बुन्देलखंड के अपने जनकवि

(फोटो साभार: bundelkhand.in)
(फोटो साभार: bundelkhand.in)

1 अप्रैल 1911 को कमासिन में जन्मंे केदारनाथ अग्रवाल बुन्देलखंड के मशहूर कवि माने जाते हैं। उनकी मृत्यु 22 जून 2011 को हुई। उनकी कविताओं में बुन्देलखंड की महक है और उनकी कहानियां आज भी लोगों के मन में बसी हैं।

जि़ला बांदा। 22 जून 2015 को बुन्देलखंड के जाने माने कवि और लेखक केदारनाथ अग्रवाल की पंद्रहवीं पुण्यतिथि थी। यह कहना मुश्किल है कि आज के ज़माने में कितने लोग उनकी कविताओं से परिचित हैं लेकिन उनके हर लेख में बुन्देलखंड का एहसास पाया जा सकता है।

बांदा के कमासिन क्षेत्र में जन्मे केदारनाथ ने कानून की पढ़ाई की थी। वे एक साल तक वकीलों के संघ ‘बार काउंसिल’ के अध्यक्ष भी थे। उन्होंने अपनी ज़्यादातर पढ़ाई बुन्देलखंड यूनिवर्सिटी से पूरी की।

1986 में उन्हें हिन्दी लेखन के लिए ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा 1981 में ‘हिन्दी संस्थान उत्तर प्रदेश पुरस्कार’, 1986 में ‘तुलसी पुरस्कार’, 1990 में ‘मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार’ – ये सब इन्हें दिए गए थे।

केदारनाथ अग्रवाल को उनकी प्रगतिशील सोच के लिए भी जाना जाता था। कहा जाता है कि उनकी कविताओं में नदियों की गति भी है तो पेड़ और चिडि़याओं का जि़्ाक्र भी है। उन्हें मित्रता का कवि कहा जाता है – उनकी हर कविता में उमंग, उल्लास और उजाले हैं।

हम न रहेंगे
हम न रहेंगे,  तब भी तो यह खेत रहेंगे,
इन खेतों पर घन लहराते शेष रहेंगे,
जीवन देते, प्यास बुझाते,
माटी को मदमस्त बनाते
श्याम बदरिया के  लहराते केश रहेंगे।
हम न रहेंगे, तब भी तो रतिरंग रहेंगे,
लाल कमल के साथ पुलकते भृंग रहेंगे,
मधु के दानी, मोद मनाते
भूतल को रससिक्त बनाते
लाल चुनरिया में लहराते अंग रहेंगे।