महिला पत्रकारों की कलम से… – कुबूल है, कुबूल है मगर शिक्षा

अलमास फातमी
अलमास फातमी

अब हर हफ्ते खबर लहरिया में पढ़ें महिला पत्रकारों की कुछ खास खबरें। राजनीति, विकास, संस्कृति, खेल आदि की ये खबरें देश के कोने-कोने से, छोटे-बड़े शहरों और अलग-अलग गांवों से हैं।
इस हफ्ते, पढ़ें अलमास फातमी की खबर। पिछले करीब पांच सालों से पत्रकारिता कर रही हैं। वर्तमान में यह पटना में दैनिक हिंदुस्तान अखबार में रिपोर्टर हैं।

तालीम के लिए संघर्ष करने वाली हसीना की कहानी हम उन्हीं की जुबानी पढ़ सकते हैं – घर में पढ़ाई का माहौल नहीं। हां इसकी ललक तब से थी, जब मैं महज चार साल की थी। घरवालों से छिपकर पढ़ाई करती। एक दिन पता चला कि किशनगंज स्थित महीन गांव की खारी बस्ती में एक संस्था में लड़कियों को पढ़ाने का काम होता है। मैं छिपछिपकर वहां जाने लगी। दस साल की उम्र में घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी। शादी के दिन इंतजार था, कुबूल है, कुबूल है का। इतने में संस्था वालों ने आकर मेरी शादी रुकवा दी। इस फैसले में अब्बू और अम्मी मेरे साथ हो गए।
मैं पढ़ने सेंटर जाने लगी। वहां जा कर पता चला कि पढ़ाई कितनी जरूरी है। सेंटर में हमने मिल कर किशोरी कमेटी बनाई। वे लड़कियां जो पढ़ नहीं पाती है, उनके बीच गई। उनके मां बाप के ताने सुने। मैंने 2010 में मैट्रिक पास की। उसके बाद डिग्री कॉलेज से बीबीए की पढ़ाई की। इंगलिश-हिंदी डिक्शनरी से अंग्रेजी पढ़ना सीखा। साथ ही दूसरी महिलाओं और लड़कियों को भी शिक्षित कर रही हूं। मेरा सपना है कि एक मल्टी नेशनल कंपनी में एचआर के पद कर काम करूं।