मजदूरिन

mazdur

वह
समाज में
न्याय न पाकर
अन्याओं की चोट दबाकर
भरी देह का
नेह सुखाकर
खाकर ठोकर
रोम दुखाकर
अपने सपने
धुल बनाकर
कर से कर पर की मजदूरी,
पग से
हर, पल-पल की दूरी;
जीवन जीती है
अनचाहा
दुख-दारिद पीती अनथाहा.

________ केदारनाथ अग्रवाल