महिला पत्रकारों की कलम से – खेती में माहिर, मगर किसान नहीं

अब हर हफ्ते खबर लहरिया में पढ़ें महिला पत्रकारों की कुछ खास खबरें। राजनीति, विकास, संस्कृति, खेल आदि की ये खबरें देश के कोने-कोने से, छोटे-बड़े शहरों और अलग-अलग गांवों से हैं। इस हफ्ते, खबर लहरिया की सीनियर पत्रकारों द्वारा की गई खास रिपोर्ट पढ़ें जो महिला किसानों के बारे में है।

देहरादून में महिला किसानों के एक सम्मेलन में देश के अलग-अलग राज्यों से खेती-किसानी करने वाली औरतें पहुंची थीं। उनमें से एक थीं बीजा देवी। जब उनसे उनकी कहानी पूछी तो उन्होंने बताया कि किसानी से उनका जुड़ाव बचपन से ही है। ‘बाबूजी जोताई करते थे और मां बीज डालती थीं। वही बीज डालते हुए मैं अक्सर मां को देखती थीं। मेरे अंदर किसानी का बीज वहीं से पड़ा।’ देहरादून में बने एक फार्म हाउस में पिछले बीस सालों से जैविक खेती का काम कर रही पैंसठ साल की बीजा देवी अपने किसान बनने का किस्सा यहां से शुरू करती हैं।
बीजा देवी ने बताया – जब मैं थोड़ा समझदार हुई तो पता चला कि ज़्ामीन का हक मां के पास नहीं है। मां को किसान होने का दर्जा भी नहीं मिला है। इससे भी ज़्यादा बुरा था यह जानना कि औरतें खेत नहीं जोत सकतीं। जब भी पूछा तो पता चला कि बस यह परंपरा है।
बीजा देवी को हर बीज की गहरी जानकारी है। उसके रखरखाव, बोने का मौसम, जैविक खाद बनाने की जानकारी, खरपतवार को खत्म करने के पारंपरिक तरीकों के बारे में तो वह किसी वैज्ञानिक की तरह बताती हैं। बीजा देवी से जब उनके हुनर की तारीफ की गई तो उन्होंने कहा – ‘इंटरव्यू देकर यहां पर आई हूं। पहले मैं अपने ससुराल और उससे पहले मायके में खेती करती थी। मैं तो बिना खेतों के रह ही नहीं सकती। फसलें मेरी सहेली हैं। शायद यही कारण है कि मेरी मां-बाबूजी ने मेरा नाम ‘बीजा’ रखा।’
बीजा देवी के नाम न तो ससुराल में कोई ज़्ामीन है और न ही मायके में। बीजा कहती हैं, ‘सामाजिक मान्यता है कि ज़्ामीनदार आदमी होते हैं, औरतें नहीं। सरकार भी तो यही मानती है। नहीं तो महिलाओं को किसान का दर्जा न दे देती? पत्रकार भी तो यही मानते हैं। टी.वी. में किसानों की खबरों में औरतें कहां दिखाई जाती हैं?’