महिला पत्रकारों की कलम से – किसानी करती महिलाएं पर किसान का दर्जा क्यों नहीं?

अब हर हफ्ते खबर लहरिया में पढ़ें महिला पत्रकारों की कुछ खास खबरें। राजनीति, विकास, संस्कृति, खेल आदि की ये खबरें देश के कोने-कोने से, छोटे-बड़े शहरों और अलग-अलग गांवों से हैं। इस हफ्ते, खबर लहरिया की सीनियर पत्रकारों द्वारा की गई खास रिपोर्ट पढ़ें जो महिला किसानों के बारे में है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ग्रामीण इलाकों की ज़्यादातर औरतें खेतीबाड़ी का काम करती हैं। मुझे याद है बचपन में मेरे पिता बीज बोने के समय मां को आवाज़्ा लगाते थे अरे सुनो वह फलां अनाज का बीज कहां रखा है। मेरी मां फौरन बीज निकालकर दे देतीं थीं।
आज भी यह काम औरतों की ही जि़्ाम्मेदारी समझा जाता है। मतलब बीज बचाने से लेकर घर में अनाज के रखरखाव तक का काम औरतें ही करती हैं। पर जमीन पर पहला मालिकाना हक माना जाता है पुरुष का। किसानों का जिक्र चाहें सरकारी भाषा में हो, सामाजिक भाषा में हो या फिर मीडिया में वहां भी इस ओहदे को पुरुषोें से ही जोड़कर देखा जाता है।
आखिर ऐसा क्यो? दरअसल पुरुष सत्ता की मानसिकता यहां पर भी हावी रहती है। भला औरत मालिक कैसे हो सकती है! जमीन का हक उसे कैसे दिया जा सकता है! हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान देश के कोने कोने से आई महिला किसानों से बातचीत हुई। इसमें लद्दाख, केरल, असम, बिहार, मनीपुर, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की महिला किसान शमिल हुईं। यहां मौजूद सभी औरतों ने इस सवाल को उठाया कि हम अनाज उगाने से लेकर बाजार में बेचने तक का काम करते हैं। लेकिन महिला को किसान का दर्जा नहीं दिया जाता है।
खाने पीने की बात हो तो घरों में पोषक आहार पर भी पुरुषों का ही पहला हक होता है। आंकड़े भी यही बताते हैं कि देश में सत्तर प्रतिशत महिलाएं खून की कमी का शिकार हैं। ऊपर से यह धारणा बनी है कि माहिलाएं खेतों में हल नहीं चला सकती हैं। माना जाता है कि ऐसा होने पर पैदावारी अच्छी नहीं होगी। इसके पीछे अलग अलग राज्यों में अलग अलग किस्से हैं। पर हल के पीछे-पीछे बीज डालने का काम औरतों का है। तो बिना बीज बोए, क्या पैदावारी हो सकती है! सरकार और समाज को इन मनगढ़ंत कहानियों को तोड़ने की कोशिश करनी चाहिए।