महिला पत्रकारों की कलम से… – औरतें ही क्यों ढोएं रीति-रिवाज़ का बोझ

डाक्टर स्मिता वशिष्ट
डाक्टर स्मिता वशिष्ट

अब हर हफ्ते खबर लहरिया में पढ़ें महिला पत्रकारों की कुछ खास खबरें। राजनीति, विकास, संस्कृति, खेल आदि की ये खबरें देश के कोने-कोने से, छोटे-बड़े शहरों और अलग-अलग गांवों से हैं। इस हफ्ते, डाक्टर स्मिता वशिष्ट से मिलें। ये हरिद्वार में पत्रकारिता की एसिसटेंट प्रोफेसर हैं। पिछले आठ सालों से पढ़ा रही हैं। पत्रकारिता से जुड़े शोध एवं प्रकाशन के काम को भी देखती हैं।

अक्सर मैं यह सोचती हूं कि रीति रिवाज़्ा और परंपराओं का जनक कौन है? परंपराओं को निभाने का जि़्ाम्मा तो महिलाओं के ही हिस्से आता है। बचपन से लगभग हर लड़की को सिखाया जाता है कि हमें हर परिस्थिति में खुद को ढालना चाहिए। शादी के समय तो यह सीख सौगात में दी जाती है। रामायण की सीता जी का हवाला देकर हमें पत्नी धर्म निभाने की सीख घरवाले देते हैं। मगर बार बार यह सोचती हूं कि आखिर यह रीति रिवाज आए कहां से?
हर घर में इसकी अलग परिभाषा है। रीता चाची के लिए सर पर पल्ला रखना तो बीना चाची के लिए बढि़या खाना बनाना तो मां के लिए हर समय पापा के आदेश का पालन करना। रामायण में एक चैपाई है। रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई। रीत यानी रिति रिवाज़्ा। पर यह क्या। रीता चाची ने तो रीत बदल दी है। वह अब कंप्यूटर सीख रही हैं। उन्हें तो कुछ नया सीखना है। मगर समाज के गले यह नहीं उतरता। वह बातंे बनाता है। ऐसी औरतों को बुरी औरत के दायरे में ढकेल देता है।
ज़्ारा आगे बढ़ें। बड़े-बड़े नेता, अधिकारी तो यही बताते हैं कि बलात्कार छोटे कपड़े पहनने से होता है। समाज ने तो रिवाज के नाम पर बिंदी, चूड़ी, पायल न जाने क्या-क्या पहना दिया। इन्हें उतारकर छोटे कपड़े पहनने का नतीजा है, बलात्कार। उधर सास बहू और साजिश को आधार बनाकर बनाए गए एकता कपूर के धारावाहिकों में पारंपरिक कपड़े पहने, गहने पहने औरत ही सबसे ज्यादा खुराफात करती है। कभी-कभी लगता है कि एकता कपूर की पारंपरिक औरत की छवि बिगाड़ने की यह साजिश है। घर के दायरे में रहने और कपड़े-गहने पहनने के सामाजिक मानक को पूरा करने वाली यह औरतें इन धारावाहिकों में खलनायिका बन जाती है। खैर जो भी हो। यहां सोचना यह जरूरी है कि दिखावे के रीति रिवाज, पहनावा ओढ़ावा आखिर औरतों पर ही क्यों थोपे जाते हैं?