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संतोषी का परिवार

जिला बांदा, ब्लाक तिंदवारी। डिघवट गांव की संतोषी के पति रामप्रकाश ने 30 मई को एंबुलेंस को फोन किया तो जवाब मिला कि गाड़ी नहीं है। वे साइकिल से दस किलोमीटर दूर उसे चिल्ला मातृ एवं शिशु परिवार कल्याण उपकेंद्र ले गए। नार्मल डिलेवरी के बाद भी संतोषी के खून बहता रहा। तब ए.एन.एम. मिथलेश श्रीवास्तव ने कहा कि एक और बच्चा है और केस बांदा रिफर कर दिया। एक डेढ़ घंटे के भीतर पैसों और गाड़ी का इंतज़ाम किया गया। बांदा जिला अस्पताल में उसे एक बोतल पानी चढ़ाने के बाद कानपुर रिफर कर दिया गया। रास्ते में उसकी मौत हो गई। राम प्रकाश इस पूरे मामले में ए.एन.एम. से लेकर बांदा अस्पताल तक कार्रवाई की मांग करने के लिए केस करने की सोच रहे हैं। ए.एन.एम. के अनुसार रिफर के बाद कोई भी केस उनकी ज़िम्मेदारी नहीं है।
गांव बिछवाही की गोमती की मौत भी तिंदवारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद से बांदा अस्पताल जाने के रास्ते में ही हो गई। 15 जून को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में गोमती के खून की जांच हुई। नार्मल डिलेवरी के तीन घंटे बाद तक खून बहता रहा। ए.एन.एम. ने जिला अस्पताल रिफर कर दिया। अस्पताल पहुंचने से पहले ही गोमती ने दम तोड़ दिया।

बांदा के सी.एम.ओ. डाक्टर कैप्टन आर.के. सिंह ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि मौत के बहुत कारण हो सकते हैं। मौत को कोई नहीं रोक सकता। किसी भी तरह की लापरवाही होगी तो कारवाही होगी।

अंत में किसकी ज़िम्मेदारी होती है?

जिला फैज़ाबाद, ब्लाक तारुन। 18 अप्रैल को तारुन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर रात दो बजे दांदूपुर निवासी एक महिला ने बच्चे को जन्म दिया जिसकी पैदा होते ही मौत हो गई। एंबुलेंस में आशा ने पचास रुपए मांगे, सी.एच.सी. में ए.एन.एम. दुर्गावती और ड्यूटी डाक्टर वेद प्रकाश ने बच्चा उल्टा होने से केस तुरंत जिले को रिफर कर दिया। साथ जाने के लिए ए.एन.एम. ने पैसे मांगे तो महिला और उसका परिवार पैदल ही निकल गए और रास्ते में ही बच्चा हुआ।

तारुन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के ड्यूटी डाक्टर वेद प्रकाश और अधीक्षक डाक्टर अंसार अली ने कहा कि अगर रिफेर करने के बाद महिला अपने से केंद्र के बाहर जाती है और कोई हादसा होता है, तो यह उनकी ज़िम्मेदारी नहीं रहती है।

तीन बच्चों में एक बचा

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जिला महोबा। बम्हौरी कलां गांव की सुमन के 27 मई को तीन बच्चे पैदा हुए। पहली बच्ची एंबुलेंस में पैदा होते ही मर गई। 28 मई को जिला अस्पताल से सुमन को डिसचार्ज कर दिया गया। घर पर जब उसके लड़के की तबियत बिगड़ी तो उसने 108 एंबुलेंस पर फोन किया। वहां से बताया गया कि गाड़ी खराब है और एक घंटे बाद ही पहुंचेगी। सुमन ने खुद साधन का इंतज़ाम किया पर घर से निकलते ही उसके दूसरे बच्चे ने भी दम तोड़ दिया।

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सुमन के तीन बच्चों में से एक पैदा होते ही मर गई और लड़का तीन दिन बाद। अस्पताल में बच्चे की नाल पर लगाई गई चिमटी के खिंचाव से बच्चे को चोट लग गई और अस्पताल पहुंचने से पहले ही वह मर गया। पर सुमन और उसके बच्चों को डिलेवरी के एक दिन बाद ही अस्पताल से क्यों छुट्टी दे दी गई?