बुर्के पर बहस करें या मानसिकता पर?

Nutan-yadav-charchaye-

आज फिर से एक बार बुर्का या पर्दा चर्चा के केंद्र में है। बुरका या पर्दा प्रथा के मूल में एक ही पुरुषवादी मानसिकता काम करती है। दोनों धर्मों के पुरुषों ने अपनी स्त्रियों को नियंत्रित करने के लिए बुर्के या परदे पर जोर दिया है। कहीं स्त्रियां स्वतंत्र होकर अपने लिए एक नया जहाँ न बना लें इस डर से सदियों से यह खेल खेला जाता रहा है।
किन्तु इस्लाम और हिन्दू धर्म के परदे में भी कई बुनियादी फर्क हैं। इस्लाम में स्त्री को पूरी देह ढांकने के लिए मजबूर किया जाता है हालांकि कुरान आदि में इसका कोई सन्दर्भ नहीं मिलता और इसे पुरुष सत्ता ने स्त्रियों पर उनके वर्चस्व को बनाये रखने के लिए ही थोपा हुआ है।
जबकि हिन्दू धर्म में परदे के पीछे चेहरा उर छाती ढांकने का विचार केंद्र में रहा है। हालांकि भारत में अधिकतर हिन्दू पर्दा प्रथा से दूर हैं और अधिकांश राज्यों में पर्दा प्रथा नहीं के बराबर है। इसका ज्यादा प्रभाव उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार आदि में दिखता है।
भारत में हिन्दुओं में पर्दा अपने-अपने परिवेश, परिस्थिति अथवा सामजिक स्थिति के अनुसार कम या ज्यादा किया जाता रहा है। हिन्दुओं में मुसलामानों की तरह छोटी बच्चियों का स्कार्फ आदि से सिर ढंकने की प्रथा कहीं देखने को नहीं मिलती ।
हिन्दू धर्म में वृद्ध स्त्रियां पर्दा नहीं करती । जबकि मुस्लिम महिलाएं अंत समय तक बुरका पहनने को विवश रहती हैं। हिन्दू धर्म में पर्दा प्रथा के कई रूप प्रचलित हैं।
चूंकि भारत में अधिकतर हिन्दू महिलाएं साड़ी पहनती हैं और साड़ी की संरचना में उतना दबा ढंका पर्दा किया ही नहीं जा सकता जैसे कि बुर्के में ।
इधर जब से फैशन आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा बन गया है तब से परदे के रूप में भी कई तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं । साड़ी पहनने के तरीकों से लेकर उसके प्रकारों तक में इतने बदलाव आ गए हैं कि पर्दे क रूप समाप्त सा ही हो रहा है ।
इस लेख में परदे के बस कई प्रचलित रूपों पर एक चर्चा भर है । मूल बात यह है कि पर्दा किसी भी रूप में हो उसे अंतत स्त्री स्वाधीनता के विकास में बाधक ही माना जाना चाहिए।

इस लेख को नूतन यादव ने लिखा है। इस समय यह दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाती हैं।

(यह लेखक के अपने विचार हैं।)